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EXCLUSIVE: दिलजीत की ‘सतलुज’ पर पूर्व डीजी BSF प्रकाश सिंह बोले- ये ‘शहीदों’ पर फिल्म क्यों नहीं बनाते

दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को लेकर बवाल मचा हुआ है, जिसके बाद सरकार ने इसको ओटीटी पर बैन कर दिया है. इसको लेकर पूर्व डीजीपी BSF प्रकाश सिंह ने भड़ास निकाली है.

EXCLUSIVE: दिलजीत की ‘सतलुज’ पर पूर्व डीजी BSF प्रकाश सिंह बोले- ये ‘शहीदों’ पर फिल्म क्यों नहीं बनाते
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संजीव चौहान
Edited By:संजीव चौहान5 Mins Read

Updated on: 10 July 2026 3:15 PM IST

भारत सरकार ने अगर रिलीज होने के 2-3 दिन के अंदर ही दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज को ओटीटी पर दिखाने पर पाबंदी लगा दी है. तो जरूर सरकार को उसमें कुछ न कुछ नहीं बल्कि बहुत कुछ काला-पीला नजर आया होगा. दूसरी बात यह है कि जब दो तीन साल पहले ही पंजाब-95 के नाम से इस फिल्म को रिलीज करने की नाकाम कोशिशें की गई थीं. उस वक्त भी इससे 175 के करीब सीन (दृष्य) काटकर हटाने को कहा गया था.

आखिर फिर वह क्या वजह रही कि जो मय उन आपत्तिजनस दृष्यों को काटे बिना ही अब दो तीन साल बाद भी ज्यों का त्यों फिल्म का नाम पंजाब-95 बदलकर सतलुज करके दुबारा जबरिया रिलीज कर डाला गया? इससे फिल्म बनाने वालों की मैली मंशा खुद ही जाहिर हो जाती है.”

कौन हैं दबंग प्रकाश सिंह?

यह तमाम बेबाक बातें बयान की हैं भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस 1959 बैच) के दबंग पूर्व अधिकारी सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के रिटायर्ड महानिदेशक और, उत्तर प्रदेश व असम को पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने. नई दिल्ली में मौजूद वरिष्ठ पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह 8 जुलाई 2026 को स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान से विशेष लंबी बात कर रहे थे.

शहीदों पर फिल्म क्यों नहीं बनाते?

“स्टेट मिरर हिंदी” के एक सवाल का जवाब देने की बजाए प्रकाश सिंह ने सवाल ही दागा, “मैं आपसे और इस तरह की बे-सिर पैर की बेतुकी, देश को आग में झोंकने वाली फिल्मों को बनाने वालों से सवाल करता हूं कि उन्हें, इसी तरह के विवादित मुद्दों पर फिल्में बनाने की क्यों सूझती है? ऐसी बेतुकी फिल्में बनाने वालों को देश की सेवा में अपनी जान न्योछावर करने वाले शहीदों, उन लाखों हजारों शहीदों के परिवारों के हालात के ऊपर फिल्म बनाने का आइडिया आखिर क्यों कभी नहीं आता है?”

‘पंजाब95’ बनाम ‘सतलुज’ इनसाइड स्टोरी

क्या ‘पंजाब95’ का नाम बदलकर उसे ‘सतलुज’ के नाम से दुबारा बिना आपत्तिजनक दृष्यों को काटे हुए ही हू-ब-हू हालात (पूर्ववत स्थिति) में अब कई साल बाद ओटीटी पर जबरिया ही रिलीज कर देना, क्या इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में फैले भारत विरोधी नासूर यानी खालिस्तानी आंदोलन की आग अब तक हारे हुए बैठे खालिस्तान समर्थकों के दिमागों में सुलग रही है?

आतंकवाद का वह खौफ और मैं

सवाल के जवाब में उन दिनों (1980-1990 के दशक में जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था) पंजाब में सीमा सुरक्षा बल के महानिरीक्षक रह चुके प्रकाश सिंह कहते हैं, “दरअसल यह उस दौर की बात है कि जब मैं तो भारत के पंजाब की पाकिस्तान से जुड़ी सीमाओं की हिफाजत के लिए आईजी बीएसएफ के पद पर वहां तैनात था. तब मगर किसी भी फोर्स या पैरा-मिलिट्री फोर्स का कोई अधिकारी जवान पंजाब या पाकिस्तान से जुड़ी पंजाब की हदों की रखवाली-निगरानी की ड्यूटी करने के राजी नहीं था. शायद यही वजह रही होगी कि जब मेरे आईजी बीएसएफ से प्रमोशन की बारी आई तब भी देश की हुकूमत ने मुझे ही प्रमोट करके एडिश्नल डायरेक्टर जनरल बीएसएफ बनाकर पंजाब में ही कान्टीन्यू कर दिया.”

खालिस्तान मूवमेंट पाकिस्तानी था

अपनी बात जारी रखते हुए पंजाब में उस वक्त (तत्कालीन) बीएसएफ के अतिरिक्त महा-निदेशक रह चुके प्रकाश सिंह कहते हैं, “दरअसल खालिस्तान मूवमेंट में एक कौम विशेष को भारत बांटकर उन्हें अलग देश देने का लालच पाकिस्तान द्वारा दिया गया था. पाकिस्तान पंजाब को भारत से काटकर खालिस्तान बनकर बंग्लादेश की टीस का हिसाब बराबर करना चाहता था. जिसे खालिस्तानी मूवमेंट को कुचलकर हिंदुस्तान ने पाकिस्तान के कुचक्र को अंजाम तक नहीं पहुंचने दिया.

‘सतलुज’ देश विरोधी ‘कु-कृत्य’

भले ही इस सब खूनी खेल के बीच देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी जान ही क्यों न गंवानी पड़ गई हो. कुछ गलतियां सबसे होती हैं. मुझसे भी हुई होंगी. अनजाने में हुई गलती तो क्षमा की जा सकती है लेकिन यह जो पंजाब95 या फिर नाम बदल कर बना डाली गई सतलुज फिल्म अनजाने में हुई गलती नहीं. यह जानबूझकर किया गया कु-कृत्य है. फिर वही सवाल कि जिन महानुभावों को ‘पंजाब95’ या ‘सतलुज’ जैसी देश विरोधी फिल्मों को बनाने की सनक सवार रहती है ऐसे लोग देश की सैन्य ताकत, देश की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि सुधारने वाली और शहीदों को नमन करने वाली फिल्में क्यों नहीं बनाते हैं?

सरकार को कम आंकना गलत है

सरकार कम-अक्ल नहीं है जो उसने दो तीन दिन में ही सतलुज को ओटीटी से हटवा दिया. कहीं अगर यह फिल्म चलती रहती तो कोई बड़ी बात नहीं कि इस कथित भड़काऊ फिल्म से कुछ देश विरोधी लोगों की भावनाएं भड़क जातीं और देश फिर किसी अनहोनी की आग में झुलस उठता. देश की मौजूदा हुकूमत ने सतलुज पर पाबंदी लगाकर दो टूक जता-बता दिया है कि चंद सिरफिरों के हाथों में भारत की सुरक्षा, एकता और संप्रभुता को नहीं खेलने दिया जाएगा.”

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