तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा? जब शराब की लत में जूझकर जान देना चाहते थे एक्टर, एक ब्रेक ने बदल दी लाइफ
पीयूष मिश्रा आज भले ही बॉलीवुड के दमदार कलाकारों में गिने जाते हों, लेकिन उनका सफर बेहद दर्दनाक रहा है. दिल्ली थिएटर और NSD से निकलकर मुंबई पहुंचे पीयूष मिश्रा लंबे समय तक शराब की लत, अकेलेपन और डिप्रेशन से जूझते रहे. कई इंटरव्यू में वे खुद मान चुके हैं कि अगर उन्हें एक्टिंग में सफलता न मिलती, तो उनका अंत बेहद भयावह हो सकता था. विशाल भारद्वाज की मकबूल से मिली पहचान ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी.
पीयूष मिश्रा (Piyush Mishra) आज बॉलीवुड के सबसे बड़े स्टार में से एक है. पीयूष जिन्होंने कभी मणिरत्मान की 'दिल से' डेब्यू किया उन्हें खुद भी अंदाजा नहीं था कि वह इंडस्ट्री में कब तक और कितने दिन तक टिक पाएंगे. लेकिन मेहनत, जब्बा और उससे बड़ा आपका यकीन आपको वो बना के ही रहता है जो आप बनना चाहते है. अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' से अपनी पहचान मजबूत करने वाले पीयूष का एक्टर बनना इतना आसान नहीं था. उनकी सफलता की कहानी के पीछे की सबसे गहरी और दर्दभरी परत है.
ये वो दौर था जब वो दिल्ली के थिएटर से मुंबई की चकाचौंध तक पहुंचने की जद्दोजहद में थे, लेकिन अंदर से पूरी तरह टूट चुके थे.1990 के अंत और 2000 के शुरुआती सालों में पीयूष मिश्रा शराब की लत और डिप्रेशन के गहरे दलदल में फंस गए थे. NSD से निकलकर उन्होंने दिल्ली में कई सफल नाटक किए, अपना शो 'An Evening with Piyush Mishra' चलाया, लेकिन मुंबई आने के बाद शुरुआत में कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिला. वो अकेले थे, आर्थिक तंगी थी, और सबसे बड़ी बात अपने आप से लड़ाई.
'तुम्हारी औकात क्या है'
पीयूष खुद कई इंटरव्यू में कह चुके हैं कि अगर वो मुंबई में एक्टर न बन पाते, तो शायद शराब पी-पीकर सड़क पर लहूलुहान होकर मर जाते. एक रात की वो घटना, जो बहुत कम लोग जानते हैं. एक बार दिल्ली से मुंबई शिफ्ट होने के बाद, वो एक छोटे से फ्लैट में अकेले थे. कई दिनों से शराब के नशे में डूबे हुए, उन्होंने खुद को आईने में देखा. आईने में वो आदमी नहीं दिख रहा था जो कभी ग्वालियर में सपने देखता था, बल्कि एक ऐसा चेहरा था जो खुद से सवाल कर रहा था- 'तुम्हारी औकात क्या है, पीयूष मिश्रा?'. हां, यही वो लाइन है जो बाद में उनकी किताब का टाइटल बनी. उस रात उन्होंने फैसला किया कि या तो वो खुद को खत्म कर लेंगे, या इस लत से बाहर निकलेंगे.
एक ब्रेक और बदल गई जिंदगी
अगले दिन सुबह उन्होंने शराब की बोतल फेंक दी और थिएटर ग्रुप्स में वापस जाना शुरू किया. लेकिन असली मोड़ तब आया जब विशाल भारद्वाज ने उन्हें 'मकबूल' (2003) में काका का रोल ऑफर किया. वो रोल नहीं सिर्फ फिल्मी ब्रेक था, बल्कि जीवन का दूसरा जन्म था. उसके बाद 'गुलाल', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और 'आरंभ है प्रचंड' जैसे गाने आए, जिन्होंने उन्हें अमर कर दिया. लेकिन वो दौर आज भी उनके अंदर जिंदा है. पीयूष कहते हैं, 'मैंने खुद को मारा था, ताकि नया पीयूष पैदा हो सके.'
करियर
पीयूष ने 1986 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) से ग्रेजुएट होने के बाद दिल्ली में थिएटर से करियर शुरू किया. NSD में ही जर्मन डायरेक्टर फ्रिट्ज बेनेविट्ज ने उन्हें 'हैमलेट' के टाइटल रोल में डाला, जो उनकी एक्टिंग की पहली बड़ी ट्रेनिंग थी. 1983 से 2003 तक दिल्ली थिएटर उनका सबसे क्रिएटिव पीरियड था. 'उन्हें ब्लैक फ्राइडे', 'पिंक', 'रिवाल्वर रानी','संजू' और गुलाबो-सीताबों जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है.





