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क्या भारत अब China को enemy नहीं बल्कि managed competitor मानकर चल रहा है, Competitive Coexistence का नेहरू से क्या है कनेक्शन?

गलवान के बाद भारत चीन को दुश्मन नहीं बल्कि managed competitor की तरह संभाल रहा है. जानिए सीमा, व्यापार, सुरक्षा और Nehru के Panchsheel से Competitive Coexistence का संबंध.

क्या भारत अब China को enemy नहीं बल्कि managed competitor मानकर चल रहा है, Competitive Coexistence का नेहरू से क्या है कनेक्शन?
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साल 2020 में गलवान की हिंसक झड़प के छह साल बाद भारत-चीन संबंध एक नए संतुलन की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं. इसे न पूरी तरह दोस्ती की वापसी कहा जा सकता है और न 2020 के बाद वाला लगातार तनाव अब उसी स्तर पर है. सीमा पर सैन्य और कूटनीतिक बातचीत जारी है. 2024 में देपसांग और डेमचोक में गश्त व्यवस्था को लेकर सहमति बनी, सीधी हवाई सेवाएं फिर शुरू हुईं और दोनों देशों के बीच व्यापार ऊंचे स्तर पर बना रहा.

इसके बावजूद भारत की सुरक्षा नीति में चीन को लेकर सावधानी कम नहीं हुई है. यही विरोधाभास मौजूदा चीन नीति की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है. भारत चीन से संवाद चाहता है, लेकिन रणनीतिक भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं करना चाहता. व्यापार बढ़ाना चाहता है, लेकिन चीन पर अत्यधिक निर्भरता को जोखिम मानता है. सीमा पर शांति चाहता है, लेकिन सैन्य तैयारी कम करने के पक्ष में नहीं है. इसे रणनीतिक भाषा में नियंत्रित प्रतिस्पर्धा यानी Competitive Coexistence कहा जा सकता है. यानी प्रतिद्वंद्विता को खत्म किए बिना उसे अनियंत्रित संघर्ष में बदलने से रोकना.

क्या चीन अब दुश्मन नहीं है?

भारत ने चीन को आधिकारिक रूप से दुश्मन देश घोषित नहीं किया है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने चीन को दुश्मन मानना पूरी तरह छोड़ दिया है. चीन भारत के लिए एक साथ बड़ा पड़ोसी, महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार, रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी और गंभीर सुरक्षा चुनौती है.

2020 के गलवान संघर्ष ने इस चुनौती को और स्पष्ट किया. पूर्वी लद्दाख में हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों की सेनाएं लंबे समय तक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर आमने-सामने रहीं. इसके बाद भारत ने यह रुख मजबूत किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते.

21 अक्टूबर 2024 को भारत और चीन ने देपसांग और डेमचोक में LAC पर गश्त व्यवस्था को लेकर समझौता किया. इसके बाद 2020 से पैदा हुए टकराव वाले प्रमुख क्षेत्रों से सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया आगे बढ़ी और पहले की गश्त व्यवस्था बहाल करने का रास्ता खुला. लेकिन यह सीमा विवाद का अंतिम समाधान नहीं था. LAC का अंतिम निर्धारण अभी भी नहीं हुआ है और अरुणाचल प्रदेश सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों की स्थिति अलग है.

इसलिए भारत आज चीन से बातचीत कर रहा है, लेकिन अपनी सुरक्षा नीति को चीन के भरोसे नहीं छोड़ रहा. यही नियंत्रित प्रतिस्पर्धा का पहला आधार है- प्रतिद्वंद्विता को खत्म करना जरूरी नहीं, लेकिन उसे अनियंत्रित संघर्ष में बदलने से रोकना जरूरी है.

क्या प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व संभव है?

प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व का अर्थ यह नहीं है कि भारत और चीन के बीच मतभेद खत्म हो गए हैं. इसका अर्थ है कि दोनों देश रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी होते हुए भी हर क्षेत्र में एक-दूसरे को दुश्मन की तरह नहीं देखते.

सीमा विवाद के बावजूद दोनों सेनाओं के बीच बातचीत होती है. आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद व्यापार जारी है. तकनीकी और सुरक्षा क्षेत्रों में चिंता के बावजूद पूर्ण आर्थिक अलगाव नहीं है. राजनीतिक मतभेदों के बावजूद उच्चस्तरीय संवाद के रास्ते बंद नहीं किए गए हैं.

इसका मतलब है कि संबंधों को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से संभालने की कोशिश हो रही है. जहां साझा आर्थिक हित हैं, वहां सहयोग हो सकता है. जहां बाजार, तकनीक और विनिर्माण में मुकाबला है, वहां प्रतिस्पर्धा होगी. जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है, वहां भारत सावधानी और प्रतिरोध क्षमता को प्राथमिकता देगा.

इसीलिए चीन के साथ संबंधों को केवल दोस्ती या दुश्मनी के दो खानों में रखना सही नहीं होगा. भारत की कोशिश यह है कि चीन के साथ आर्थिक और राजनीतिक संपर्क से मिलने वाले लाभ बनाए रखे जाएं, लेकिन सीमा और रणनीतिक क्षेत्रों में जोखिम नियंत्रित रहें.

क्या गलवान के बाद भारत की नीति बदली?

गलवान के बाद सबसे बड़ा बदलाव दोनों देशों के बीच रणनीतिक भरोसे में आया. 2020 से पहले सीमा विवाद के बावजूद भारत और चीन के बीच आर्थिक और राजनीतिक संपर्क लगातार चलता रहा था. गलवान के बाद भारत ने सीमा सुरक्षा को द्विपक्षीय संबंधों के केंद्र में ला दिया.

