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भारत-जापान रीसेट: रक्षा, AI, सेमीकंडक्टर समेत 5 सेक्टर क्यों बने मोदी-ताकाइची समिट के सबसे बड़े गेमचेंजर?

मोदी-ताकाइची समिट के बाद भारत-जापान संबंध नए दौर में पहुंच गए हैं. रक्षा, AI, सेमीकंडक्टर, निवेश, सप्लाई चेन और चीन फैक्टर के बीच समझें इस रणनीतिक साझेदारी का पूरा विश्लेषण.

India Japan Reset Modi Takaichi Summit
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दुनिया इस समय तीन बड़े संकटों से गुजर रही है. पहला, चीन की आक्रामक विदेश और सैन्य नीति, जिसने दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान स्ट्रेट और भारत की LAC और हिंद महासागर तक तनाव बढ़ाया. दूसरा, रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट में ईरान-इजरायल संघर्ष, जिसने ऊर्जा और वैश्विक सप्लाई चेन को अस्थिर कर दिया. तीसरा, अमेरिका-चीन टेक्नोलॉजी वॉर, जिसने सेमीकंडक्टर, AI और रेयर अर्थ मिनरल्स को नए दौर का हथियार बना दिया.

बदलते जियो पॉलिटिक्स की बीच भारत और जापान का रिश्ता अब केवल ODA लोन, बुलेट ट्रेन या व्यापार तक सीमित नहीं है. दोनों देश ऐसी रणनीतिक साझेदारी बना रहे हैं, जिसमें सुरक्षा, हाई टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्री, सप्लाई चेन और इंडो-पैसिफिक की शक्ति संतुलन एक साथ जुड़ गए हैं. यही इस समिट का सबसे बड़ा संदेश है. रक्षा, एआई, सेमिकंडक्टर, निवेश को लेकर लिए गए फैसले आने वाले समय में गेमचेंजर साबित होंगे.

1. चीन की 'Two Front Challenge' का जवाब गठजोड़

साल 2014 के बाद भारत-जापान के बीच रक्षा संबंधों में सबसे तेजी विस्तार हुआ. जापान अब भारत का स्पेशल स्ट्रेटजिक और ग्लोबल पार्टनर बन गए हैं. दोनों देशों के बीच 2+2 मंत्री वार्ता, Acquisition and Cross Servicing Agreement (ACSA) और नियमित Dharma Guardian, Veer Guardian तथा Malabar Naval Exercise जैसी सैन्य एक्सरसाइज हो रही हैं.

जापान पहली बार रक्षा उपकरण और डुअल-यूज टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट पर गंभीरता से विचार कर रहा है. दोनों देश समुद्री डोमेन अवेयरनेस, ड्रोन, साइबर सिक्योरिटी और अंडरवॉटर सर्विलांस में सहयोग बढ़ा रहे हैं.

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन एक साथ पूर्वी चीन सागर, ताइवान, दक्षिण चीन सागर और भारत की सीमा पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाता रहा है. ऐसे में हिंद-प्रशांत में भारत और जापान का रक्षा सहयोग चीन के लिए अभी से रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है.

2. सेमीकंडक्टर: चीन का नया विकल्प बनना चाहता है भारत

आज दुनिया के लगभग 75% एडवांस्ड चिप्स का उत्पादन ईस्ट एशिया में केंद्रित है. जापान फोटोरेजिस्ट, सिलिकॉन वेफर, हाई-एंड मशीनरी और चिप मटेरियल में विश्व का प्रमुख खिलाड़ी है. जबकि भारत डिजाइन इंजीनियर और बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार उपलब्ध कराता है.

भारत ने 10 अरब डॉलर (करीब ₹76 हजार करोड़) का Semiconductor Mission शुरू किया है. जापानी कंपनियां जैसे Renesas, Tokyo Electron, Rapidus और कई सप्लाई चेन कंपनियां भारत में अवसर तलाश रही हैं.

यदि जापानी टेक्नोलॉजी और भारतीय मैन्युफैक्चरिंग एक साथ आती है तो भारत केवल मोबाइल असेंबली हब नहीं रहेगा बल्कि पूरी चिप वैल्यू चेन का हिस्सा बन सकता है. इससे चीन आधारित सप्लाई चेन पर वैश्विक निर्भरता भी घटेगी.

