वीरान गांव, 2 बुजुर्ग और अधूरे इंतजार की कहानी… विनोद कापड़ी को कैसे आया फिल्म Pyre का आइडिया, उत्तराखंड का कौन सा सच?
विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ उत्तराखंड के घोस्ट विलेज की दर्दभरी कहानी दिखाती है. ऐसे गांव, जहां पलायन के कारण घर खाली हो चुके हैं और आबादी खत्म हो गई है. फिल्म में एक बुजुर्ग दंपति 28 साल पहले लापता हुए अपने बेटे हरिया का इंतजार कर रहा है. यह कहानी अकेलेपन, यादों और पलायन के दर्द को बयां करती है.
विनोद कापड़ी की फिल्म पायर इन दिनों बहुत चर्चा में हैं. यह उत्तराखंड के घोस्ट विलेज ( भूतिया गांव , ऐसे वीरान और खाली हो चुके गांवों को कहा जाता है, जहां अब कोई आबादी नहीं रहती है) पर बेस्ड है . सरकारी और पलायन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में ऐसे लगभग 1,792 से अधिक गांव हैं जो पूरी तरह खाली होकर 'घोस्ट विलेज' बन चुके हैं.
पायर ऐसे ही गांव की एक कहनी हैं जहां एक बूढ़े दंपति रहते हैं और 28 साल पहले अपने लापता हुए बेटे हरिया का इंतजार कर रहे हैं. उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र (मुनस्यारी के पास) के एक ऐसे वीरान गांव की है, जहां से काम और बेहतर जीवन की तलाश में नौजवान और बच्चे शहर पलायन कर चुके हैं. वहां अब केवल ये दोनों की बचे हैं. बुढ़ापे के इस पड़ाव पर जब चारों तरफ सन्नाटा और खाली मकानों पर ताले लटके हों, तब यह दंपति किस तरह अपनी यादों, खामोशी और एक-दूसरे के साथ से जीवन गुजारता है, यही फिल्म का मूल भाव है.
विनोद कापड़ी ने नवभारत टाइम्स (एनबीटी) को दिए गए एक इंटरव्यू में बताया कि असल में ये लोगों के बीच के प्यार की कहानी हैं. जिन्होंने पूरा जावन साथ बिताया है. यह कहानी मां-बांप के बच्चों के प्रति प्रेम को दर्शाती हैं. इस फिल्म मके लिए विनोद कापड़ी ने किसी प्रतिष्ठित एक्टर को नहीं चुना, बल्कि उन लोगों को एक्टिंग सिखवाई जिनकते जीवन पर आधारित ये कहानी है. कहानी के भौगोलिक परिवेश को देखते हुए उन्होंने पहाड़ों में गांव-गांव जाकर बुजुर्गों के ऑडिशन किए और कुमाऊं के 80 वर्षीय पद्म सिंह (केसर सिंह) और हीरा देवी को चुना, जिन्होंने इससे पहले कभी कैमरा तक नहीं देखा था. इन दोनों को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में ट्रेनिंग दी गई.
फिल्म ने 18 अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीते
विनोद बताते हैं कि इस फिल्म की प्रतीक्षा और सहनशीलता की भावना की तुलना प्रसिद्ध लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यास 'कर्नल को कोई लिखने वाला नहीं' (El coronel no tiene quien le escriba) से की है. उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की बेहद खुशी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 18 पुरस्कार जीतने के बाद अब यह फिल्म भारत के बड़े पर्दे पर दर्शकों तक पहुंचेगी और हिमालय की खूबसूरती व इसके जज्बात को लोग महसूस कर पाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि सिनेमा भूगोल की सीमाओं में नहीं बंधा होना चाहिए, इसलिए वे इस फिल्म को मोबाइल थिएटर के जरिए उत्तराखंड के उन छोटे शहरों और गांवों तक भी ले जाना चाहते हैं जहां सिनेमाघर नहीं हैं.
विनोद ने बताया कि यह फिल्म पायर एक तरह का प्रयश्चित है. विनोद ने अपने जमीन, जड़ों, पहाड़ों का छोड़ा. उन्हें भातर ही भीतर यह बात परेशान करती रही. नौकरी के लिए आप यहां आ गए और एक पत्रकार लके नाते अगर सोचें तो किस तरह पश्चाताप करें और वििनोद के लिए ये वही है.
कहां से आया आइडिया?
