Delhi SIR: दिल्ली SIR में बाहर हो गए 47 लाख वोटर, किन-किन सीटों पर ज्यादा असर, क्या 2029 में होगा बड़ा खेल?
दिल्ली SIR में 47 लाख मतदाता प्रारूप सूची से बाहर रह सकते हैं. Rohini से Tughlakabad तक आंकड़ों में बड़ा फर्क, जानिए किन सीटों पर असर और 2029 में क्या बदल सकता है.
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR ने चुनावी राजनीति के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. करीब 1.45 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स में से 47 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम 24 अगस्त को आने वाली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर रह सकते हैं. यानी करीब हर तीन में से एक मतदाता फिलहाल ड्राफ्ट लिस्ट में शामिल नहीं हो पाएगा. हालांकि, इन 47 लाख नामों को अभी ‘वोटर हट गए’ मानना सही नहीं होगा. इनमें ऐसे मतदाता भी हैं जिनके गणना फॉर्म जमा नहीं हुए, जो घर पर नहीं मिले, कहीं और चले गए, मृत या दोहरे नाम वाली श्रेणी में आए. असली तस्वीर अंतिम मतदाता सूची आने के बाद ही साफ होगी.
किस सीट पर ज्यादा असर?
दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में 47 ऐसी हैं, जहां ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर रहने वाले मतदाताओं का अनुपात 30 फीसदी से ज्यादा बताया जा रहा है. लेकिन सीट-दर-सीट आंकड़े इससे भी ज्यादा दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं.
रोहिणी में 83.4 फीसदी और शाकूर बस्ती में 81.3 फीसदी गणना का काम पूरा हुआ है. राजौरी गार्डन में यह आंकड़ा करीब 79.1 फीसदी और मंगोलपुरी में 78.8 फीसदी है. दूसरी तरफ तुगलकाबाद में यह सिर्फ 52.1 फीसदी, ओखला में 54.6 फीसदी और आरके पुरम में करीब 55.5 फीसदी है.
यानी दिल्ली की अलग-अलग विधानसभा सीटों में गणना के स्तर पर 30 प्रतिशत अंक से ज्यादा का अंतर है. यही अंतर SIR को राजनीतिक रूप से अहम बनाता है. सवाल यह नहीं है कि अभी कितने नाम बाहर हैं, बल्कि यह है कि इनमें से कितने नाम अंतिम मतदाता सूची में वापस आते हैं.
अल्पसंख्यक इलाकों की क्या तस्वीर?
SIR के आंकड़ों में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे केवल अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम कटने की कहानी मानना सही नहीं होगा. अल्पसंख्यक बहुल कई विधानसभा क्षेत्रों में गणना का औसत दूसरे क्षेत्रों की तुलना में काफी ज्यादा है.
सीलमपुर में 76.6 फीसदी, मटिया महल में 75.5 फीसदी, बाबरपुर में 72.9 फीसदी और मुस्तफाबाद में 71.9 फीसदी गणना हुई है. बल्लीमारान में यह करीब 67.3 फीसदी और चांदनी चौक में 60.9 फीसदी है.
इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि इन इलाकों के सभी मतदाताओं के नाम सुरक्षित हैं. लेकिन इतना जरूर है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं की जानकारी प्रक्रिया में दर्ज हो चुकी है. अब आगे की तस्वीर प्रारूप सूची और उसके बाद होने वाले दावे- आपत्तियों से साफ होगी.
AAP की जीती सीटों में क्या फर्क?
आम आदमी पार्टी के लिए भी ये आंकड़े खास महत्व रखते हैं. 2025 में आप जिन 22 विधानसभा सीटों पर जीती थी, उनमें सीलमपुर में 76.6 फीसदी, तिलक नगर में 76.6 फीसदी, मटिया महल में 75.5 फीसदी और गोकलपुर में 74.2 फीसदी गणना हुई है.
लेकिन तुगलकाबाद में तस्वीर बिल्कुल अलग है. यहां गणना करीब 52.1 फीसदी पर है. यानी आप की जीती सीटों में भी SIR का असर एक जैसा नहीं है.
