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पहले कैबिनेट सचिव, फिर बने CEC… वो चुनाव आयुक्त जिनके दौर में इमरजेंसी के बाद चुनाव हारीं इंदिरा गांधी

टी. स्वामीनाथन पहले कैबिनेट सचिव और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त बने. जानिए उनके कार्यकाल, आपातकाल और 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हार की पूरी कहानी.

पहले कैबिनेट सचिव, फिर बने CEC… वो चुनाव आयुक्त जिनके दौर में इमरजेंसी के बाद चुनाव हारीं इंदिरा गांधी
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25 जून 1975 की वो रात देश में आपातकाल (Emergency) लागू हुआ. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और लोकतंत्र के सामने बड़े सवाल खड़े हो गए. इसी दौर में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर टी. स्वामीनाथन बैठे थे. वह पहले भारत सरकार के कैबिनेट सचिव रह चुके थे और फरवरी 1973 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे. वह ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त हुए जो कैबिनेट सचिव भी बने और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त भी. करीब चार साल बाद, मार्च 1977 में जब देश में आम चुनाव हुए, तो नतीजों ने इतिहास बदल दिया. इंदिरा गांधी की सत्ता चली गई और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. आखिर कौन थे टी. स्वामीनाथन और कैसा रहा उनका सियासी तौर पर उथलपुथल वाला ऐतिहासिक दौर?

कौन थे टी. स्वामीनाथन?

टी. स्वामीनाथन का पूरा नाम थिरुमलराया स्वामीनाथन था. वह भारत के पांचवें मुख्य चुनाव आयुक्त थे. चुनाव आयोग की आधिकारिक सूची के मुताबिक, उन्होंने 7 फरवरी 1973 से 17 जून 1977 तक इस पद पर काम किया. इससे पहले वह भारतीय सिविल सर्विस (ICS) के अधिकारी, बेल्जियम में भारत के राजदूत और केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव रह चुके थे. कैबिनेट सचिव के रूप में उनका कार्यकाल दिसंबर 1970 से नवंबर 1972 तक रहा. वह उन अधिकारियों में शामिल थे, जिन्होंने केंद्र सरकार के शीर्ष प्रशासनिक पद पर काम करने के बाद मुख्य चुनाव आयोग की जिम्मेदारी संभाली.

कैबिनेट सचिव से CEC कैसे बने?

स्वामीनाथन ने फरवरी 1973 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला. उस समय देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी और 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली थी. लेकिन अगले कुछ वर्षों में महंगाई, आर्थिक मुश्किलों, छात्र आंदोलनों और विपक्ष के विरोध ने राजनीतिक माहौल बदल दिया.

1974 की देशव्यापी रेलवे हड़ताल और बिहार-गुजरात के आंदोलनों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्षी आंदोलन भी तेज हुआ. ऐसे समय में स्वामीनाथन चुनाव आयोग का नेतृत्व कर रहे थे. उनके कार्यकाल का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि कुछ ही वर्षों में देश को इमरजेंसी और फिर एक ऐतिहासिक आम चुनाव का सामना करना पड़ा.

इमरजेंसी में क्या बदल गया था?

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती देने वाले मामले में उनके खिलाफ फैसला सुनाया. इसके बाद 25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया. नागरिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियां लगीं, विपक्ष के कई नेता गिरफ्तार किए गए और प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई.

राजनीतिक विरोध के लिए जगह सीमित हो गई और सरकार की शक्तियों को लेकर गंभीर बहस शुरू हुई. इस पूरे दौर में टी. स्वामीनाथन मुख्य चुनाव आयुक्त थे. हालांकि, आपातकाल का फैसला केंद्र सरकार ने लिया था और चुनाव आयोग की भूमिका संवैधानिक रूप से अलग थी.

1977 में ऐसा क्या हुआ कि इंदिरा हारीं?

जनवरी 1977 में लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा हुई. मतदान 16 से 20 मार्च के बीच हुआ और आपातकाल 21 मार्च 1977 को औपचारिक रूप से समाप्त हुआ. चुनाव के नतीजों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी. इंदिरा गांधी की कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी ने जीत दर्ज की.

इसके बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. यह स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का बड़ा मोड़ था. उस समय टी. स्वामीनाथन मुख्य चुनाव आयुक्त थे और चुनाव आयोग की कमान उन्हीं के पास थी.

क्या स्वामीनाथन को मिली इस जीत का श्रेय?

1977 के चुनाव में सत्ता परिवर्तन को किसी एक अधिकारी की उपलब्धि बताना सही नहीं माना जाएगा. इसके पीछे आपातकाल के प्रति जनता की प्रतिक्रिया, विपक्षी दलों की एकजुटता, जनता पार्टी का चुनाव अभियान और मतदाताओं का फैसला जैसे कई कारण थे. स्वामीनाथन की ऐतिहासिक भूमिका इस तथ्य में दर्ज है कि वह उस समय चुनाव आयोग का नेतृत्व कर रहे थे. इसलिए उनकी कहानी को ऐतिहासिक संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है. एक वरिष्ठ अधिकारी, जो आपातकाल के दौर में मुख्य चुनाव आयुक्त था और जिसके कार्यकाल में ऐसा चुनाव हुआ जिसने केंद्र की सत्ता बदल दी.

उनके बाद कौन बना मुख्य चुनाव आयुक्त?

टी. स्वामीनाथन का कार्यकाल 17 जून 1977 को समाप्त हुआ. अगले दिन, 18 जून को एस. एल. शकधर ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला. स्वामीनाथन के कार्यकाल में देश ने आपातकाल, राजनीतिक उथल-पुथल और 1977 के आम चुनाव जैसे बड़े सियासी घटनाक्रम देखे. उनका प्रशासनिक सफर भी शानदार था. पहले कैबिनेट सचिव और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त बने. उनकी कहानी भारतीय लोकतंत्र के उस अध्याय से जुड़ी है, जब मतदाताओं के फैसले ने देश की सत्ता का समीकरण बदल दिया.

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