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34 साल किया लाल सलाम, फिर छाया Mamata का नीला अंबर, अब भगवा में रंगने को कितना बेचैन बंगाल?

2021 में चूकने के बाद BJP 2026 में पूरी ताकत झोंक रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस अपने वेलफेयर मॉडल पर भरोसा कर रही है. बंगाल की सत्ता इस बार पहचान की राजनीति और एंटी-इनकंबेंसी पर टिका है.

West Bengal Election 2026 TMC vs BJP Mamata Banerjee
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ममता बनर्जी, ज्योति बसु और बिधान चंद्र रॉय

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से सियासी रंगों की राजनीति देखने को मिलता रहा है. जहां सत्ता से सिर्फ सरकार नहीं बदलती, बल्कि वहां का पूरा राजनीतिक मॉडल ही उसका रंग लाल से नीला हो जाता है. कभी कांग्रेस का रंग तो उसके बाद वामपंथ का लाल सलाम दौर आया. ​34 साल बाद वामपंथियों को किला दरका तो ममता बनर्जी का वेलफेयर प्लस तुष्टिकरण का मॉडल यानी नीला रंग छा गया. अब 2026 के चुनाव से पहले एक नया सवाल तेजी से चर्चा में है. क्या बंगाल में भारतीय जनता पार्टी यानी भगवा रंग सत्ता पर काबिज होने में कामयाब होगी? सच में इस बार क्या होगा, यह तो 4 मई को वोटों की गिनती के बाद सामने आएगा. फिलहाल, इस मसले पर बंगाल के चुनावी माहौल में चर्चा चरम पर है.

पिछले 74 साल के इस सियासी सफर में 25 साल लगातार कांग्रेस, 34 साल लगातार कम्युनिस्ट तो पिछले 15 साल से टीएमसी वहां की सत्ता पर काबिज है. यानी बंगाल की राजनीति सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि विचारधाराओं, सामाजिक गठबंधनों और जनभावनाओं के बदलते दौर की कहानी है.

कांग्रेस से कम्युनिस्ट तक: क्या थी अस्थिरता से स्थिरता की तलाश?

आजादी के बाद शुरुआती दशकों में बंगाल में कांग्रेस का दबदबा जरूर रहा, लेकिन यह दौर राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और नक्सल आंदोलन जैसी चुनौतियों से भरा था. जनता के भीतर एक स्थिर और वैकल्पिक शासन की मांग धीरे-धीरे बढ़ती गई. इसी असंतोष ने वामपंथी ताकतों को जमीन दी और 1977 में सत्ता परिवर्तन का रास्ता साफ हुआ, जिसने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. कांग्रेस के शासनकाल में देश की आजादी के बाद सबसे पहले प्रफुल्ल चंद्र घोष 1947–1948, बिधान चंद्र रॉय 1948-1962, प्रफुल्ल चंद्र सेन 1962–1967, अजय मुखर्जी 1967–1969 और 1969–1970 और सिद्धार्थ शंकर रे 1972–1977 सीएम बने थे.

कम्युनिस्टों के 34 साल में क्या बदला और क्यों कमजोर हुआ मॉडल?

1977 से 2011 तक वाम मोर्चा ने 34 साल लगातार शासन किया, जो भारतीय राजनीति में रिकॉर्ड है. इस दौर में भूमि सुधार (ऑपरेशन बर्गा) और पंचायत सशक्तिकरण जैसे कदमों ने ग्रामीण समाज में गहरी पकड़ बनाई. लेकिन समय के साथ औद्योगिक विकास की कमी, रोजगार संकट और सिंगूर-नंदीग्राम जैसे विवादों ने इस मॉडल को कमजोर कर दिया. जनता में बदलाव की चाह बढ़ी और वामपंथ का युग धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोता गया. इस दौर में ज्योति बसु सबसे ज्यादा समय तक और फिर कुछ वर्षों के लिए बुद्धदेव भट्टाचार्य वहां के सीएम रहे.

ममता बनर्जी का मॉडल कैसे बना गेम चेंजर?

2011 में ममता बनर्जी ने ​सिंगूर और नंदीग्राम संघर्ष के जरिए वाम किले को ढहाते हुए सत्ता हासिल की और एक नया मॉडल पेश किया. यह मॉडल वेलफेयर योजनाओं, पॉपुलिस्ट नीतियों और मजबूत ग्रासरूट नेटवर्क पर आधारित था. कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार और सबुज साथी जैसी योजनाओं ने सीधे जनता, खासकर महिलाओं और गरीब वर्ग को प्रभावित किया. इस रणनीति ने TMC को लगातार चुनावी जीत दिलाई. अब टीएमसी को लेकर भी बंगाल का बड़ा तबका टीएमसी के बदले नए विकल्प की तलाश में है.

क्या 2026 में बंगला में भगवा झंडा फहराएगा?

दरअसल,, पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. साल 2014 से 2021 के बीच पार्टी ने अपने वोट शेयर और सीटों में तेजी से बढ़ोतरी की है. अब वह मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी है. हिंदुत्व, राष्ट्रीय मुद्दों और केंद्र की योजनाओं के प्रचार के जरिए BJP ने खासकर शहरी और सीमावर्ती क्षेत्रों में पकड़ मजबूत की है. 2021 विधानसभा चुनाव में बीजेपी 38 फीसदी से ज्यादा वोट पाने में कामयाब हुई थी. यही वजह है कि 2026 में उसके लिए सत्ता तक पहुंचने की संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

2026 का चुनाव किन फैक्टर्स पर तय होगा?

बांगाल विधानसभा चुनाव 2026 का चुनाव कई अहम समीकरणों पर टिका है. एक तरफ TMC का वेलफेयर मॉडल और महिला वोट बैंक है, तो दूसरी तरफ BJP की पहचान आधारित राजनीति. ग्रामीण इलाकों में TMC की पकड़ मजबूत बनी हुई है. जबकि शहरी क्षेत्रों में BJP का प्रभाव बढ़ रहा है. इसके अलावा लंबे शासन के कारण एंटी-इनकंबेंसी भी एक बड़ा फैक्टर है, लेकिन सरकारी योजनाएं इसे संतुलित करने का काम कर रही हैं. नेतृत्व के स्तर पर TMC के पास ममता बनर्जी जैसा मजबूत चेहरा है, जबकि BJP संगठनात्मक ताकत पर भरोसा कर रही है.

विधानसभा चुनाव 2026ममता बनर्जी
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