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है. SIR को फिलहाल किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष में जोड़ना जल्दबाजी होगी. कम गणना वाले क्षेत्रों में अगर बड़ी संख्या में नाम अंतिम सूची से बाहर रहते हैं तो चुनावी गणित बदल सकता है. लेकिन अगर दावे और आपत्तियों के बाद बड़ी संख्या में नाम वापस जुड़ जाते हैं तो शुरुआती तस्वीर काफी बदल जाएगी.
सिर्फ गरीब या मुस्लिम इलाकों की कहानी?
यहीं SIR का सबसे बड़ा सियासी पेच सामने आता है. कम गणना वाले इलाकों में केवल अल्पसंख्यक बहुल सीटें ही नहीं हैं. नई दिल्ली, आरके पुरम, मालवीय नगर और ग्रेटर कैलाश जैसे इलाकों में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं की गणना अभी पूरी नहीं हुई है.
इसलिए इसे सिर्फ ‘मुस्लिम वोटर बनाम बाकी वोटर’ की कहानी बनाना आंकड़ों के साथ न्याय नहीं होगा. मामला मतदाताओं के पते, शहर के भीतर या बाहर हुए पलायन, पुराने मतदाता रिकॉर्ड और गणना फॉर्म जमा होने की स्थिति से भी जुड़ा है.
2029 में क्या बदलेगा?
2029 का राजनीतिक असर अभी सीधे तय नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह अभी अंतिम मतदाता सूची नहीं है. 24 अगस्त को प्रारूप मतदाता सूची जारी होगी. इसके बाद 24 अगस्त से 23 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दाखिल की जा सकेंगी और 27 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होनी है.
इसलिए 2029 के लिए सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा 47 लाख नहीं, बल्कि इन 47 लाख संभावित बाहर हुए नामों में से अंतिम रूप से कितने नाम वापस जुड़ते हैं, यह होगा.
अगर बड़ी संख्या में नाम वापस जुड़ते हैं तो SIR मुख्य रूप से जांच और रिकॉर्ड दुरुस्ती की कवायद साबित हो सकता है. लेकिन अगर लाखों नाम अंतिम सूची से भी बाहर रह जाते हैं और उनका असर कुछ खास विधानसभा क्षेत्रों में ज्यादा दिखाई देता है, तो दिल्ली के चुनावी गणित पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है.
असली खेल अब शुरू होगा
दिल्ली SIR की मौजूदा तस्वीर को चुनावी नक्शे का पहला खाका कहा जा सकता है. रोहिणी में 83 फीसदी से ज्यादा गणना और तुगलकाबाद में करीब 52 फीसदी का अंतर बताता है कि पूरी दिल्ली में प्रक्रिया एक जैसी नहीं रही. वहीं सीलमपुर, मटिया महल, बाबरपुर और मुस्तफाबाद के आंकड़े यह बताते हैं कि इसे केवल अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम हटने की कहानी के तौर पर देखना सही नहीं होगा.
अब निगाह 24 अगस्त की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर होगी. इसके बाद सितंबर तक आने वाले दावे और आपत्तियां बताएंगे कि 47 लाख की यह संख्या कितनी स्थायी है. 27 अक्टूबर की अंतिम सूची पहली बार यह साफ करेगी कि SIR ने दिल्ली की मतदाता सूची को वास्तव में कितना बदला है.
क्या 2029 में होगा बड़ा खेल?
47 लाख संभावित बाहर हुए मतदाता 2029 के लिए अभी कोई तय चुनावी नतीजा नहीं बताते. लेकिन यह जरूर संकेत देते हैं कि दिल्ली का मतदाता नक्शा बदल सकता है. असली सवाल यह होगा कि 24 अगस्त की प्रारूप सूची के बाद कितने नाम वापस जुड़ते हैं और किन सीटों पर कितनी संख्या में बदलाव होता है. अगर बड़े पैमाने पर नाम बाहर रह गए, तो 2029 में कई सीटों का चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है.




