क्या है उस नाटक की कहानी जिस पर बनी है 'Batwara 1947', पाकिस्तान में क्यों किया गया था बैन?
सनी देओल की आगामी फिल्म 'बटवारा 1947' के पीछे असगर वजाहत के चर्चित नाटक की गहरी छाप बताई जा रही है. यह वही कहानी है जिसने विभाजन के दर्द को दिखाया और पाकिस्तान में विवादों के चलते प्रतिबंध का सामना किया.
सनी देओल 'गदर 2' के तीन साल बाद एक बार फिर बड़े पर्दे पर भारत-पकिस्तान की कहानी सामने ला रहे है. जिसका नाम है 'बटवारा 1947' (Batwara 1947), टीज़र रिलीज होते है दर्शकों में जबरदस्त एक्साइटमेंट देखने को मिली. आमिर खान के प्रोडक्शन में तैयार हुई यह फिल्म 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने को तैयार है. फिल्म की कहानी 1947 भारत-पकिस्तान विभाजन पर आधारित है. लेकिन फिल्म से जुड़ी एक दिलचस्प कड़ी सामने आई है जिसके तार सीधे पकिस्तान से जुड़ रहे है. साल 1947... तारीख 14 और 15 अगस्त की दरमियानी एक तरफ आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा था, तो दूसरी तरफ इतिहास का सबसे खौफनाक मंजर लिखा जा रहा था.
जमीन बंटी, मकान बंटे और रातों-रात इंसानों के बीच मजहब की ऐसी दीवार खड़ी कर दी गई जिसने लाखों हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए तबाह कर दिया. विभाजन के इसी दर्द, खौफ और इंसानी लालच को जब एक नाटक के जरिए दुनिया के सामने लाया गया, तो सत्ता के गलियारे हिल गए. हम बात कर रहे हैं मशहूर नाटक 'जिस लाहौर नहीं वेख्या, ओ जम्या ही नहीं' की, जिस पर ब्लॉकबस्टर फिल्म 'बटवारा 1947' (Viceroy's House) की बुनियाद रखी गई. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर इस कहानी में ऐसा क्या था जिसने पाकिस्तान सरकार की नींद उड़ा दी थी? क्यों वहां इस पर पूरी तरह बैन लगा दिया गया?.
असगर वजाहत का वो नाटक
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है जाने माने लेखक और नाटककार असगर वजाहत के लिखे एक नाटक से, जिसका नाम है 'जिस लाहौर नहीं वेख्या, ओ जम्या ही नहीं'. यह सिर्फ एक नाटक नहीं, बल्कि विभाजन के दौर में लहूलुहान हुई इंसानी संवेदनाओं की ऐसी कहानी थी जिसने ड्रामा के जरिए रचा गया. जिसका मतलब था 'जिसने लाहौर नहीं देखा, उसने मानो कुछ नहीं देखा'. यह कहावत कभी लाहौर की खूबसूरती और वहां की तहजीब के लिए मशहूर थी, लेकिन असगर वजाहत ने इसके जरिए बंटवारे के उस काले सच को उजागर किया जिसे दोनों ही मुल्क अक्सर छुपाने की कोशिश करते हैं.
क्या थी नाटक की मूल कहानी?
कहानी साल 1947 के लाहौर की है शहर में दंगे भड़के हुए थे. हिंदू आबादी अपनी जान बचाकर भारत भाग रही है और भारत से उजड़े हुए मुस्लिम शरणार्थी पाकिस्तान पहुंच रहे थे. इसी उथल-पुथल के बीच, भारत से आए एक मुस्लिम परिवार (मिर्जा परिवार) को सरकार की तरफ से लाहौर में एक आलीशान हवेली अलॉट की जाती है. मिर्जा परिवार जब अपनी इस नई हवेली में कदम रखता है, तो उनके होश उड़ जाते हैं. हवेली खाली नहीं थी, वहां एक बूढ़ी हिंदू महिला रह रही थी, जिन्हें सब 'माई' कहकर पुकारते थे. बंटवारे के उस खौफनाक दौर में भी, माई ने अपना वो घर, अपनी यादें और अपना लाहौर छोड़ने से साफ इनकार कर दिया था.
