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21 साल का युवा बनेगा मंत्री? प्रधान के इस्तीफे के बाद रेवंत रेड्डी का नया सियासी दांव, जानिए क्या कहता है संविधान

रेवंत रेड्डी के 21 साल के युवाओं को मंत्री बनाने वाले प्रस्ताव पर संविधान क्या कहता है? जानिए क्या राज्य सरकार कानून बदल सकती है या इसके लिए संविधान संशोधन जरूरी होगा.

21 साल का युवा बनेगा मंत्री? प्रधान के इस्तीफे के बाद रेवंत रेड्डी का नया सियासी दांव, जानिए क्या कहता है संविधान
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नीट पेपर लीक 2026 मामले में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने 21 वर्ष के युवाओं को मंत्री बनाने की वकालत कर एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी राज्य की सरकार चाहे तो क्या वह कानून बनाकर 21 साल के युवक या युवती को मंत्री बना सकती है? क्या विधानसभा में ऐसा विधेयक पारित हो जाए तो वह अपने आप लागू हो जाएगा? या फिर संविधान इसके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है? इन सवालों का जवाब भारतीय संविधान के प्रावधानों में छिपा है. जानें, इसके लिए क्या है सविंधान में जरूरी प्रावधान.

क्या 21 साल का व्यक्ति मंत्री बन सकता है?

नहीं. मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत 21 वर्ष का व्यक्ति मंत्री नहीं बन सकता. इसका कारण सीधे तौर पर भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) और अनुच्छेद 173 हैं.

अनुच्छेद 173 के अनुसार किसी व्यक्ति को राज्य विधानसभा का सदस्य बनने के लिए कम से कम 25 वर्ष का होना अनिवार्य है. जबकि विधान परिषद (जहां परिषद मौजूद है) का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष निर्धारित है.

अनुच्छेद 164(4) कहता है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्री बनाया जाता है और वह विधायक नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होगा. लेकिन यदि वह 25 वर्ष की आयु ही पूरी नहीं करता, तो विधायक बनने की पात्रता ही नहीं होगी. ऐसे में वह छह महीने बाद मंत्री पद पर नहीं रह सकता.

क्या राज्य सरकार कानून बनाकर उम्र 21 साल कर सकती है?

  1. इस सवाल का भी सीधा जवाब है-नहीं. मुख्यमंत्री केवल प्रस्ताव दे सकते हैं या राजनीतिक मांग उठा सकते हैं, लेकिन वह स्वयं कानून बदलने की शक्ति नहीं रखते. यदि राज्य विधानसभा भी 21 वर्ष की आयु तय करने वाला कानून पारित कर दे, तब भी वह संविधान के खिलाफ माना जाएगा.
  2. इसका कारण यह है कि विधायक बनने की न्यूनतम आयु संविधान में निर्धारित है, न कि किसी सामान्य राज्य कानून में. कोई भी राज्य कानून संविधान के विपरीत नहीं हो सकता. यदि ऐसा कानून बनाया जाता है, तो उसके खिलाफ अदालत में चुनौती दी जाएगी और उसके असंवैधानिक घोषित होने की पूरी संभावना होगी.

अगर विधानसभा ऐसा कानून पास कर दे तो क्या होगा?

  • मान लीजिए किसी राज्य की विधानसभा 21 वर्ष की आयु में मंत्री बनाने का कानून पारित कर देती है. इसके बाद भी वह स्वतः लागू नहीं होगा.
  • पहला, राज्यपाल उस विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं.
  • दूसरा, यदि कानून लागू भी हो जाए तो कोई भी नागरिक या संगठन हाईकोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दे सकता है.
  • तीसरा, न्यायालय यह देखेगा कि क्या यह कानून संविधान के अनुरूप है. चूंकि संविधान में विधायक बनने की आयु 25 वर्ष तय है, इसलिए ऐसा कानून संवैधानिक प्रावधान से टकराने के कारण निरस्त किया जा सकता है.

21 साल के युवा को मंत्री बनाना हो तो रास्ता क्या?

दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता संजय अग्रवाल का कहना है कि यदि पूरे देश में 21 वर्ष की आयु में मंत्री बनने का प्रावधान लागू करना है, तो पहले संविधान संशोधन करना होगा.

