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कहानी 42 साल कोमा में रहने वाली Aruna Shanbaug की, जिनकी वजह से बना वो कानून जिससे हुई हरीश राणा की मौत, दोनों में अंतर क्या?

42 साल तक कोमा में रहीं अरुणा शानबाग का केस भारत में पैसिव यूथेनेशिया कानून की नींव बना, लेकिन उन्हें इच्छामृत्यु नहीं मिली. वहीं हरीश राणा को उसी कानून के तहत ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ की अनुमति दी गई. यही दोनों मामलों का सबसे बड़ा अंतर है.

कहानी 42 साल कोमा में रहने वाली Aruna Shanbaug की, जिनकी वजह से बना वो कानून जिससे हुई हरीश राणा की मौत, दोनों में अंतर क्या?
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी4 Mins Read

Updated on: 24 March 2026 10:30 PM IST

@BihariMan1-X

भारत में 'इच्छामृत्यु' यानी Right to Die With Dignity को लेकर जो बहस आज दिख रही है, उसकी जड़ें एक दर्दनाक कहानी से जुड़ी हैं. Aruna Shanbaug की कहानी. 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी और 24 मार्च को उनकी मौत हो गई. लेकिन यह फैसला अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे एक ऐसा केस था जिसने देश के कानून को बदल दिया.

एक तरफ Harish Rana थे. 13 साल से कोमा में, जिनके परिवार ने उन्हें दर्द से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाई. दूसरी तरफ थीं अरुणा शानबाग- 42 साल तक कोमा में रहीं, लेकिन उनके केस में कोर्ट ने मौत की इजाजत नहीं दी. यही विरोधाभास इस कहानी को समझना जरूरी बनाता है.

कौन थीं Aruna Shanbaug और कैसे बदली उनकी जिंदगी?

मुंबई के KEM अस्पताल में नर्स के तौर पर काम करने वाली अरुणा शानबाग की जिंदगी 27 नवंबर 1973 की रात हमेशा के लिए बदल गई. उसी अस्पताल के एक वार्ड बॉय ने उन पर हमला किया और गला लोहे की चेन से कस दिया. इस हमले के कारण उनके दिमाग तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और वे Permanent Vegetative State (PVS) में चली गईं. शरीर जिंदा था, लेकिन चेतना खत्म हो चुकी थी.

42 साल तक 'जिंदा लाश' की तरह कैसे जीती रहीं अरुणा?

अरुणा शानबाग अगले 42 साल तक अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी रहीं. खाना, पानी, सफाई हर चीज के लिए वे दूसरों पर निर्भर थीं. सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि उनका परिवार नहीं, बल्कि KEM अस्पताल की नर्सों ने उन्हें अपनी जिम्मेदारी मानकर उनकी सेवा की. यह इंसानियत की मिसाल बन गया.

इच्छामृत्यु की मांग क्यों उठी और क्या हुआ कोर्ट में?

2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की याचिका दाखिल की. उनका तर्क था कि अरुणा वर्षों से असहनीय स्थिति में हैं और उन्हें मुक्ति मिलनी चाहिए. लेकिन अस्पताल की नर्सों ने इसका विरोध किया. उनका कहना था 'अरुणा हमारी अपनी हैं, हम उनकी देखभाल कर रहे हैं, उन्हें मारने का अधिकार किसी को नहीं है.'

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग की इच्छामृत्यु की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने माना कि वह पूरी तरह मृत नहीं हैं और उन्हें देखभाल मिल रही है. लेकिन इसी फैसले में पहली बार भारत में Passive Euthanasia को कानूनी मान्यता दी गई. यानी लाइलाज मरीजों का लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए कोर्ट और मेडिकल बोर्ड की अनुमति जरूरी होगी.

अरुणा शानबाग की मौत कैसे हुई?

2011 के फैसले के बाद भी अरुणा करीब 4 साल तक जीवित रहीं. 2015 में उन्हें निमोनिया हो गया और 18 मई को उन्होंने अंतिम सांस ली. उनका अंतिम संस्कार भी अस्पताल के स्टाफ ने किया. जो इस बात का प्रतीक था कि उन्होंने जिंदगी का सबसे लंबा संघर्ष अकेले नहीं लड़ा.

हरीश राणा केस क्या था?

हरीश राणा 2013 में एक हादसे के बाद कोमा में चले गए थे. 13 साल तक परिवार ने उनका इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ. आखिरकार परिवार ने सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की मांग की. कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर 11 मार्च 2026 को अनुमति दे दी. इसके बाद AIIMS में 10 दिन की प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाया गया और 24 मार्च को उनकी मृत्यु हो गई.

दोनों मामलों में असली अंतर क्या है?

अरुणा शानबाग केस

यह एक कानून बनाने वाला केस था. कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी. लेकिन Passive Euthanasia को लीगल बना दिया

हरीश राणा केस

यह उसी कानून का इस्तेमाल था. कोर्ट ने मेडिकल आधार पर अनुमति दी. लाइफ सपोर्ट हटाकर ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ दी गई.

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