तलाक विवाद : 'पत्नी है नौकरानी नहीं, खाना न बनाना क्रूरता नहीं', हाई कोर्ट का फैसला, पति की याचिका खारिज
Telangana High Court : तेलंगाना हाई कोर्ट ने पति की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा पति के लिए खाना न बनाना क्रूरता या तलाक का वैध कारण नहीं बन सकता. हाई कोर्ट ने कहा कि घरेलू कामकाज में असहमति तलाक की वजह नहीं हो सकती. जहां कि अलग रहने की बात है तो पत्नी को ऐसा करने के लिए वकील ने कहा था.
Telangana High Court : तेलंगाना हाई कोर्ट ने हाल ही में एक तलाक मामले में फैसला सुनाते हुए पति की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि पत्नी उसके लिए खाना नहीं बनाती है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला क्रूरता या घरेलू हिंसा के दायरे में नहीं आता और सिर्फ खाने-पीने के मामले को तलाक का आधार नहीं माना जा सकता. यह फैसला घरेलू विवादों और तलाक मामलों में न्यायालय की संवेदनशीलता और विवेक को दर्शाता है.
तेलंगाना हाई कोर्ट ने तलाक के एक मामले में अपने फैसले कहा है, 'जब पति और पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, तो पत्नी का पति के लिए खाना न बनाना क्रूरता नहीं माना जा सकता. ना ही इस आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता है.' जस्टिस मौशुमी भट्टाचार्य और जस्टिस नागेश भीमपक्का की डिवीजन बेंच ने इस मामले में अदालत के समक्ष दायर याचिका को खारिज कर दी. तलाक की याचिका LB नगर निवासी एक शख्स ने दायर की थी.
इस मामले में याची ने अदालत से खुद की शादी रद्द करने की अपील की थी. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि पत्नी उसके लिख खाना नहीं बनाती है. यह क्रूरता है. निचली अदालत ने तलाक की ये याचिका खारिज कर दी थी.
2018 में हुई थी शादी
याचिकाकर्ता ने निचली अदालत से तलाकनामा खारिज होने के बाद हाई कोर्ट में अपील दायर की. उसने अपने फैसले में हाई कोर्ट से कहा कि पति दोपहर 1 बजे से रात 10 बजे तक काम करता है, पत्नी सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक काम करती है. इसलिए, सुबह खाना न बनाना क्रूरता नहीं माना जा सकता.
बेंच ने टिप्पणी की, "याचिकाकर्ता रात 11 बजे तक घर आता था और दोपहर 1 बजे ऑफिस जाता था. जबकि प्रतिवादी सुबह 6 बजे उठती थी और सुबह 9 बजे ऑफिस जाती थी. ऐसे पत्नी द्वारा पति के लिए खाना न बनाने को गंभीरता से नहीं देखा जा सकता. ना ही यह क्रूरता के दायरे में आता है.
इस जोड़े ने 2018 में शादी की थी. दोनों आपसी विवाद और झगड़े की वजह से 2018 से अलग रह रहे थे. पति ने 2019 में तलाक के लिए अर्जी दी थी, जिसमें आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी घर के कामों में मदद न करके क्रूरता करती है.
माता-पिता के साथ रहना भी गलत नहीं
पति के इस बात का भी दावा किया था कि उसकी पत्नी अक्सर अपने माता-पिता के घर जाती है और उसके साथ नहीं रहती है. कोर्ट ने कहा कि पति ने विरोधाभासी बयान दिए. एक बार कहा कि वह शादी के एक साल और नौ महीने के दौरान पांच महीने पत्नी के साथ रही और दूसरी बार कहा कि तीन महीने रही. कोर्ट ने यह भी कहा कि गर्भपात के बाद अपने माता-पिता के साथ रहना क्रूरता नहीं माना जा सकता.
वकील ने दी थी अलग रहने की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले अपने एक फैसले में कहा है कि अलग रहने की मांग करना क्रूरता के तहत आता है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है. मौजूदा मामले में, कोर्ट ने कहा कि पत्नी ने खुद अलग होने का प्रस्ताव नहीं दिया था, बल्कि उसके वकील ने उसे ऐसा करने की सलाह दी थी. इसलिए, इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि वह पति के क्रूरता के आरोपों पर विचार करके तलाक नहीं दे सकता.





