भारतीय राजनीतिक दलों के लिए परिवार जरूरी या मजबूरी? सख्त मायावती भी नहीं हो पा रहीं खड़ी, भाई-भतीजों में उलझी राजनीति
भारतीय राजनीति में परिवारवाद कितना मजबूत है? मायावती और आकाश आनंद के बदलते समीकरण के बीच ADR के पार्टीवार आंकड़े बताते हैं कि कई दलों में परिवार की भूमिका अहम है.
देश की राजनीति में परिवारवाद को चाहे कोई भी सियासी दल कितना विरोध कर ले, पर वो खुद भी उसे अछूता नहीं है. बहुजन समाज पार्टी की राजनीति में मायावती ने लंबे समय तक परिवारवाद से दूरी को अपनी अलग पहचान के तौर पर पेश किया. लेकिन सितंबर 2026 में उनके भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से अलग करने और फिर भतीजे ईशान आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाने के फैसलों ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया. 12 सितंबर को मायावती ने कहा था कि उनके दोनों भतीजे आकाश और ईशान पार्टी में कोई पद नहीं संभालेंगे, लेकिन 23 सितंबर को उन्होंने ईशान आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बना दिया. सवाल इसलिए बड़ा है कि जिस मायावती ने परिवार को राजनीति से दूर रखने की कोशिश की, क्या उन्हें भी संगठन और उत्तराधिकार के सवाल पर परिवार की तरफ लौटना पड़ा?
क्या मायावती का परिवार से दूरी बनाने का प्रयोग अब सवालों में है?
मायावती का राजनीतिक मॉडल दूसरे बड़े दलों से अलग रहा है. उन्होंने अपने परिवार को पार्टी का राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के बजाय खुद को बसपा का केंद्रीय चेहरा बनाए रखा. लेकिन 2026 में घटनाक्रम ने दिखाया कि परिवार को पूरी तरह राजनीति से बाहर रखना भी आसान नहीं है. आकाश आनंद पहले पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचे, फिर सितंबर में उनसे जिम्मेदारियां वापस ली गईं. मायावती ने आकाश के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास के घटनाक्रम को भी इससे जोड़ा और कहा कि आकाश के लिए परिवार और पार्टी के बीच प्राथमिकता का सवाल पैदा हो गया था. इसके कुछ ही दिन बाद ईशान आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाए जाने से यह सवाल और बड़ा हो गया कि क्या परिवार को पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक राजनीति में संभव है?
आंकड़े बताते हैं परिवारवाद सिर्फ कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों की बीमारी नहीं?
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR के 2025 के विश्लेषण में 5,203 मौजूदा सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों में से 1,106 यानी 21 फीसदी को राजनीतिक परिवारों से जुड़ा पाया गया. लोकसभा में यह हिस्सेदारी 31 फीसदी थी, जबकि राज्य विधानसभाओं में करीब 20 फीसदी. यानी परिवारवाद सिर्फ किसी एक पार्टी या एक विचारधारा तक सीमित नहीं है.
पार्टीवार आंकड़े भी तस्वीर साफ करते हैं. ADR के राष्ट्रीय दलों के विश्लेषण में कांग्रेस के 32 फीसदी और बीजेपी के 17 फीसदी सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि मिली.
वहीं क्षेत्रीय पार्टियों की बात करें तो NCP-शरदचंद्र पवार 42 फीसदी, JKNC 42 फीसदी, YSRCP 38 फीसदी, TDP 36 फीसदी और NCP 34 फीसदी पर रहे. समाजवादी पार्टी, जेडीयू और आरजेडी जैसे दलों में भी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी या उससे अधिक बताई गई. इसके मुकाबले AITC में यह आंकड़ा 10 फीसदी और AIADMK में 4 फीसदी रहा.
कांग्रेस-बीजेपी में परिवारवाद के आंकड़े क्या कहानी बताते हैं?
कांग्रेस का सबसे बड़ा उदाहरण नेहरू-गांधी परिवार है. जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के बाद सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तक यह राजनीतिक परिवार पार्टी की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा है. लेकिन परिवारवाद का आंकड़ा केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है. ADR के अनुसार राष्ट्रीय दलों के मौजूदा प्रतिनिधियों में कांग्रेस की 32 फीसदी हिस्सेदारी के मुकाबले बीजेपी में भी 17 फीसदी प्रतिनिधि राजनीतिक परिवारों से आते हैं.
यानी बीजेपी का परिवारवाद पर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के खिलाफ राजनीतिक हमला अपनी जगह है, लेकिन आंकड़े यह नहीं कहते कि बीजेपी में राजनीतिक परिवार पूरी तरह नहीं है. फर्क यह है कि बीजेपी का केंद्रीय संगठन किसी एक परिवार पर आधारित नहीं है. यही वजह है कि बीजेपी और कांग्रेस को एक ही पैमाने पर देखना सही नहीं होगा. फिर भी आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि परिवारवाद भारतीय राजनीति की किसी एक पार्टी की समस्या नहीं है.
