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कौन है कांग्रेस का 'भेदी', क्या अपनों से ही हार रहे राहुल गांधी? मीनाक्षी नटराजन वाले मामले में उठा बड़ा सवाल

मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन विवाद ने कांग्रेस में अंदरूनी कलह, सूचना लीक और राहुल गांधी की नेतृत्व शैली को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है.

कौन है कांग्रेस का भेदी, क्या अपनों से ही हार रहे राहुल गांधी? मीनाक्षी नटराजन वाले मामले में उठा बड़ा सवाल
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( Image Source:  ChatGpt )

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन रद्द होने का मामला अब केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह गया. पार्टी के भीतर से ही जानकारी लीक होने और कथित अंदरूनी साजिश के आरोपों ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. अब यह मामला इतना तूल पकड़ लिया है कि इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली. अब पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि आखिर वह कौन था, जिसने कांग्रेस की रणनीति और दस्तावेज भाजपा तक पहुंचाए.

कहां से शुरू हुआ नामांकन रद्द होने का विवाद?

मीनाक्षी नटराजन को कांग्रेस नेतृत्व की पसंद माना जा रहा था और उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजने की तैयारी की गई थी. ऐसा होता, उससे पहले आवेदन वेरिफिकेशन के दौरान राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने मीनाक्षी नटराजन का एमपी से नोमिनेशन रद्द कर दिया. अधिकारियों के अनुसार उनके द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे में आवश्यक जानकारी अधूरी थी. विशेष रूप से फॉर्म-26 में एक संबंधित शिकायत का उल्लेख नहीं किया गया था, जिसके आधार पर उनकी उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई.

नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और अपने नामांकन को बहाल करने की मांग करते हुए याचिका दायर की. लेकिन शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. इसके बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया तथा कांग्रेस के भीतर से ही सवाल उठने लगे कि आखिर इस पूरे मामले की जानकारी बीजेपी तक पहुंची कैसे.

तहसीन पूनावाला ने क्यों उठाई जांच की मांग?

राजनीतिक विश्लेषक और कांग्रेस से जुड़े रहे तहसीन पूनावाला ने इस पूरे प्रकरण को लेकर कांग्रेस हाईकमान से जांच कराने की मांग की है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मीनाक्षी नटराजन के साथ जो हुआ, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी पूरी जांच होनी चाहिए.

पूनावाला ने कहा कि चूंकि दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में हैं, तेलंगाना के प्रभारी भी रह चुके हैं और उन्होंने स्वयं राज्यसभा के लिए दोबारा नामांकन नहीं लेने का फैसला किया था, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को उनसे पूरे मामले की जांच करवानी चाहिए. उन्होंने यह भी मांग की कि यह पता लगाया जाए कि तेलंगाना कांग्रेस से मध्य प्रदेश कांग्रेस और फिर बीजेपी तक जानकारी किसने पहुंचाई?

कांग्रेस के भीतर से ही लीक हुई जानकारी?

'द स्टेट्समैन' की रिपोर्ट के अनुसार, मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द कराने में इस्तेमाल हुई महत्वपूर्ण जानकारी बीजेपी को कांग्रेस के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं के माध्यम से मिली थी. पार्टी सूत्रों का दावा है कि यह पूरी तरह अंदरूनी लोगों का काम था.

इससे पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने संकेत दिया था कि जिन दस्तावेजों के आधार पर नटराजन का नामांकन खारिज हुआ, वे तेलंगाना कांग्रेस से जुड़े लोगों के जरिए सामने आए थे. भारत राष्ट्र समिति (BRS) के नेता हरीश राव ने भी इसी प्रकार के संकेत दिए थे. हालांकि, सूत्रों का कहना है कि कहानी केवल इतनी भर नहीं है.

क्या राहुल गांधी की पसंद थीं मीनाक्षी नटराजन?

कांग्रेस के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा भेजने के पीछे राहुल गांधी की स्पष्ट सहमति और समर्थन था. यही वजह है कि जब उनका नामांकन विवादों में घिरा, तो मामला केवल एक उम्मीदवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राहुल गांधी की राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगे.

सूत्रों के अनुसार, मध्य प्रदेश कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं में इस बात को लेकर नाराजगी थी कि राज्यसभा उम्मीदवार के चयन में स्थानीय नेतृत्व से पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया. पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि राहुल गांधी ने अपने स्तर पर फैसला लेकर नटराजन को उम्मीदवार बनाया.