नफरत के बीच पनपता अपनों का अहसास
शुरुआत में मिर्जा परिवार माई को एक अनचाहे मेहमान की तरह देखता है. सांप्रदायिक तनाव और नफरत के माहौल के बीच, उन्हें लगता है कि एक हिंदू औरत का उनके साथ रहना खतरे से खाली नहीं है. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, माई का निश्छल प्यार, ममता और लाहौर के प्रति उनकी दीवानगी मिर्जा परिवार का दिल जीत लेती है. वे माई को अपने परिवार का हिस्सा मान लेते हैं. लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है, जब स्थानीय गुंडे और कट्टरपंथी तत्व इस बात का विरोध करने लगते हैं. वे एक मुस्लिम इलाके में एक हिंदू औरत की मौजूदगी बर्दाश्त नहीं कर पाते. नाटक का अंत बेहद मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला है, जो यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि सियासत की खींची लकीरें इंसानी जज्बातों से बड़ी कैसे हो गईं.
फिल्म 'बटवारा 1947' से क्या है इसका कनेक्शन?
जब मशहूर ब्रिटिश-भारतीय फिल्ममेकर गुरिंदर चड्ढा ने विभाजन की त्रासदी पर एक फिल्म बनाने का फैसला किया, तो उन्होंने इस नाटक के मानवीय पहलुओं और ऐतिहासिक दस्तावेजों को मिलाकर 'वायसरायज हाउस' बनाई, जिसे भारत में 'बटवारा 1947' के नाम से रिलीज किया जा रहा है. इस फिल्म में जहां एक तरफ लॉर्ड माउंटबेटन के महल के भीतर चल रही राजनीतिक कूटनीति और नेहरू, जिन्ना व गांधी के बीच के वैचारिक मतभेदों को दिखाया गया, वहीं दूसरी तरफ इस नाटक की आत्मा को समेटते हुए आम लोगों के दर्द को परदे पर उतारा गया. फिल्म ने यह साफ कर दिया कि विभाजन सिर्फ नक्शे पर खींची गई एक लाइन नहीं थी, बल्कि दो दिलों और संस्कृतियों को बीच से चीर देने का एक दर्दनाक सियासी फैसला था.
पाकिस्तान में क्यों किया गया था इस कहानी को बैन?
इस नाटक को पकिस्तान में बैन करने की 3 बड़ी वजह थी, पहला कारण था कि किस्तान में 'कायदे-आजम' कहे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की छवि वहां बेहद संवेदनशील मामला है. फिल्म और नाटक के कुछ सीन में जिन्ना को विभाजन के लिए अड़ियल रुख अपनाते हुए दिखाया गया था. जिसे पकिस्तान सेंसर बोर्ड ने इसे जिन्ना के खिलाफ माना. दुसरा कारण था कि पाकिस्तानी नैरेटिव में हमेशा यह दिखाया जाता रहा है कि विभाजन के वक्त सिर्फ मुसलमानों पर जुल्म हुए थे. लेकिन असगर वजाहत की इस कहानी और फिल्म ने दिखाया कि नफरत की आग दोनों तरफ बराबर लगी थी. लेकिन पकिस्तान सेंसर बोर्ड इससे भी सहमत नहीं हुआ. अंत में सेंसर बोर्ड का यह भी तर्क था कि इस फिल्म को दिखाने से देश में पुराने जख्म फिर से हरे हो सकते हैं और सांप्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है. फिल्म में दिखाए गए दंगों और मजहबी कट्टरता के दृश्यों को 'विवादास्पद' मानकर पाकिस्तान में इसके प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई.