क्या सपा और आरजेडी में परिवार ही पार्टी की पहचान है?
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी इसका बड़ा उदाहरण है. मुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव तक नेतृत्व का हस्तांतरण परिवार के भीतर हुआ और परिवार के कई सदस्य सक्रिय राजनीति में रहे हैं. बिहार में लालू प्रसाद यादव का परिवार आरजेडी की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहा है और तेजस्वी यादव ने राजनीतिक उत्तराधिकार को आगे बढ़ाया है. ADR के पार्टीवार आंकड़ों में SP और RJD दोनों को उच्च पारिवारिक प्रतिनिधित्व वाले दलों में रखा गया है.
महाराष्ट्र में शरद पवार परिवार, आंध्र प्रदेश में नायडू परिवार, जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार और तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार के उदाहरण बताते हैं कि क्षेत्रीय राजनीति में परिवार कई बार संगठन का स्थायी राजनीतिक ब्रांड बन जाता है. ADR के आंकड़ों में NCP-शरदचंद्र पवार 42 फीसदी, JKNC 42 फीसदी, TDP 36 फीसदी और NCP 34 फीसदी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों के साथ ऊपर दिखाई देते हैं.
क्या शिवसेना, NCP और दूसरे दल बताते हैं परिवारवाद ताकत और कमजोरी?
महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार और पवार परिवार इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं. शिवसेना की राजनीति लंबे समय तक ठाकरे परिवार के इर्द-गिर्द रही और एनसीपी में शरद पवार परिवार की भूमिका प्रमुख रही. लेकिन परिवार के भीतर राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष होने पर पार्टी में टूट भी पैदा हो सकती है. यही वजह है कि परिवार पार्टी को पहचान और नेतृत्व की निरंतरता तो देता है, लेकिन उत्तराधिकार का सवाल आने पर वही परिवार पार्टी के लिए संकट भी बन सकता है.
ADR की रिपोर्ट यह भी बताती है कि परिवारवाद का संबंध केवल सीटों के ट्रांसफर से नहीं है. राजनीतिक दल टिकट देते समय जीतने की क्षमता, स्थानीय नेटवर्क, पैसा, मौजूदा राजनीतिक प्रभाव और परिवार की पहचान को महत्व देते हैं. यानी परिवारवादी उम्मीदवार कई बार पार्टी के लिए आसान और कम जोखिम वाला चुनावी विकल्प बन जाता है.
क्या मायावती के मामले में असली सवाल परिवार नहीं, उत्तराधिकारी है?
यहीं मायावती का मामला सबसे अलग दिखाई देता है. कांग्रेस, SP, RJD या ठाकरे परिवार की तरह बसपा में कोई स्पष्ट पारिवारिक उत्तराधिकार व्यवस्था लंबे समय तक नहीं रही. मायावती ने परिवार को पार्टी की कमान देने से दूरी बनाए रखी. लेकिन 2026 में आकाश आनंद और ईशान आनंद को लेकर लगातार बदलते फैसलों ने दिखाया कि परिवार का सवाल बसपा में भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
23 सितंबर को ईशान आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाते हुए मायावती ने उन्हें आगे बढ़ाने का फैसला किया, जबकि कुछ दिन पहले ही दोनों भतीजों को राजनीति से दूर रखने की बात कही गई थी.
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा राजनीतिक सवाल निकलता है- क्या परिवार से दूरी बनाना ही परिवारवाद का विकल्प है, या फिर किसी बड़े नेता को परिवार के बाहर भी मजबूत दूसरी पंक्ति तैयार करनी होगी? मायावती की चुनौती यहीं है. अगर संगठन में उनके बाद का नेतृत्व स्पष्ट और मजबूत नहीं है तो परिवार से दूरी का मॉडल भी टिकाऊ नहीं दिखेगा. वहीं परिवार को आगे बढ़ाने पर वही सवाल खड़ा होगा, जिससे मायावती दशकों तक खुद को अलग रखती रही हैं.
ADR के आंकड़े बताते हैं कि 21 फीसदी मौजूदा जनप्रतिनिधियों का राजनीतिक पारिवारिक बैकग्राउंड होना महज संयोग नहीं है. यह टिकट वितरण, चुनावी जीत की संभावना, संगठनात्मक पकड़ और राजनीतिक विरासत से जुड़ी एक पूरी व्यवस्था है. मायावती का मौजूदा प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इसी व्यवस्था से अलग रास्ता बनाने की कोशिश का सबसे बड़ा उदाहरण रही हैं. 2026 के उनके फैसले यह सवाल फिर खड़ा कर रहे हैं कि क्या भारतीय राजनीति में परिवार से पूरी दूरी बनाकर सत्ता और संगठन की अगली पीढ़ी तैयार करना हकीकत में संभव है?