तेलंगाना से शुरू हुआ विवाद?

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक इस पूरे मामले की जड़ें तेलंगाना की राजनीति में छिपी हैं. वर्ष 2025 में मीनाक्षी नटराजन को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) का तेलंगाना प्रभारी नियुक्त किया गया था. इसी दौरान उनके और तेलंगाना के शीर्ष नेतृत्व के बीच मतभेदों की चर्चा शुरू हुई.

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने दावा किया कि मीनाक्षी नटराजन की कार्यशैली और सोच तेलंगाना के कुछ नेताओं से मेल नहीं खाती थी. उनके अनुसार नटराजन एक गांधीवादी नेता हैं, जो सादगी और संगठनात्मक अनुशासन पर जोर देती हैं. ऐसे में उनके और मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के बीच वैचारिक और राजनीतिक टकराव की स्थिति बनना लगभग तय था.

रेवंत रेड्डी के बयान से भी बढ़ा था विवाद

सूत्रों ने इस मतभेद को समझाने के लिए मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के एक पुराने बयान का भी उल्लेख किया है. हाल ही में उन्होंने HYDRAA को लेकर दिए गए एक बयान से विवाद खड़ा कर दिया था.

बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान रेवंत रेड्डी ने कहा था कि 'हाइड्रा' शब्द एडोल्फ हिटलर का पसंदीदा शब्द था और इसी से प्रेरित होकर HYDRAA नाम रखा गया. उनके इस बयान पर विपक्ष के साथ-साथ कई राजनीतिक हलकों में भी सवाल उठे थे. कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि इस तरह के बयानों और नटराजन की राजनीतिक सोच के बीच स्पष्ट वैचारिक अंतर दिखाई देता था.

दस्तावेज बीजेपी तक कैसे पहुंचे?

कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि नटराजन के खिलाफ इस्तेमाल हुई जानकारी तेलंगाना से मध्य प्रदेश तक एक सुनियोजित चैनल के जरिए पहुंचाई गई. बताया जा रहा है कि रेवंत रेड्डी के एक करीबी सहयोगी ने यह जानकारी मध्य प्रदेश के एक प्रभावशाली कांग्रेस नेता के बेटे तक पहुंचाई. दोनों के बीच व्यक्तिगत मित्रता होने की बात कही जा रही है.

इसके बाद कथित तौर पर दस्तावेज उस वरिष्ठ कांग्रेस नेता तक पहुंचे और फिर वहां से बीजेपी के नेताओं को उपलब्ध करा दिए गए. सूत्रों का दावा है कि यहीं से पूरा मामला राजनीतिक हथियार बन गया.

नाराजगी मीनाक्षी से ज्यादा राहुल गांधी से?

मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक नेता ने दावा किया कि राज्य में असली नाराजगी मीनाक्षी नटराजन को लेकर नहीं थी, बल्कि राहुल गांधी के फैसले को लेकर थी. कई वरिष्ठ नेताओं को यह स्वीकार नहीं था कि उम्मीदवार चयन जैसे महत्वपूर्ण फैसले में उनसे सलाह-मशविरा नहीं किया गया.

सूत्रों के मुताबिक, कुछ नेताओं को लगा कि पार्टी के पुराने और अनुभवी नेताओं की राय को नजरअंदाज किया गया है. इसी नाराजगी ने बाद में राजनीतिक घटनाक्रम को और जटिल बना दिया.

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल

मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना, सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलना और फिर पार्टी के भीतर से जानकारी लीक होने के आरोप— इन सभी घटनाओं ने कांग्रेस नेतृत्व को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने ही नेताओं की अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी का शिकार हो रही है?

यदि पार्टी के भीतर से ही रणनीतिक सूचनाएं बाहर जा रही हैं, तो यह केवल एक राज्यसभा सीट का मामला नहीं बल्कि संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व की पकड़ का भी प्रश्न बन जाता है. यही कारण है कि मीनाक्षी नटराजन प्रकरण अब कांग्रेस की आंतरिक राजनीति, राहुल गांधी के नेतृत्व और संगठन के भीतर भरोसे की स्थिति पर बड़ी बहस का विषय बन गया है.

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