मुर्दाबाद के नारे पर देश निकाला का आदेश, जज माधव जामदार कौन जिन्होंने सरकार-पुलिस को पढ़ाया प्रदर्शन और आंदोलन का पाठ
सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका पर सुनवाई के दौरान जज माधव जामदार ने पुलिस को जमकर लताड़ लगाई है.
Bombay High Court Justice Madhav Jamdar
सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन और नारेबाजी को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट के जज माधव जामदार ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी नागरिक को केवल सरकार के फैसलों का विरोध करने या उसके खिलाफ नारे लगाने के आधार पर किसी क्षेत्र से निष्कासित नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि ऐसा करना संविधान द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा.
यह टिप्पणी सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई. अदालत ने मुंबई पुलिस द्वारा उनके खिलाफ जारी एक साल के देश निकाला आदेश को रद्द करते हुए कहा कि सरकार की आलोचना करना या उसके फैसलों का विरोध करना किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों के दायरे में आता है.
सुनवाई से जुड़ी 7 बड़ी बातें
1. जज माधव जामदार ने कहा "याचिकाकर्ता ने अपनी क्षमता के अनुसार भारत सरकार द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों के विरुद्ध मोर्चे और धरने आयोजित किए हैं. यह महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को देश से निष्कासित करने का आधार नहीं हो सकता. की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है. निष्कासन आदेश को रद्द करते हुए याचिका का निपटारा किया जाता है."
2. सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और पूछा कि क्या अब नागरिकों को सरकार के खिलाफ विरोध करने का अधिकार भी नहीं रहेगा. न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा "ये क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को भारतीय सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते, ये सब क्या है?"
3. उन्होंने कहा "अब इतने सारे पेपर लीक हो गए हैं. अगर लोग विरोध करते हैं, तो आप उन पर केस दर्ज कर देंगे... ये क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है... याचिकाकर्ता ने तो बस 'भाजपा सरकार मुर्दाबाद', 'अमित शाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए हैं नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए निष्कासन के आदेश क्यों?"
4. अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस का दायित्व कानून का पालन कराना है, न कि किसी सरकार या राजनीतिक दल के हितों की रक्षा करना. न्यायाधीश ने कहा "पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के सेवक नहीं हैं, वे लोक सेवक हैं. मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाने जा रहा हूं."
5. रिकॉर्ड के अनुसार, सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ दर्ज अधिकांश एफआईआर केंद्र सरकार के विभिन्न फैसलों के विरोध में आयोजित प्रदर्शन, धरना और रैलियों से जुड़ी थीं. इनमें नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे मुद्दों पर किए गए विरोध प्रदर्शन भी शामिल थे.
6. सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और दल-बदल की राजनीति पर हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की. उन्होंने कहा "परसों एक दस वर्षीय बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में क्या चर्चा हो रही थी कि पीठासीन अधिकारी का चुनाव कैसे होता है और वह कैसे एक पार्टी से दूसरी पार्टी में बदल जाता है... ये क्या है? आप (सईद) को भी पाला बदल लेना चाहिए... वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में खरीद-फरोख्त चल रही है. आपके (सईद) खिलाफ कुछ एफआईआर दर्ज हैं... मामले बदलने पर विचार करें, यहां तो वाशिंग मशीन लगी है."
7. अदालत ने पुलिस उपायुक्त (जोन-6) द्वारा 3 दिसंबर 2025 को जारी निष्कासन आदेश और कोंकण डिवीजन के संभागीय आयुक्त द्वारा 27 मार्च 2026 को पारित आदेश दोनों को रद्द कर दिया. इन आदेशों के तहत सईद को एक साल के लिए संबंधित क्षेत्र से निष्कासित किया गया था.
कौन हैं जस्टिस माधव जामदार?
जज माधव जामदार का जन्म 13 जनवरी 1967 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था. उनके पिता जे.डी. जामदार भी न्यायिक सेवा से जुड़े रहे और बॉम्बे सिटी सिविल कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुके थे. माधव जामदार ने मुंबई के कीर्ति कॉलेज से बीएससी (B.Sc.) की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उन्होंने दादर स्थित न्यू लॉ कॉलेज से वर्ष 1991 में एलएलबी (LL.B.) की डिग्री हासिल की.
वकालत शुरू करने के बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में सिविल, आपराधिक और संवैधानिक मामलों की पैरवी की तथा लंबे समय तक वकील के रूप में काम किया. जनवरी 2020 में उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया. इसके बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की और विभिन्न संवैधानिक मुद्दों पर फैसले दिए.




