नरक हो गई इस पहाड़ पर जिंदगी... 18 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीतने वाली Pyre का ट्रेलर रिलीज, भयावहता ला देगी सामने, VIDEO
उत्तराखंड के पहाड़ों में बसे एक बुजुर्ग दंपती की प्रेम, इंतजार और अकेलेपन की कहानी फिल्म Pyre के ट्रेलर में देखने को मिलती है. विनोद कापड़ी के निर्देशन में बनी यह फिल्म 30 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी. 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी इस फिल्म में पद्म सिंह और हीरा देवी पहली बार अभिनय करते नजर आएंगे.
विनोद कापड़ी की फिल्म pyre जल्द ही सिनेमाघरों में आने वाली है. फिल्म का ट्रेलर रिलीज हो गया है. फिल्म के ट्रेलर की शुरुआत होती है पहाड़ी परिवेश से जिसमें एक बीमार बूढ़ी औरत है. पीछे से बैकग्राउंड म्यूजिक चल रहा होता है और एक नैरेटिव भी जो स्टोरी सुनाता है. डॉक्टर ने उस महिला को बताया है कि उसका खबन कम बनता है. उसे अपने बेटे हरिया का इंतजार है जिसकी चिट्ठी देखकर वो खुश हो जाती है जिसमें लिखा हो कि वो आने वाले है.
वह जश्न मानाने लगती है, उसे डंडा-डोली करके अस्पताल ले जाया जाता है लेकिन बेटा नहीं आता. पहाड़ पर गाड़ी न हो ने के कारण ऐसा किया जाते है. दो पति-पत्नी के बीच के संबंध और फिर हसी मजाक को भी दिखाया गया है.
28 साल के बाह बूढ़े पिता को भी कही न कहीं अपने बेटे का इंतजार है.फिर गांव खाली करने की बात आती है और दोनों को प्रशासन के लोगों के साथ वहां से जाना पड़ता है. आखिर का सीन इमोश्नल टच हे जाता है जब वह बूढ़ा आदमी कहता है चिता बना रहा हूं तेरी, मर गई तो कैसे ले जाउंगा.
यह फिल्म 30 अक्टूबर को सिनेमा घरों में रिलीज होगी. इस फिल्म का लेखन, डायरेक्शन और प्रमोशन विनोद कापड़ी ने किया है. फिल्म को म्यूजिक माइकल डाना ने दिया है. इस फिल्म के जरिए पद्म सिंह और हीरा देवी को इंट्रोड्यूस किया जा रहा है. यह दोनों उत्तराखंड के निवासी है और कभी कैमरा नहीं देखा है.
18 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म Pyre, सिनेपोलिस के ज़रिए सिनेमाघरों में रिलीज़ होने के लिए तैयार है. सिनेपोलिस ने ही फिल्म हनुमान अंश को भी डिस्ट्रीब्यूट किया था. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि हिमालय की पृष्ठभूमि पर बनी यह प्रशंसित फिल्म, उत्तराखंड के एक दूर-दराज गांव में रहने वाले एक बुजुर्ग जोड़े की निजी कहानी की झलक दिखाती है, जो प्यार, साथ और अकेलेपन के बीच अपना जीवन गुजार रहे हैं.
कितना मुश्किल है पहाड़ों पर जीवन, लोग क्यों कर रहे पलायन
उत्तराखंड के पहाड़ों में जीवन जितना खूबसूरत दिखाई देता है, हकीकत में उतना ही कठिन है. ऊंचे पहाड़, घने जंगल और बहती नदियां यहां की सुंदरता बढ़ाते हैं, लेकिन इन्हीं पहाड़ों के बीच रहने वाले लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. गांवों में आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी कई परिवारों के लिए परेशानी बनी हुई है.
यहां महिलाओं को घर संभालने के साथ खेतों में काम करना, मीलों दूर से पानी लाना और मवेशियों के लिए चारा जुटाना पड़ता है. कई गांवों में अस्पताल और स्कूल दूर होने के कारण लोगों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. खेती और पशुपालन से होने वाली कमाई अक्सर परिवार का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होती.
रोजगार के सीमित अवसरों ने उत्तराखंड में पलायन की समस्या को भी बढ़ाया है. बेहतर शिक्षा, नौकरी और सुविधाओं की तलाश में युवा और परिवार गांव छोड़कर देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और दूसरे शहरों की ओर जा रहे हैं. इसके चलते कई गांवों में घर खाली हो रहे हैं और खेत बंजर पड़ते जा रहे हैं.
पहाड़ों से पलायन केवल लोगों का स्थान बदलना नहीं, बल्कि वहां की संस्कृति, परंपराओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने भी एक बड़ी चुनौती है. पहाड़ों में सड़क, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाकर ही गांवों को फिर से आबाद करने की उम्मीद जगाई जा सकती है.




