भारत में Graduate Jobs का संकट: 5 Million Graduates के मुकाबले सिर्फ 2.8 Million Jobs क्यों?
भारत में हर साल 50 लाख स्नातक जुड़ रहे हैं, लेकिन रोजगार सिर्फ 28 लाख बढ़ रहा है. जानिए ग्रेजुएट बेरोजगारी, कौशल अंतर और रोजगार संकट की वजहें.
देश के अलग-अलग यूनिवर्सिटीज से हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर कॉलेज से निकलते हैं. हर परिवार को उम्मीद होती है कि अब नौकरी मिलेगी, घर में आमदनी शुरू होगी और करियर आगे बढ़ेगा. लेकिन भारत के रोजगार बाजार की तस्वीर इस उम्मीद से बिल्कुल अलग कहानी बता रही है. डिग्री लेने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उनके लिए परमानेंट और अच्छी नौकरियों में बढ़ोतरी उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो रहा रहा है. यही असंतुलन आने वाले वर्षों में भारत के सबसे बड़े आर्थिक और सामाजिक जोखिमों में बदल सकता है.
बेंगलुरु स्थित अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2023 के बीच भारत में हर साल करीब 50 लाख स्नातक जुड़े, जबकि रोजगार में शामिल स्नातकों की संख्या में औसतन करीब 28 लाख प्रति वर्ष की बढ़ोतरी हुई. इनमें केवल करीब 17 लाख की बढ़ोतरी वेतन वाली नौकरियों में हुई. यानी समस्या केवल बेरोजगारों की संख्या की नहीं है, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच लगातार बढ़ती खाई की भी है.
50 लाख ग्रैजुएट के मुकाबले रोजगार इतने कम क्यों?
भारत में पिछले चार दशकों में उच्च शिक्षा का जबरदस्त विस्तार हुआ है. 20 से 29 वर्ष की उम्र में स्नातकों की संख्या 1983 में करीब 50 लाख से बढ़कर 2023 में लगभग 6.3 करोड़ हो गई. लेकिन रोजगार बाजार इस बढ़ती स्नातक आबादी को उसी अनुपात में काम नहीं दे पाया.
इसका मतलब यह नहीं कि हर साल कॉलेज से निकलने वाले 50 लाख स्नातकों में से 22 लाख सीधे बेरोजगार हो जाते हैं. कुछ आगे की पढ़ाई करते हैं, कुछ अपना काम शुरू करते हैं, कुछ असंगठित क्षेत्र में चले जाते हैं और कुछ रोजगार की तलाश में ही नहीं होते.
लेकिन हर साल करीब 50 लाख नए स्नातकों का जुड़ना और रोजगार में स्नातकों की संख्या का केवल करीब 28 लाख बढ़ना एक गंभीर संकेत जरूर है. इसका अर्थ है कि स्नातकों की बढ़ती संख्या की तुलना में रोजगार के अवसरों का विस्तार बहुत धीमा है.
डिग्री और नौकरी के बीच Skill सबसे बड़ी वजह क्या?
सिर्फ डिग्री अब नौकरी की गारंटी नहीं है. कंपनियों को ऐसे युवा चाहिए, जिनके पास तकनीकी जानकारी के साथ संवाद करने, समस्या हल करने, आंकड़ों को समझने और बदलती तकनीक के साथ काम करने की क्षमता हो.
दूसरी ओर, कई यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में सिलेबस अभी भी उद्योग और रोजगार बाजार की वास्तविक जरूरतों से पूरी तरह जुड़ी नहीं है. नतीजा यह होता है कि युवा के पास शैक्षणिक योग्यता तो होती है, लेकिन नौकरी के लिए जरूरी व्यावहारिक कौशल की कमी रह जाती है. इसे डिग्री और कौशल के बीच का अंतर कहा जा सकता है. यही अंतर नौकरी की तलाश को लंबा करता है और कंपनियों के लिए भी सही उम्मीदवार ढूंढना मुश्किल बनाता है.
