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Exclusive: जिन्नाह-पाकिस्तान के अंदर झांक कर देखो... तब पता चलेगा कि गोडसे के हाथों न गांधी कत्ल हुए होते और न नाथूराम फांसी चढ़ते!

महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि पर उनके हत्या कांड और नाथूराम गोडसे को दी गई फांसी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. स्टेट मिरर हिंदी से बातचीत में राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता राज मिश्रा ने कहा कि गांधी की हत्या और गोडसे को फांसी - दोनों ही घटनाएं त्रासदी थीं और हिंसा किसी भी रूप में सही नहीं ठहराई जा सकती.

Exclusive: जिन्नाह-पाकिस्तान के अंदर झांक कर देखो... तब पता चलेगा कि गोडसे के हाथों न गांधी कत्ल हुए होते और न नाथूराम फांसी चढ़ते!
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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 30 Jan 2026 4:06 PM IST

महात्मा गांधी को कत्ल हुए 78 साल गुजर चुके हैं. 78 साल पहले यानी 30 जनवरी 1948 को आज ही के दिन उन्हें तब के बिड़ला भवन और आज के 30 जनवरी मार्ग (गांधी स्मृति) में शाम के वक्त कत्ल कर डाला गया था. महात्मा गांधी को कत्ल करने के आरोपी नाथूराम विनायक गोडसे को फांसी लगे भी अब 77 साल गुजर चुके हैं.

आज यह दोनों ही शख्शियतें इस मायावी दुनिया में भले न हों मगर जब-जब दुनिया में 30 जनवरी (इसी तारीख को सन् 1948 में गांधी जी का कत्ल हुआ) आती है, तब-तब महात्मा गांधी और उनके साथ उनके हत्यारे नाथूराम विनायक गोडसे का जिक्र जरूरत ज्वलंत हो उठता है. इसी तरह से देश और दुनिया 15 नवंबर 1949 को भी 77 साल बाद नहीं भूल सके हैं. क्योंकि गांधी के के कत्ल के आरोपी नाथूराम विनायक गोडसे को उनकी हर दलील को दरकिनार करते हुए आनन फानन में इसी तारीख को अंबाला (हरियाणा) जेल फांसी पर टांग दिया गया था.

कौन हैं राज मिश्रा?

गांधी जी का कत्ल हो या फिर उनके कातिल नाथूराम विनायक गोडसे की फांसी. मौत दोनों ही घटनाओं में दो भारतीयों की हुई थी. मौत का तरीका भले ही दोनों का अलग अलग रहा. यह दोनो ही ऐसी रुह कंपा देने वाली मौतें थीं जिन्हें इतिहास के पन्नों में तो जगह मिली मगर, यह दोनो ही मौत अब तक भी भारत के जनमानस के जेहन से मिट नहीं सकीं. आखिर क्यों?

महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि के अवसर पर स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन ने एक्सक्लूसिव बात की नाप-तोलकर बेहद संतुलित बोलने के लिए चर्चित देश के मशहूर राजनीतिक विश्लेषक, सामाजिक कार्यकर्ता और ज्योतिषाचार्य राज मिश्रा से. राज मिश्रा ने भी माना कि जिक्र चाहे महात्मा गांधी के कत्ल का हो या फिर उनके हत्यारे कहे गे नाथूराम विनायक गोडसे को फांसी पर जल्दबाजी में चढ़ा देने का.

दोनो ही मौत गलत थीं. न मैं गांधी के कत्ल का हिमायती हूं और न ही इस बात की तरफदारी करूंगा कि नाथूराम विनायक गोडसे ने जिस तरह से गांधी का कत्ल किया वह सही था. मेरे जेहन में 77-78 साल पहले घट चुकी उन दोनो ही घटनाओं को लेकर एक नहीं तमाम अहम सवाल जरूर एक भारतीय नागरिक होने के नाते कौंधते रहते हैं. इंसानी समाज का हिस्सा होने के नाते यह सवाल हर भारतीय के जेहन में कौंधने भी चाहिए.

दो मौत आज भी जिंदा क्यों

पहला सवाल, जमाना यही कहते सुना देखा जाता है वक्त के साथ गहरे से गहरा ज़ख्म भी भर जाता है. अगर यही सही है तो फिर गांधी के कत्ल और उनके कातिल नाथूराम गोडसे को फांसी पर चढ़ा दिए जाने का सच आज भी क्यों जिंदा है? कुछ न कुछ तो इन दोनो ही मामलों में ऐसा खास है ही न जो गुजरते वक्त को चुनौती देकर आज भी समय की रफ्तार के साथ कदम-ताल करता हुआ निरंतर दौड़े जा रहा है.