3. AI और हाई टेक्नोलॉजी: भारत स्केल, जापान देगा टेक्नोलॉजी

AI की वैश्विक दौड़ में अमेरिका और चीन सबसे आगे हैं, लेकिन भारत और जापान अलग मॉडल तैयार करना चाहते हैं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, विशाल डेटा बेस और लाखों AI इंजीनियर उपलब्ध कराता है. दूसरी ओर जापान रोबोटिक्स, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन, सेंसर टेक्नोलॉजी और हाई प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग में सबसे आगे है.

दोनों देशों की योजना हेल्थकेयर, स्मार्ट फैक्ट्री, एजुकेशन, साइबर सिक्योरिटी, क्वांटम कंप्यूटिंग और इंडस्ट्रियल AI में संयुक्त रिसर्च बढ़ाने की है. इसका लक्ष्य केवल तकनीक विकसित करना नहीं बल्कि अमेरिका और चीन के बीच तीसरा भरोसेमंद टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम तैयार करना है.

4. जापान भारत पर इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है?

जापान पिछले दो दशकों से भारत का सबसे बड़ा विकास साझेदार रहा है. दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल, मेट्रो प्रोजेक्ट, फ्रेट कॉरिडोर और कई औद्योगिक परियोजनाएं जापानी सहायता से चल रही हैं.

2022 में जापान ने अगले पांच वर्षों में भारत में 5 ट्रिलियन येन (करीब 42 अरब डॉलर) निवेश और वित्तीय सहयोग का लक्ष्य घोषित किया था. यह निवेश ग्रीन एनर्जी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, स्टार्टअप और स्मार्ट सिटी तक फैला हुआ है.

नई सरकार के साथ अब दोनों देश इस लक्ष्य को आगे बढ़ाकर नई पीढ़ी की तकनीकों, क्लीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं.

5. भारत से जापान चाहता क्या है?

  • जापान केवल निवेश नहीं कर रहा, बल्कि उसे भारत से तीन बड़े फायदे चाहिए.
  • पहला, चीन के विकल्प के रूप में विश्वसनीय मैन्युफैक्चरिंग बेस.
  • दूसरा, 1.4 अरब आबादी वाला विशाल उपभोक्ता बाजार.
  • तीसरा, युवा और कुशल कार्यबल, जिसकी जापान में तेजी से कमी हो रही है क्योंकि वहां आबादी बूढ़ी हो रही है.
  • भारत के लिए भी यह रिश्ता उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे जापान से पूंजी, हाई टेक्नोलॉजी, रक्षा सहयोग, इंडस्ट्रियल नॉलेज और वैश्विक सप्लाई चेन में जगह मिल सकती है. इसलिए यह संबंध केवल निवेश का नहीं बल्कि Technology, Talent और Trust मॉडल पर आधारित है.

क्यों तेजी से बढ़ रही है दोनों के बीच दोस्ती?

2010 के दशक तक दोनों देशों का रिश्ता मुख्य रूप से आर्थिक था, लेकिन 2020 के बाद भू-राजनीति ने इसे रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया. गलवान संघर्ष, ताइवान संकट, दक्षिण चीन सागर में बढ़ती चीनी गतिविधियां, रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट संघर्ष ने यह साफ कर दिया कि किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर सप्लाई चेन भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं है.

एशिया की नई शक्ति समीकरण का आगाज

मोदी-ताकाइची समिट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत और जापान अब केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक की नई आर्थिक और सामरिक व्यवस्था तैयार करना चाहते हैं. रक्षा, सेमीकंडक्टर, AI, ग्रीन एनर्जी, सप्लाई चेन और हाई-टेक निवेश जैसे क्षेत्रों में बढ़ती साझेदारी आने वाले दशक में एशिया की शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है. चीन पर निर्भर वैश्विक व्यवस्था का विकल्प तैयार करने की कोशिश में भारत-जापान की यह साझेदारी सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक मानी जा रही है.

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