क्या हैं आर्टिकल 325 और 326, क्यों SIR पर बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने किया जिक्र
आर्टिकल 325 और 326 क्या हैं और वोटर लिस्ट से इनका क्या संबंध है? SIR पर बात करते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां ने इन दोनों संवैधानिक प्रावधानों का जिक्र क्यों किया? जानें पूरी डिटेल
हैदराबाद में 19वें NALSAR-Justice B.R. Sawhney Memorial Moot Court Competition के समापन समारोह में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने वोट देने के अधिकार और मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर अहम बात कही. उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी तादाद में भारतीय नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में बिना वोट के नागरिक बन जाते हैं, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ होगा.
जस्टिस भुइयां ने खास तौर पर कहा कि संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता. एक वे जिनके पास वोट देने का अधिकार है और दूसरे वे जिनके पास यह अधिकार नहीं है. उनके मुताबिक, लाखों लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली कोई प्रक्रिया “मनमानी” है. अपने बयान के दौरान उन्होंने Article 325 और Article 326 का जिक्र किया.
अनुच्छेद 325 और 326 पर क्या बोले जस्टिस भुइयां?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अनुच्छेद 325 हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक नॉर्मल वोटर लिस्ट की व्यवस्था करता है. इसके साथ ही केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर करने पर रोक लगाता है. वहीं, अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को मताधिकार के आधार पर कराने की व्यवस्था करता है. इसमें संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त कुछ अयोग्यताओं को छोड़कर वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार दिया गया है.
Article 325 क्या कहता है?
Article 325 का सीधा संबंध वोटर लिस्ट से है. इसके तहत हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होनी चाहिए. किसी शख् को केवल उसके धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर वोटर लिस्ट से बाहर नहीं किया जा सकता. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चुनावी व्यवस्था में इस तरह का भेदभाव न हो. आसान भाषा में समझें तो किसी व्यक्ति के धर्म, जाति या लिंग को आधार बनाकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका नाम वोटर लिस्ट में नहीं होगा.
Article 326 क्या कहता है?
Article 326 चुनाव में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था करता है. इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होते हैं. यानी आम तौर पर 18 साल या उससे अधिक उम्र का भारतीय नागरिक चुनाव में वोट दे सकता है, बशर्ते वह संविधान और कानून में तय किसी अयोग्यता के दायरे में न आता हो. संविधान में कुछ आधारों पर मतदाता को अयोग्य ठहराने की व्यवस्था है, जैसे नॉन रेज़ीडेंसी, मानसिक रूप से अस्वस्थ होना, अपराध या भ्रष्ट और अवैध चुनावी एक्टीविटीज से जुड़ी अयोग्यता.
जस्टिस भुइयां ने दोनों अनुच्छेदों का जिक्र क्यों किया?
जस्टिस भुइयां की बात का मेन फोकस यह था कि वोट देने का अधिकार केवल एक सामान्य कानूनी अधिकार नहीं है. उन्होंने इसे नागरिकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा कि वोटिंग का अधिकार संविधान के ढांचे में अहम हिस्सा रखता है. उनका कहना था कि चुनावी व्यवस्था से जुड़ी किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया को ऐसी स्थिति नहीं पैदा करनी चाहिए, जिसमें बड़ी तादाद में नागरिक अपने मतदान के अधिकार से ही वंचित हो जाएं.
क्या वोटर लिस्ट से नाम सीधे हटाया जा सकता है?
यहीं जस्टिस भुइयां ने 1995 के सुप्रीम कोर्ट के Lal Babu Hussain बनाम Electoral Registration Officer मामले का भी जिक्र किया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने और हटाने से जुड़े अहम मुद्दों पर विचार किया था. जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में कहा कि किसी वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हटाने से पहले उसे नोटिस और अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जो मतदाता मर चुके हैं उनके मामले को छोड़कर, एक बार वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने के बाद उसे बिना नोटिस और सुनवाई के हटाया नहीं जाना चाहिए.
क्या वोट के अधिकार को नागरिकता से अलग किया जा सकता है?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि किसी भारतीय नागरिक की पहचान से उसके वोट देने के अधिकार को अलग नहीं किया जा सकता. उन्होंने इसकी तुलना “शरीर से आत्मा निकालने” से की. उनके कमेंट का मतलब यह है कि नागरिक और उसके मतदान के अधिकार के बीच मजबूत संवैधानिक संबंध है. अगर किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में नागरिकों का वोट का अधिकार खत्म हो जाता है, तो उसका असर केवल मतदाता सूची पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी पर भी पड़ता है