सीमा पर सैन्य तैनाती बढ़ी और कई क्षेत्रों में लंबे समय तक गतिरोध बना रहा. भारत ने चीन के साथ सैन्य और राजनयिक बातचीत जारी रखी, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य संबंधों के लिए सीमा पर शांति जरूरी है.

अक्टूबर 2024 का देपसांग-डेमचोक समझौता इसी बदली हुई नीति का महत्वपूर्ण उदाहरण था. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की कजान में मुलाकात हुई. इसका अर्थ यह नहीं था कि दोनों देशों के बीच पुराना विश्वास वापस आ गया. इसका ज्यादा महत्वपूर्ण अर्थ यह था कि तनाव कम करने के बाद दोनों देश व्यापक संबंधों को धीरे-धीरे स्थिर करने के लिए राजनीतिक संपर्क बढ़ाना चाहते हैं.

यानी भारत का उद्देश्य चीन के साथ हर मतभेद खत्म करना नहीं, बल्कि मतभेदों के रहते स्थिरता बनाए रखना अधिक दिखाई देता है. यह व्यावहारिक दृष्टिकोण है, क्योंकि सीमा विवाद का अंतिम समाधान लंबी प्रक्रिया हो सकता है, जबकि सीमा पर संकट को तुरंत नियंत्रित करना जरूरी होता है.

क्या उड़ान और सीमा व्यापार की वापसी बदलाव का संकेत है?

भारत और चीन के बीच सीधी हवाई सेवाओं की बहाली संबंधों में व्यावहारिक सामान्यीकरण का महत्वपूर्ण संकेत है. 2020 के बाद लंबे समय तक सीधी उड़ानें बाधित रहीं. 1 फरवरी 2026 से एयर इंडिया ने दिल्ली-शंघाई सीधी सेवा फिर शुरू की.

सीधी उड़ानों का महत्व केवल यात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं है. इससे व्यापार, निवेश, शिक्षा, चिकित्सा और लोगों के बीच संपर्क आसान होता है. इसलिए हवाई संपर्क की बहाली को संबंधों में सुधार के संकेत के रूप में देखा जा सकता है.

इसी तरह नाथू ला, लिपुलेख और शिपकी ला जैसे सीमावर्ती मार्गों से पारंपरिक व्यापार की बहाली का स्थानीय महत्व है. इन रास्तों का कुल व्यापार भारत-चीन के विशाल द्विपक्षीय व्यापार की तुलना में छोटा है, लेकिन सीमावर्ती समुदायों और स्थानीय कारोबारियों के लिए इनका महत्व काफी ज्यादा है.

हालांकि, सीमा व्यापार का खुलना सीमा विवाद खत्म होने का संकेत नहीं है. व्यापारिक संपर्क बढ़ सकता है, लेकिन LAC का विवाद बना रह सकता है. इसलिए इन कदमों को पूर्ण सामान्यीकरण के बजाय नियंत्रित सामान्यीकरण के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.

क्या बढ़ता व्यापार भरोसे का प्रमाण है?

भारत-चीन संबंधों का सबसे बड़ा विरोधाभास आर्थिक क्षेत्र में दिखाई देता है. सीमा पर रणनीतिक तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत बड़ा है. 2025 में द्विपक्षीय व्यापार करीब 155 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा.

लेकिन कुल व्यापार से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका स्वरूप है. चीन से भारत का आयात भारत के निर्यात से काफी ज्यादा है. इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, औद्योगिक उपकरण, रसायन और दवा उद्योग के कच्चे माल जैसे क्षेत्रों में भारतीय उद्योग चीन से महत्वपूर्ण आपूर्ति प्राप्त करता है.

यही स्थिति भारत के सामने आर्थिक दुविधा पैदा करती है. चीन से व्यापार अचानक रोकना भारतीय उद्योगों के लिए महंगा हो सकता है, लेकिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रणनीतिक कमजोरी भी बन सकती है.

इसलिए भारत ने पूर्ण आर्थिक अलगाव का रास्ता नहीं चुना है. कोशिश घरेलू उत्पादन बढ़ाने, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तैयार करने और संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम घटाने की है. इसका अर्थ है कि भारत चीन से व्यापार कर सकता है, लेकिन चीन पर निर्भरता को रणनीतिक कमजोरी में बदलने से बचना चाहता है.

इसलिए व्यापार बढ़ना अपने आप में राजनीतिक विश्वास बढ़ने का प्रमाण नहीं है. आर्थिक जरूरत और रणनीतिक भरोसा दो अलग चीजें हैं.

क्या नेहरू से इसका कोई संबंध है?

Competitive Coexistence को सीधे जवाहरलाल नेहरू की चीन नीति कहना सही नहीं होगा, लेकिन इसके पीछे मौजूद शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का विचार नेहरू की विदेश नीति से जरूर जुड़ता है.

1954 में भारत और चीन ने पंचशील के पांच सिद्धांतों को औपचारिक रूप दिया था. इनमें एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, एक-दूसरे पर आक्रमण न करना, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व शामिल थे.

नेहरू का विश्वास था कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देश भी शांतिपूर्ण तरीके से साथ रह सकते हैं. लेकिन आज का भारत नेहरू के दौर से अलग परिस्थितियों में काम कर रहा है.

स्टेट मिरर स्पेशलनरेंद्र मोदी
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