Pyre Movie Review: पहाड़ों की खूबसूरती के पीछे छिपा ऐसा दर्द, जिसे देख आंखें खुलेंगी भी और रोएंगी भी, आखिर क्यों दिल में उतर जाती है पायर
बॉलीवुड की चमक-धमक से दूर विनोद कापड़ी की फिल्म 'पायर' प्यार, अकेलेपन और पहाड़ों से पलायन की ऐसी कहानी दिखाती है, जो दिल को छू जाती है. 80 साल के पदम सिंह और तुलसी का रिश्ता बताता है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी साथ कितना जरूरी होता है. जानिए फिल्म की कहानी, एक्टिंग और डायरेक्शन में कितना दम है.
फिल्म : पायर
निर्देशक : विनोद कापड़ी
कलाकार : पदम सिंह कापड़ी, हीरा देवी
अवधि : 2 घंटे 18 मिनट
रेटिंग : 4.4
बॉलीवुड में आपने प्यार की कई कहानियां देखी होंगी. कभी हीरो-हीरोइन के इश्क ने दिल जीता, तो कभी परिवार की कहानी ने रुलाया लेकिन क्या आपने कभी ऐसी प्रेम कहानी देखी है, जिसमें न कोई बड़ा हीरो है, न कोई चमक-धमक और न ही रोमांस के नाम पर बड़े-बड़े वादे? बस दो बुजुर्ग हैं, उनका छोटा सा घर है और एक-दूसरे का साथ है. विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ कुछ ऐसी ही कहानी लेकर आती है. यह फिल्म सिर्फ दो लोगों के प्यार की कहानी नहीं, बल्कि उन पहाड़ों का दर्द भी है, जहां कभी घरों में रौनक हुआ करती थी, लेकिन आज कई मकानों पर ताले लटके हैं.
कहानी उत्तराखंड के एक छोटे से पहाड़ी गांव की है. यहां 80 साल के पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर एक-दूसरे का सहारा बने हुए हैं. गांव में अब गिनती के लोग ही रह गए हैं. कभी जिन गलियों में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा है. रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में लोग शहरों की तरफ चले गए हैं. पदम सिंह का बेटा भी करीब 28 साल पहले गांव छोड़कर गया था, लेकिन फिर वापस नहीं लौटा.
पदम सिंह और तुलसी की जिंदगी भी आसान नहीं है. तुलसी की तबीयत खराब रहती है और उसे इलाज के लिए शहर ले जाना जरूरी है लेकिन पहाड़ों के मुश्किल रास्ते और गांव में लोगों की कमी उनके लिए बड़ी परेशानी बन जाती है. पहले गांव के दो नौजवान लक्ष्मण और जीवन उनकी मदद कर दिया करते थे, लेकिन अब उनके भी गांव छोड़ने की नौबत आ गई है.
इस कारण पदम सिंह की चिंता और बढ़ जाती है. उसे डर है कि अगर ये लोग भी चले गए, तो वह अपनी बीमार पत्नी की देखभाल कैसे करेगा? फिल्म की शुरुआत ही एक ऐसे मोड़ से होती है, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देता है. आगे कहानी में कई ऐसे पल आते हैं, जहां इंसान की बेबसी और अकेलापन साफ महसूस होता है.
कहानी में प्यार भी है और पहाड़ों का दर्द भी
फिल्म की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह अपने दर्द को दिखाने के लिए हर वक्त रोने-धोने का सहारा नहीं लेती. पदम सिंह और तुलसी की छोटी-छोटी नोक-झोंक कहानी में जान डालती है. दोनों कभी एक-दूसरे से नाराज होते हैं, कभी मजाक करते हैं और कभी ऐसी बातें कह जाते हैं, जिन्हें सुनकर हंसी भी आती है और आंखें भी भर जाती हैं.
एक तरफ दोनों की उम्र बढ़ रही है, दूसरी तरफ उन्हें यह चिंता भी सताती रहती है कि उनके बाद उनका क्या होगा? फिल्म में मौत और बुढ़ापे को लेकर होने वाली बातचीत कई बार दिल को छू जाती है लेकिन इसके बाद भी दोनों का एक-दूसरे के लिए प्यार कम नहीं होता. यही रिश्ता फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है.
पदम सिंह का गांव के लोगों को रोकने के लिए अपनी बकरियां तक देने की कोशिश करना भावुक कर देता है. वह किसी तरह चाहता है कि गांव में कुछ लोग तो रुक जाएं, ताकि यहां की जिंदगी पूरी तरह खत्म न हो जाए लेकिन सवाल यही है कि जब गांव में रोजगार, इलाज और जरूरी सुविधाएं ही नहीं होंगी, तो आखिर लोग रुकेंगे कैसे?
एक्टिंग और डायरेक्शन कैसा है?
विनोद कापड़ी ने इस फिल्म को सिर्फ कैमरे से नहीं, बल्कि अपने एहसासों से बनाया है. पहाड़ों से उनका जुड़ाव फिल्म के हर सीन में नजर आता है. उन्होंने गांव के खाली घरों, सुनसान रास्तों और वहां रह गए बुजुर्गों की जिंदगी को बहुत सादगी से दिखाया है. कहीं भी जबरदस्ती का ड्रामा करने की कोशिश नहीं की गई.
पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी की एक्टिंग फिल्म की जान है. खास बात यह है कि दोनों कलाकार पहले प्रोफेशनल एक्टिंग की दुनिया का हिस्सा नहीं रहे हैं. इसके बावजूद उनके चेहरे के भाव, बातचीत का अंदाज और एक-दूसरे के साथ उनकी केमिस्ट्री असली लगती है.
कैमरा वर्क भी शानदार है. मानस भट्टाचार्य ने उत्तराखंड की खूबसूरती को करीब से दिखाया है. ऊंचे पहाड़, छोटे घर, खाली रास्ते और दूर तक फैले खूबसूरत नजारे आंखों को सुकून देते हैं. वहीं अमन पंत का म्यूजिक और पहाड़ी लोकगीत कहानी के माहौल को और गहरा बना देते हैं.
देखें या नहीं?
अगर आप ऐसी फिल्मों के शौकीन हैं, जिनमें बड़े-बड़े ट्विस्ट की जगह असली जिंदगी की कहानियां दिखाई जाती हैं, तो यह फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिए. हां, फिल्म की रफ्तार थोड़ी धीमी है, इसमें हर मिनट पर कोई नया धमाका या मसालेदार मोड़ नहीं मिलेगा लेकिन इसकी खूबसूरती भी इसी सादगी में छिपी है.
कुल मिलाकर ‘पायर’ एक ऐसी फिल्म है, जो खत्म होने के बाद भी आपके जेहन में चलती रहती है. यह आपको अपने गांव, अपने बुजुर्गों और उन लोगों की याद दिलाएगी, जिनकी जिंदगी में कभी हम ही सबसे बड़ी खुशी हुआ करते थे. फिल्म एक सवाल भी छोड़ जाती है कि विकास की दौड़ में हम कहीं अपने गांव, अपनी जड़ों और अपने लोगों को तो पीछे नहीं छोड़ आए?
Verdict: ‘पायर’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि पहाड़ों के खाली होते घरों और वहां रह गए लोगों की अनकही कहानी है. यह फिल्म शोर नहीं मचाती, बल्कि अपनी खामोशी से बहुत कुछ कह जाती है.