फांसी पर कोई सवाल नहीं है

मैं फिर दोहराता हूं कि गांधी के कत्ल और गोडसे को फांसी के मुद्दे पर मेरा कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है. हां, सवाल यह जरूर है जो एक जागरुक भारतीय होने के नाते होना भी चाहिए कि आखिर वह कौन से कारण रहे जिनके चलते वही नाथूराम विनायक गोडसे महात्मा गांधी का कत्ल करने पर उतर आए, जो नाथूराम गोडसे कभी इन्हीं बापू की रक्षा-सुरक्षा के लिए साम-दाम-दंड भेद से परछाई की मानिंद उनके आसपास रहा करते थे.

जब दोस्त ही दुश्मन बन जाए

कहते हैं कि जब दोस्त ही दुश्मन बन जाए तब फिर किसी रिश्ते-नाते के बचाने ही हर उम्मीद बेईमान हो जाती है. जहां तक मैंने धरोहर के रूप में मौजूद इन दोनो ही मौत का इतिहास पढ़ा है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि, जब भारत का बंटवारा (पाकिस्तान को अलग करके) हो रहा था. तब भी महात्मा गांधी, भारत से कटकर अलग हो चुके पाकिस्तान को आखिर 70-75 करोड़ रुपए भारतीय खजाने से दिलवाने पर क्यों आमादा थे? यह बात मुझे आज जितनी कुरेद रही है आज के भारत पाकिस्तान के खूनी होते संबंधों को देखकर.

परछाईं कातिल क्यों बन गई

तब सोचिए उस वक्त जो नाथूराम विनायक गोडसे गांधी जी के लिए अपनी जान देने तक के लिए हर वक्त तैयार रहते होंगे, उनके दिल-ओ-दिमाग पर बापू का वह रवैया किस कदर का नाकाबिले-बर्दाश्त कहर बरपा रहा होगा. यह सोचते हुए कि जिन मोहम्मद अली जिन्नाह जैसे मक्कारों-विश्वासघातियों ने “हिंदू-मुस्लिम” के बीच खूनी-खाई बनाकर, भारत पाकिस्तान को दो हिस्सों में चिरवा कर अलग कर डाला हो. जो शराबी-कबाबी मुसलमान होकर भी सूअर का सेवन करने वाला जिन्नाह देश में (विशेषकर बंगाल में) लाखों बेकसूर भारतीयों (विशेषकर भारत के हिंदू) के सामूहिक कत्ल का मुजरिम हो.

दुश्मन को खैरात में खजाना क्यों

जिस मोहम्मद अली जिन्नाह और उसके सिपहसालारों ने भारत के दिल को चीरकर उसमें से खंखार-खूनी दिमाग-सोच वाला पाकिस्तान जैसा मुल्क बनवा डाला हो. इतनी सब बर्बादी तबाही देखने के बाद भी आखिर वह कौन सी वजह रही जिसके चलते महात्मा गांधी पूरे भारत यानी 30 करोड़ भारतीयों की जन-भावनाओं को उस जमाने में नजरंदाज करके, भारत के दुश्मन देश पाकिस्तान को भारत के उस मुसीबत भरे वक्त में भी 70-75 करोड़ जैसी उस जमाने की मोटी रकम दिलवाने पर आमादा थे.

दुश्मन की मदद की दरकार क्यों

यह कहां की कैसी अहिंसा की लड़ाई या फिर कैसा पड़ोसी देश का सहयोग था गांधी जी का कि जो पाकिस्तान और जो जिन्नाह भारत का दुश्मन नंबर-1 हो चुका था, उसे भारतीय खजाने से तब के बदतर हालातों में भी 70-75 करोड़ जैसी भारी-भरकम रकम फोकट में गांधी जी खैरात में दिलवाने पर आमादा थे. जब आज मुझे यह सब इतना बुरा लग रहा है तो फिर सोचना लाजिमी है कि तब अपनी आंखों से वह सब नंगा नाच या तमाशा होता देखकर, नाथूराम विनायक गोडसे के युवा दिल-ओ-जेहन पर क्या कुछ गुजरी-बीती होगी. उस हद तक कि जिसने नाथूराम गोडसे के जेहन से यही डिलीट कर डाला होगा कि महात्मा गांधी उनके दोस्त या भारत के देशभक्त नागरिक भी हैं.

पानी सिर से ऊपर हो जाए तो...

जाहिर सी बात है कि जब पानी सिर के ऊपर चला जाता है और इंसान के सोचने समझने की ताकत शून्य हो चुकी होती है. तभी कोई युवा नाथूराम विनायक गोडसे बनकर किसी महात्मा गांधी को कत्ल करने जैसे भयंकर फैसला आंखें-बंद करके लेता होगा. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि गांधी जी का कत्ल सही था या फिर नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को कत्ल करके सही किया. मैं यहां सिर्फ इस चर्चा में अपने मन की बेबाकी निजी राय बयान कर रहा हूं. जो मुझे आज का एक युवा भारतीय होने के नाते निजी तौर पर महसूस हो रहा है.