इसके लिए संसद को संविधान संशोधन विधेयक पारित करना पड़ेगा. चूंकि यह विषय राज्यों की कार्यपालिका और संविधान से जुड़ा है, इसलिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन की प्रक्रिया अपनानी होगी. आवश्यकता पड़ने पर आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं की भी मंजूरी लेनी पड़ सकती है.

जब तक संविधान में विधायक बनने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष रहेगी, तब तक 21 वर्ष के व्यक्ति के मंत्री बनने का रास्ता कानूनी रूप से बंद रहेगा.

कॉरपरोरेट लॉयर अमरेंद्र कुमार उर्फ मुन्ना का कहना है कि संविधान में 25 साल के उम्र के किसी भी व्यक्ति को मंत्री नहीं बनाया जा सकता. ऐसे व्यक्ति को सीएम या पीएम मंत्री बना भीं दे तो उन्हें केंद्र में मंत्री बनने के लिए छह महीने के अंदर राज्यसभा या लोकसभा संदस्य बनना अनिवार्य है. उसी तरह राज्य सरकार में मंत्री बनने के लिए विधानसभा या विधान परिषद का मेंबर होना आवश्यक है. इसके बिना किसी भी शख्स को मंत्री बनाना संविधान के वर्तमान प्रारूप में संभव नहीं हे.

संविधान का अनुच्छेद 368 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 संविधान में संशोधन (Constitutional Amendment) करने की प्रक्रिया और संसद की शक्तियों को निर्धारित करता है. इसके तहत केवल संसद को संविधान में बदलाव करने का अधिकार है. संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है, लेकिन इसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत आवश्यक होता है.

यानी सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है. कुछ मामलों में, जैसे केंद्र-राज्य संबंध, राष्ट्रपति के चुनाव या राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रावधानों में संशोधन के लिए कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी अनिवार्य होती है.

इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर संशोधन लागू होता है. इसलिए यदि 21 वर्ष की आयु में मंत्री बनने जैसी व्यवस्था करनी हो और उसके लिए संविधान के प्रावधानों में बदलाव आवश्यक हो, तो यह केवल अनुच्छेद 368 के तहत संसद द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से ही संभव है, न कि किसी राज्य सरकार या विधानसभा के साधारण कानून से.

क्या केवल मंत्री बनने की उम्र घटाई जा सकती है?

व्यावहारिक रूप से इसका उत्तर भी नहीं है. क्योंकि मंत्री बनने की पात्रता केंद्र में सांसद बनने और राज्य में अंततः विधायक या विधान परिषद सदस्य बनने से जुड़ी हुई है. यदि विधानसभा सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष है, तो केवल मंत्री बनने की आयु 21 वर्ष तय करने का कोई अलग संवैधानिक प्रावधान नहीं बनाया जा सकता.

पहले भी बदली है चुनाव लड़ने की उम्र

भारतीय संविधान में पहले मतदान की आयु 21 वर्ष थी. वर्ष 1988 में 61वें संविधान संशोधन के जरिए इसे घटाकर 18 वर्ष किया गया और 1989 से यह लागू हुआ. स्पष्ट है कि आयु सीमा बदली जा सकती है, लेकिन केवल संविधान संशोधन के माध्यम से, न कि किसी राज्य सरकार या विधानसभा के साधारण कानून से.

इस मामले में रेवंत रेड्डी का प्रस्ताव राजनीतिक रूप से युवाओं को सियासी संदेश देने वाला और पार्टी के पक्ष में नैरेटिव बनाने वाला हो सकता है, लेकिन मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में 21 वर्ष का व्यक्ति मंत्री नहीं बन सकता. कोई मुख्यमंत्री या राज्य विधानसभा अकेले यह नियम नहीं बदल सकती. इसके लिए संसद द्वारा संविधान संशोधन आवश्यक होगा. जब तक संविधान के अनुच्छेद 173 और 164 में बदलाव नहीं होता, तब तक 25 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति मंत्री बनने की संवैधानिक पात्रता हासिल नहीं कर सकता.

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