सपना, संघर्ष और सफलता, विजुअली इंपेयर्ड Thanya Nathan की जज बनने की इंस्पिरेशनल स्टोरी
सपने देखने के लिए आंखों की नहीं, हौसले की जरूरत होती है और Thanya ने इसे सच साबित कर दिखाया. दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने मेहनत, लगन और लगातार कोशिश के दम पर जज बनने का मुकाम हासिल किया.
कुछ कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं होतीं, वे व्यवस्था और सोच- दोनों को बदलने की ताकत रखती हैं. केरल की थान्या नाथन सी. ऐसी ही एक कहानी लिख रही हैं. पूरी तरह दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने न्यायिक सेवा परीक्षा में शानदार प्रदर्शन कर इतिहास रच दिया.
वह राज्य की पहली ऐसी महिला बनने जा रही हैं जो इस परिस्थिति के साथ जज की कुर्सी तक पहुंचेगी. उनकी जीत सिर्फ एक रैंक नहीं, बल्कि यह संदेश है कि हौसले के सामने सीमाएं छोटी पड़ जाती हैं.
वकालत के साथ शुरू हुई तैयारी
बार एंड बेंच से बात करते हुए थान्या ने बताया कि लॉ की डिग्री लेने के बाद कोर्टरूम से दूरी नहीं बनाई. अगस्त 2024 से उन्होंने प्रैक्टिस करते हुए ही एग्जाम की तैयारी शुरू कर दी. दिन में अदालत, रात में पढ़ाई दोनों साथ चलते रहे. उनके मन में एक ही बात थी कि अगर मौका मिला, तो पूरी ताकत लगा दूंगी.
नियम से ज्यादा बड़ा था डर
तीन साल की प्रैक्टिस वाली शर्त कई अभ्यर्थियों के लिए दबाव बन सकती थी, लेकिन थान्या के सामने उससे भी बड़ा सवाल था कि क्या उन्हें परीक्षा देने की मंजूरी मिलेगी? किस्मत से शीर्ष अदालत के एक अहम फैसले ने साफ कर दिया कि दृष्टिबाधित उम्मीदवारों के साथ भेदभाव नहीं हो सकता. यही फैसला उनके लिए दरवाज़ा खोल गया.
कोर्टरूम ने सिखाया असली कानून
थान्या ने कहा कि कि किताबें जरूरी हैं, लेकिन जज बनने के लिए अदालत के काम करने का तरीका समझना उससे भी ज्यादा अहम है. रोज़ की प्रैक्टिस ने उन्हें सिखाया कि कानून सिर्फ पढ़ने की चीज़ नहीं, लागू करने की जिम्मेदारी भी है. यही एक्सपीरियंस उनकी सबसे बड़ी ताकत बना. भर्ती प्रक्रिया के दौरान उन्हें स्क्राइब की सर्विस दी गई. सवाल पढ़े गए, जवाब उन्होंने बोलकर लिखवाए. माहौल सहयोगी था, जिससे वे पूरी तरह अपनी परफॉर्मेंस पर ध्यान दे सकीं.
ऐसी की पढ़ाई
दृष्टिबाधित छात्रों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल स्टडी मटेरियल की कमी है. डिजिटल संसाधन बढ़े हैं, लेकिन अभी भी काफी रास्ता तय करना बाकी है. ब्रेल किताबें मिलना लगभग नामुमकिन जैसा है, जबकि अपने दम पर पढ़ना आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा देता है. उन्होंने ब्रेल सिस्टम वाले टेक्स्ट का इस्तेमाल करके कानून की पढ़ाई की. थान्या मानती हैं कि रैंप या टेक्नोलॉजी जरूरी है, पर उससे भी ज्यादा जरूरी है लोगों का नजरिया. जब तक समाज दिल से समावेशन को नहीं अपनाएगा, बदलाव अधूरा रहेगा. अदालतों में व्हीलचेयर की सुविधा जैसी बुनियादी चीज़ें अभी भी हर जगह नहीं हैं.
टेक्नोलॉजी से बढ़ती आज़ादी
पेपरलेस सिस्टम और डिजिटल ऑर्डर जैसी पहलें दिव्यांग वकीलों को आत्मनिर्भर बनाती हैं. जब फाइलें ऑनलाइन हों, तो हर बार किसी दूसरे पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो जाती है. थान्या का कहना है कि न्यायपालिका से डरिए मत. मेहनत, निरंतरता और खुद पर भरोसा हो, तो यह रास्ता असंभव नहीं है. उनकी यात्रा हमें याद दिलाती है कि सपनों की रोशनी देखने के लिए आंखों से ज्यादा हिम्मत चाहिए.





