Model Code of Conduct: कैसे चुनाव में ‘सबसे ताकतवर’ बन जाता है EC? क्या-क्या हैं नियम, CM-मंत्री सिर्फ नाम के क्यों?
15 मार्च से चुनावी राज्यों में MCC लागू होते ही सरकार की शक्तियां सीमित हो जाती हैं. जानिए कैसे Election Commission of India चुनाव के दौरान सबसे ताकतवर बन जाता है.
15 मार्च से चुनावी राज्यों में सियासी सरगर्मी के बीच आचार संहिता लागू होते ही सत्ता की तस्वीर बदल गई. Election Commission के नियंत्रण में आते ही सरकार के फैसलों पर लगाम लग गई है और मुख्यमंत्री-मंत्री तक सीमित भूमिका में नजर आने लगे हैं. अब न नई योजनाओं की घोषणा संभव है, न सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल. यानी चुनाव के मैदान में अब असली ताकत नियमों की है, न कि सत्ता की.
चुनाव दौरान मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) एक तरह से कानून का रूप ले लेती है, जो सत्ता में बैठे मुख्यमंत्री से मंत्री तक के अधिकारों को सीमित कर देती है. इसे लागू करता है Election Commission of India और जैसे ही चुनाव की घोषणा होती है, इसकी ताकत तुरंत दिखने लगती हैं. समझिए वो बड़े नियम, जो चुनाव के दौरान ईसी को बेहद शक्तिशाली बना देते हैं.
Model Code of Conduct चुनावी निष्पक्षता की रीढ़ है. यही वजह है कि जैसे ही चुनाव की घोषणा होती है, पूरा सिस्टम Election Commission of India के नियंत्रण में आ जाता है और बड़े से बड़ा नेता भी नियमों के दायरे में आ जाता है.
चुनाव के दौरान सीएम और मंत्री नाम के क्यों?
इसीलिए चुनाव के दौरान CM-मंत्री “नाम के” रह जाते हैं, क्योंकि न वे नई घोषणा कर सकते हैं, न सरकारी संसाधन इस्तेमाल कर सकते हैं, न प्रशासन को अपने हिसाब से चला सकते हैं. असल में, सत्ता का केंद्र सरकार से हटकर चुनाव आयोग बन जाता है.
जन प्रतिनधित्व कानून क्या?
Representation of the People Act, 1951 भारत में चुनाव कराने और उन्हें नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है. यह तय करता है कि कौन चुनाव लड़ सकता है, नामांकन कैसे होगा, चुनाव प्रचार के नियम क्या होंगे और किन स्थितियों में उम्मीदवार अयोग्य घोषित किया जा सकता है. इस कानून में भ्रष्ट आचरण, चुनाव खर्च, वोटिंग प्रक्रिया और चुनाव विवादों के निपटारे से जुड़े प्रावधान शामिल हैं. इसका उद्देश्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना है. इसे लागू करने में Election Commission of India की अहम भूमिका होती है.
1. नई योजनाओं पर पूरी रोक
चुनाव घोषित होते ही वहां की चुनी हुई सरकार कोई नई सरकारी योजना लॉन्च नहीं की सकती. किसी नई परियोजना का शिलान्यास, उद्घाटन, घोषणाएं बंद हो जाता है. इससे सत्ता पक्ष चुनावी फायदा नहीं उठा पाता.
2. सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल बैन
सत्ता पक्ष के लोग भी सरकारी गाड़ियां, अधिकारी, दफ्तर चुनाव प्रचार में इस्तेमाल नहीं कर सकते. मंत्री अपने पद का फायदा नहीं उठा सकते. यानी “पावर का दुरुपयोग” रोक दिया जाता है.
3. ट्रांसफर-पोस्टिंग पर कंट्रोल
बड़े अफसरों की पोस्टिंग/ट्रांसफर बिना चुनाव आयोग की इजाजत के संभव नहीं होता. राज्य सरकार का प्रशासन सीधे आयोग के नियंत्रण में आ जाता है.
4. विज्ञापन और प्रचार पर सख्ती
सरकारी खर्च से विज्ञापन बंद हो जाता है. सरकार अपनी उपलब्धियों का प्रचार नहीं कर सकती. जनता के पैसों से “इमेज बिल्डिंग” नहीं हो सकती.
5. धार्मिक/जातीय अपील पर बैन
सत्ता पक्ष या विपक्ष या निर्दलीय नेता वोट मांगने के लिए धर्म, जाति, भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकते. चुनाव को “भड़काऊ” बनने से रोका जाता है.
