CHARAK TEASER : अंधभक्ति की यह डरावनी कहानी, रोंगटे खड़े कर देगा तांत्रिक का शव नोंचकर खाने का सीन
'चरक: आस्था का मेला' का टीजर रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर चर्चा में है. फिल्म ग्रामीण भारत में अंधविश्वास और तांत्रिक प्रथाओं की डरावनी सच्चाई को उजागर करती है.
CHARAK OFFICIAL TEASER: फिल्म 'चरक: आस्था का मेला' जिसे अंग्रेजी में Charak: Fair of Faith भी कहा जा रहा है, का टीजर हाल ही में रिलीज हो चुका है. यह फिल्म 'द केरल स्टोरी' के मशहूर निर्देशक सुदीप्तो सेन द्वारा प्रोड्यूस की गई है. सुदीप्तो सेन ने इस बार निर्देशन की कमान शिलादित्य मौलिक को सौंपी है. फिल्म 6 मार्च 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. यह फिल्म एक थ्रिलर-हॉरर टाइप की कहानी है, जो भारत के ग्रामीण इलाकों में होने वाले अंधविश्वास, तांत्रिक प्रथाओं और अंधभक्ति की गहरी और डरावनी सच्चाई को दिखाती है.
टीजर सिर्फ 52 सेकंड का है, लेकिन इसमें इतनी दहशत भरी झलकियां हैं कि देखते ही मन में कई सवाल उठने लगते हैं. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में कई अच्छे कलाकार हैं- अंजली पाटिल, साहिदुर रहमान, सुब्रत दत्ता, शशि भूषण, नलनीश नील, शंखदीप और शौनक श्यामल. यह फिल्म PEN Studios द्वारा प्रेजेंटेड है.
क्या है टीजर में?
टीजर में एक रहस्यमय चरक मेला दिखाया गया है. यह मेला एक त्योहार की तरह लगता है, जहां रंग-बिरंगे उत्सव, भीड़ और खुशी के माहौल हैं. लेकिन साथ ही बहुत डरावने और खौफनाक सीन भी हैं. जैसे कि एक तांत्रिक किसी शव (लाश) को नोंचकर खाता हुआ दिखता है. टीजर में एक बड़ा सवाल पूछा गया है- चरक में लाशों की भेंट क्यों चढ़ाते हैं? और इसका जवाब और भी चौंकाने वाला है- वो चाहें तो अपना जिगर का टुकड़ा भी हम काटकर दे सकते हैं.' ये लाइनें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
यह कैसी आस्था की सनक?
कहानी के बारे में थोड़ा और बताएं तो यह फिल्म एक ऐसे समुदाय की बात करती है, जहां लोग इस चरक मेले को अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने का आखिरी मौका मानते हैं. जैसे-जैसे मेला आगे बढ़ता है, आस्था की सनक को बढ़ता जाता है. लोग बलिदान देते हैं, अजीब-अजीब अनुष्ठान करते हैं. धीरे-धीरे विश्वास, भक्ति और बलिदान के बीच की लाइन धुंधली पड़ जाती है. फिल्म अंधविश्वास की वजह से होने वाली भयानक घटनाओं, भटकी हुई आध्यात्मिकता और इंसानी मन की गहराइयों में उतरती है.
डरावनी सच्चाई
कहानी में कई लोग रहस्यमय हालातों और नैतिक दुविधाओं से जूझते दिखाई देते हैं. एक तरफ पारंपरिक उत्सव है, दूसरी तरफ उसमें छिपी हुई डरावनी सच्चाई. निर्देशक सुदीप्तो सेन ने खुद कहा है कि इस फिल्म को बनाने की प्रेरणा भारतीय तांत्रिक और रहस्यमयी दुनिया को दुनिया भर में एक सिनेमाई अनुभव के रूप में दिखाने से आई है. यह फिल्म सिर्फ डर नहीं दिखाती, बल्कि इंसानी भावनाओं को भी गहराई से छूती है- जैसे डर, विश्वास, बलिदान और नैतिकता के सवाल.