इंटरव्यू में आगे उन्हों ने बताया कि वो 2017 में उत्तराखंड के मुनस्यारी में ट्रेकिंग पर गए थे, यहां पर एक दंपति उन्हें बकरियां चराता मिला. उन्होंने उनसे बात की तो पता लगा कि वहां पर सड़क, बिजली, अस्पताल कुछ नहीं है. रोज उठकर बकरियां चराना, खाना पकाना, खाना और सो जाने उनके लिए यही जीवन है. इनमें से पति ने बताया कि उसकी एक चिंता है, जब पत्नी बीमार होती तो नीचे ले जाने का जरिया नहीं होता, डंडा-डोली करके ले जेना पड़ता है. फिर विनोद को यह एहसास हुआ कि यह एक कहानी है और इस पर फिल्म बननी चाहिए.
विनोद का कहना है कि वह संवेदनशील कहानियों पर फिल्म कर सकते हैं, बड़ी फिल्म, बड़े कलेवर, बड़े तेवर वाली फिल्म बनाने में उनकी रुचि भी नहीं है और उनका टैलंट भी नहीं है. वो ऐसी कहानियां कहना चाहते थे, जिसे लोग याद रखें. जैसे पीहू की कहानी खबर से ही आई थी. उन्होंने न्यूज चैनल में काम करते हुए 30 सेकंड की न्यूज देखी कि एक बच्ची अपनी मां के शव के साथ 24 घंटे रही. अब खबरों में यह कहानी कुछ कॉलम या सेकंड्स में सिमट गई लेकिन जब वो डीपली कहानी में गए तो उन्होंने इस पर फिल्म बानाने का विचार किया.
फिल्म बनाने के पीछे क्या था सवाल?
पायर पर वह बताते हैं कि फिल्म हम करेंगे पर उनका एक सवाल था कि कहानी का जो भौगोलिक परिवेश है, जो पहाड़ी चेहरे हैं, क्या वे उनसे न्याय कर पाएंगे? और तब विनोद ने सोचा कि उन्हें बड़े ऐक्टर के मोह में नहीं पड़ना चाहिए. कहानी के हिसाब से कास्टिंग करनी चाहिए और हमने पहाड़ों में गांव-गांव जाकर बहुत से बुजुर्गों के ऑडिशन किए. उसी में हमें पद्म सिंह और हीरादेवी मिले.
हीरादेवी विधवा हैं, जंगल जाकर घास और लकड़ियां काटती हैं,पद्म सिंह फौज से रिटायर हैं, गांव में खेती बाड़ी करते हैं. हमने उनके साथ एक महीने वर्कशॉप किया और यकीन मानिए दोनों ने जादुई काम किया है. शूट के वो 32 दिन मेरे लिए चमत्कार से कम नहीं थे. यही वजह है कि गुलजार साहब से लेकर नामी जर्मन एडिटर पैट्रिशिया रोमेल और लाइफ ऑफ पाई के लिए ऑस्कर जीतने वाले म्यूजिक कंपोजर माइकल डैना सिर्फ फिल्म के रशेस देखकर हमारे सीमित बजट के बावजूद फिल्म से जुड़े.
फिल्म के कई ऐसे सीन हैं जो मनमोहक हैं जैसे हारीदेवी जब पद्म सिंह से कहती हैं कि कितने साल हो गए तुझे नहाए हुए और वो इसका मजेदार जवाब देते हैं. एक और सीन जब पज्म सिंह गुस्से में कहते हैं कि न सड़क है न बिजली है न अस्पताल है, नरक होगई साली जिंदगी.
क्यों कर रहे हैं लोग पलायन?
उत्तराखंड से लोग इसलिए पलायन कर रहे हैं क्योंकि यहां पर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है.पहाड़ी इलाकों में उद्योगों और नौकरी के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। पारंपरिक कृषि से आय बहुत कम होती है और मेहनत अधिक लगती है. गांवों और दूर-दराज के पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अच्छे संस्थानों का अभाव है. बेहतर भविष्य और बच्चों की पढ़ाई के लिए परिवार शहर का रुख करते हैं.
गांवों में बड़े अस्पतालों और डॉक्टरों की भारी कमी है. छोटी बीमारी या आपातकालीन स्थिति (एम्बुलेंस व समय पर इलाज न मिलना) में लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है.कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सड़क संपर्क, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास धीमा रहा है.जंगली जानवरों (जैसे बंदर, सुअर) द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाना और जलवायु परिवर्तन के कारण खेती प्रभावित होना भी एक बड़ी वजह है.यह फिल्म 30 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी.