बात गाय और कसाई दोनों की हो

मैं बार-बार दोहराता हूं कि गांधी का कत्ल अनुचित था. गांधी का ही क्या किसी का भी कत्ल गलत है. मैं कभी किसी की हत्या का हिमायती न था न हूं. हां, ऐसे में फिर गाय और कसाई दोनो को दो पलड़ों में रखकर तौलने के वक्त एक संतुलित मानसिकता वाले भारतीय होने के नाते मेरे जेहन में यह सवाल जरूर कौंधना लाजिमी है कि आखिर महात्मा गांधी के सामने वे कौन सी मजबूरियां या कारण थे जिनके चलते, वह पाकिस्तान और जिन्नाह पर साम-दाम-दंड हर तरह से भारत और खुद को कुर्बान करने पर आमादा थे?

पाकिस्तान-जिन्नाह के प्रति अंधा-प्रेम

दूसरा सवाल है कि यह बात तब सिर्फ महात्मा गांधी के करीबी दोस्त रह चुके नाथूराम गोडसे के ही जेहन में उस कदर क्यों कौंधी कि वह गांधी का कत्ल करने पर आमादा हो उठे? क्या उस वक्त देश में या फिर कांग्रेस में कोई और नहीं था जो महात्मा गांधी के पाकिस्तान और जिन्नाह के प्रति अंधे प्रेम पर खुलकर सवाल उठाता? और तब शायद महात्मा गांधी की समझ में भारत के हित की बात आ जाती. जिससे संभव था कि नाथूराम विनायक गोडसे के हाथ गांधी के कत्ल और उनके खून से रंगने से बच जाते.

क्यों किसी ने कदम नहीं उठाए

गांधी को चाहने वालों की और कानून की नजर में नाथूराम विनायक गोडसे गांधी जी के कातिल थे. मुझे इसपर भी कोई आपत्ति नहीं है. बस मेरा सवाल यह है कि क्या उस जमाने में देश के जो बदतर हालात जिन्नाह और पाकिस्तान के मुद्दे पर बन गए थे, जिसमें महात्मा गांधी मुख्य भूमिका में मैदान में खुलकर उतरे हुए थे. उन हालातों को तब क्या किसी भारतीय नेता (विशेषकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं) को इतनी भी समझ नहीं थी कि, महात्मा गांधी का जो अंधा झुकाव पाकिस्तान और जिन्नाह की ओर हो रहा है, वह क्यों और उस पर लगाम लगा दी जाए. अगर उस वक्त की कुछ मतलबपरस्त-देश विरोधी ताकतों ने भारत और भारतीयों के हित में सोचा होता तो न गांधी का कत्ल हुआ होता और तब न ही शायद नाथूराम गोडसे के हाथ गांधी के कत्ल के खून से रंगे होते. न ही गोडसे को बिना उनकी कोई दलील सुने हुए उन्हें फांसी के फंदे पर टांग दिए जाने की नौबत ही आई होती.

तो फिर गोडसे के मामले में ऐसा क्यों?

अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि कत्ल गांधी का ही क्या किसी का भी अनुचित है. बात मगर जब गांधी जी के कत्ल की हो तब यह सवाल भी कौधना चाहिए कि आखिर उनका कत्ल करने की नौबत क्यों आई? क्योंकि न्याय के मंदिर कही जाने वाली भारत की अदालतें आज भी कत्ल के मामले में कत्ल की वजहें बहुत बारीकी से टटोलती हैं. उस हद तक कि अगर किसी ने “आत्म-रक्षार्थ” किसी का कत्ल किया हो तब फिर, कत्ल का कोई मुलजिम या आरोपी कानूनन “कातिल” होने से साफ बचाकर उसे हमारी अदालतें ब-इज्जत बरी कर देती हैं.

ऐसे में खुद-ब-खुद दूसरा सवाल जेहन में कौंधना लाजिमी है कि आखिर वे कौन से हालात-कारण या मजबूरियां थीं जो, तब गांधी हत्याकांड के मुकदमे की सुनवाई कर रही अदालत ने नाथूराम विनायक गोडसे की हर दलील को नजरंदाज करके उन्हें सिर्फ और सिर्फ ‘फांसी’ के तख्ते पर टांग देना ही न्याय का मूलधर्म समझा? न कि अदालत ने यह भी समझने की कोई ईमानदार कोशिश की कि, आखिर नाथूराम विनायक गोडसे ने गांधी का कत्ल किया क्यों? क्या थीं वजहें गांधी के कत्ल की.

स्टेट मिरर स्पेशल
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