6. आचार संहिता उल्लंघन पर कार्रवाई
किसी के द्वारा चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने पर नोटिस, FIR, प्रचार पर रोक लगा दी जाती है. गंभीर मामलों में उम्मीदवार की मान्यता तक खतरे में पड़ जाता है. आयोग सीधे नेताओं को “लाइन” में रखता है.
7. पुलिस और प्रशासन पर नियंत्रण
कानून-व्यवस्था की निगरानी आयोग करता है. जरूरत पड़े तो अधिकारियों को हटा सकता है. राज्य सरकार की पकड़ कमजोर हो जाती है.
8. मतदान प्रक्रिया की पूरी कमान
चुनाव की तारीख, सुरक्षा, मतदान केंद्र आदि आयोग तय करता है. पूरी चुनावी मशीनरी ECI के अधीन आ जाती है.
9. आचार संहिता
MCC खुद कोई कानून नहीं है, लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और जनदबाव का समर्थन मिलता है. इसका उल्लंघन करने पर IPC/Representation of People Act के तहत कार्रवाई हो सकती है.
10. बड़े नेताओं पर भी सीधी कार्रवाई
स्टार प्रचारकों पर बैन (जैसे भाषण पर रोक), सोशल मीडिया पोस्ट तक पर नजर यानी “कोई भी ऊपर नहीं” यही वजह है कि CM-मंत्री भी चुनाव में दौरान नाम के ही होते हैं? क्योंकि वे न नई घोषणा कर सकते हैं. न सरकारी संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं. न प्रशासन को अपने हिसाब से चला सकते हैं. असल में, चुनाव के दौरान “सत्ता का केंद्र” सरकार से हटकर चुनाव आयोग बन जाता है.
पीपल जनप्रतिनिधित्व कानून क्या है,
चुनाव के दौरान लागू होने वाली वो धाराएं हैं, जो चुनाव के समय सबसे ज्यादा “एक्टिव” रहती हैं.
धारा 8 : गंभीर अपराध में दोषी पाए गए नेता चुनाव नहीं लड़ सकते. राजनीति को अपराधमुक्त करने की कोशिश होती है.
धारा 33 : उम्मीदवार को सही तरीके से नामांकन भरना जरूरी है. तकनीकी गलती पर नामांकन खारिज भी हो सकता है.
धारा 77 : हर उम्मीदवार को खर्च का पूरा रिकॉर्ड रखना होगा, तय सीमा से ज्यादा खर्च पर चुनाव आयोग को कार्रवाई करने का अधिकार है.
धारा 78 : हर प्रत्याशी को चुनावी खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को देना होता है. चुनाव के बाद निर्धारित समय में खर्च का हिसाब देना जरूरी होता है.
धारा 100 : अगर चुनाव में गड़बड़ी साबित हो जाए तो कोर्ट चुनाव को रद्द कर सकता है.
धारा 123 : वोट के लिए पैसा/गिफ्ट देने पर रोक. धर्म/जाति के नाम पर वोट मांगना. फर्जी प्रचार, गलत जानकारी. सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग. चुनाव रद्द हो सकता है. उम्मीदवार अयोग्य घोषित हो सकता है.
धारा 125 : सांप्रदायिक नफरत फैलाना. धर्म, जाति, भाषा के आधार पर नफरत फैलाने को चुनावी अपराध माना जाता है.
धारा 126 : चुनाव प्रचार पर रोक होता है. मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार बंद करा दिया जाता है. रैली, टीवी इंटरव्यू, सोशल मीडिया कैंपेन पर रोक. ताकि मतदाता बिना दबाव के फैसला ले सकें.
धारा 127A : कोई भी पंपलेट/पोस्टर बिना प्रिंटर-पब्लिशर की जानकारी के नहीं छप सकता. फर्जी प्रचार और अनट्रेस्ड कंटेंट रोकने के लिए.
धारा 171 : हालांकि ये RPA में नहीं, लेकिन इससे जुड़ी है. वोट खरीदना, मतदाताओं को धमकाना. इसमें IPC के तहत सजा भी हो सकती है.
चुनावी राज्यों में 15 मार्च से MCC लागू
15 मार्च से चुनावी राज्यों में मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) लागू हो गया है. अब पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी में चुनाव आचार संहिता चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने तक असरकारी रहेगा. इसे Election Commission of India सख्ती से लागू करता है.