हालांकि, पूरी समस्या का दोष केवल युवाओं की कौशल कमी पर डालना सही नहीं होगा. अगर अर्थव्यवस्था पर्याप्त संख्या में अच्छी नौकरियां पैदा ही नहीं कर रही है, तो योग्य और कुशल स्नातकों के बीच भी प्रतिस्पर्धा बढ़ना तय है.
क्या भारत में स्नातकों के लिए जरूरी रोजगार नहीं बढ़ रहे?
यही समस्या का दूसरा बड़ा कारण है. बड़ी संख्या में स्नातकों को रोजगार देने के लिए केवल सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. भारत को विनिर्माण, आधुनिक सेवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त, परिवहन, पर्यटन और दूसरे उत्पादक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की जरूरत है.
जब अर्थव्यवस्था में अच्छी वेतन वाली स्थायी नौकरियों की संख्या स्नातकों की बढ़ती आबादी की तुलना में धीमी गति से बढ़ती है, तो युवाओं के सामने सीमित विकल्प रह जाते हैं. वे लंबे समय तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी स्वीकार करते हैं या अस्थायी और असंगठित काम की ओर चले जाते हैं.
इसका असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहता. लंबे समय तक नौकरी की तलाश से युवा की कमाई शुरू होने में देरी, करियर की शुरुआत में रुकावट और परिवार की आर्थिक सुरक्षा प्रभावित होती है.
आखिर इतने स्नातक बेरोजगार क्यों रह जाते हैं?
समस्या की गंभीरता 20 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं के आंकड़ों से समझी जा सकती है. 2023 में इस आयु वर्ग के करीब 6.3 करोड़ स्नातकों में लगभग 1.1 करोड़ बेरोजगार थे. बेरोजगार युवाओं में स्नातकों की हिस्सेदारी करीब 67 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्नातक युवाओं के लिए स्थायी रोजगार हासिल करना आसान नहीं है. स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 के अनुसार, बेरोजगार पुरुष स्नातकों में एक साल के भीतर स्थायी वेतन वाली नौकरी हासिल करने वालों की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत से भी कम है. परमानेंट व्हाइट कॉलर जॉब के मामले में यह हिस्सा करीब 3.7 प्रतिशत है. यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा देते हैं. दूसरी तरफ कई युवा अपनी शैक्षणिक योग्यता से काफी नीचे की नौकरियां करने को मजबूर होते हैं.
क्या बेरोजगारी भारत के डेमोग्राफिक लाभ के लिए खतरा है?
भारत की युवा आबादी को लंबे समय से देश की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत माना जाता रहा है. इसे जनसांख्यिकीय यानी डेमोग्राफिक लाभ कहा जाता है. लेकिन युवा आबादी तभी आर्थिक ताकत बन सकती है, जब उसके लिए पर्याप्त उत्पादक और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध हों.
अगर करोड़ों युवा शिक्षा पूरी करने के बाद लंबे समय तक बेरोजगार या अपनी योग्यता से कम स्तर के काम में लगे रहते हैं, तो इस जनसांख्यिकीय लाभ का फायदा कमजोर पड़ सकता है. कम आमदनी, करियर में देरी, आर्थिक असुरक्षा और बढ़ती प्रतियोगिता का असर परिवारों और समाज पर भी पड़ सकता है.
इसका समाधान सिर्फ डिग्रियां देने में नहीं है. भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो रोजगार की वास्तविक जरूरतों से जुड़ी हो. साथ ही अर्थव्यवस्था को ऐसे क्षेत्रों का विस्तार करना होगा जो लाखों शिक्षित युवाओं के लिए स्थायी, उत्पादक और बेहतर वेतन वाली नौकरियां पैदा कर सकें.
स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 के निष्कर्ष बताते हैं कि स्नातक बेरोजगारी केवल कौशल की समस्या नहीं है, बल्कि रोजगार सृजन और शिक्षा से काम तक पहुंचने की पूरी व्यवस्था की संरचनात्मक समस्या भी है. करीब 40 प्रतिशत स्नातक युवा बेरोजगारी और स्थायी वेतन वाली नौकरियों तक सीमित पहुंच इस संकट की गंभीरता को सामने रखती है.




