ADAS क्या है? भारत की सड़कों पर कितना कारगर है यह सेफ्टी सिस्टम, कार खरीदने से पहले समझें पूरी सच्चाई-Explainer
ADAS क्या है? जानिए यह स्मार्ट कार सेफ्टी सिस्टम कैसे काम करता है, भारत की सड़कों पर कितना प्रभावी है, इसके फायदे, सीमाएं और कार खरीदने से पहले जरूरी बातें.
पिछले कुछ समय से भारत में 10 लाख रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक की कई नई कारों के विज्ञापनों में एक शब्द सबसे ज्यादा सुनाई देता है. वो है ADAS. कंपनियां इसे कार की सबसे बड़ी सेफ्टी टेक्नोलॉजी बताकर बेच रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तकनीक वास्तव में भारतीय सड़कों की अव्यवस्थित ट्रैफिक, बिना लेन वाले हाईवे, अचानक सामने आ जाने वाले दोपहिया वाहन, जानवरों और पैदल यात्रियों के बीच उतनी ही प्रभावी है जितनी यूरोप या अमेरिका में?
तो इसका जवाब है- हां भी और नहीं भी. बावजूद इसके ADAS एक बेहद उपयोगी तकनीक है, लेकिन इसकी क्षमता उतनी ही है जितनी सड़क, मौसम और ड्राइविंग अनुशासन इसकी अनुमति देते हैं.
ADAS आखिर है क्या?
ADAS (Advanced Driver Assistance Systems) ऐसी इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा तकनीकों का समूह है जो कैमरा, रडार, अल्ट्रासोनिक सेंसर और कभी-कभी LiDAR की मदद से सड़क पर नजर रखता है. इसका उद्देश्य दुर्घटनाओं को रोकना और चालक की मदद करना है. यह तकनीक कार को पूरी तरह ऑटोमैटिक नहीं बनाती बल्कि चालक की सहायता करती है.
ADAS में कौन-कौन से फीचर मिलते हैं?
भारत में उपलब्ध अधिकांश Level-1 और Level-2 ADAS कारों में कई एडवांस सेफ्टी फीचर्स दिए जाते हैं. इनमें ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग (AEB), अडैप्टिव क्रूज़ कंट्रोल (ACC), लेन कीप असिस्ट (LKA), लेन डिपार्चर वार्निंग (LDW), ब्लाइंड स्पॉट डिटेक्शन (BSD), फ्रंट कोलिजन वार्निंग (FCW), ड्राइवर अटेंशन मॉनिटर और हाई बीम असिस्ट जैसी तकनीकें शामिल हैं.
अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल (ACC): यह सिस्टम सामने चल रहे वाहन से सुरक्षित दूरी बनाए रखने के लिए कार की रफ्तार को अपने-आप बढ़ाता या घटाता है, जिससे हाईवे पर ड्राइविंग अधिक आरामदायक और सुरक्षित हो जाती है.
ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग (AEB): यदि सिस्टम को सामने संभावित टक्कर का खतरा महसूस होता है और ड्राइवर समय पर ब्रेक नहीं लगाता, तो यह स्वतः ब्रेक लगाकर दुर्घटना की संभावना को कम करने की कोशिश करता है.
लेन कीप असिस्ट (LKA): अगर वाहन बिना इंडिकेटर दिए अपनी लेन से बाहर जाने लगता है, तो यह सिस्टम स्टीयरिंग में हल्का हस्तक्षेप कर कार को दोबारा लेन के बीच में लाने में मदद करता है.
ब्लाइंड स्पॉट डिटेक्शन (BSD): यह फीचर वाहन के उन हिस्सों पर नजर रखता है जो साइड मिरर में दिखाई नहीं देते. यदि बगल की लेन में कोई वाहन मौजूद हो, तो यह ड्राइवर को विजुअल या ऑडियो अलर्ट देकर सावधान करता है.
क्या ADAS भारत में सचमुच काम करता है?
सीधा जवाब है- काम करता है, लेकिन हर परिस्थिति में नहीं. यदि आप एक्सप्रेसवे, अच्छे हाईवे या साफ लेन मार्किंग वाली सड़कों पर ड्राइव करते हैं तो ADAS काफी प्रभावी साबित होता है. वहीं शहरों की भीड़, बिना लेन वाले रास्ते, अचानक कट मारने वाले वाहन और अव्यवस्थित ट्रैफिक में इसकी क्षमता सीमित हो जाती है.
यानी तकनीक खराब नहीं है, बल्कि भारतीय सड़कें और ट्रैफिक व्यवहार इसके लिए हमेशा आदर्श नहीं हैं.
भारतीय सड़कों पर सबसे बड़ी चुनौती क्या?
भारत की अधिकांश सड़कों पर लेन मार्किंग या तो धुंधली होती है या कई जगह होती ही नहीं. लेन कीप असिस्ट और लेन डिपार्चर वार्निंग कैमरे के जरिए इन्हीं मार्किंग को पहचानते हैं. जब सड़क पर स्पष्ट लाइन नहीं होगी तो सिस्टम सही ढंग से काम नहीं कर पाएगा.
इसी तरह भारतीय शहरों में एक ही लेन में कार, बाइक, ऑटो, साइकिल और पैदल यात्री साथ चलते हैं. ऐसे माहौल में सेंसर को हर सेकंड कई वस्तुओं का विश्लेषण करना पड़ता है, जिससे चेतावनी अधिक बार आने लगती है.
क्या बारिश और धूल भी ADAS को प्रभावित करती है?
इसका भी जवाब है बिल्कुल. भारत में धूल, कीचड़, भारी बारिश और कोहरा आम बात है. यदि कैमरा या रडार गंदा हो जाए तो उसकी कार्यक्षमता घट सकती है. कई बार सिस्टम डैशबोर्ड पर चेतावनी भी देता है कि सेंसर साफ करें. यानी ADAS उतना ही अच्छा काम करेगा जितना उसके सेंसर साफ और दृश्यता बेहतर होगी.
क्या ADAS ड्राइवर की जगह ले सकता है?
नहीं. यही सबसे बड़ी गलतफहमी है. भारत में बिकने वाली लगभग सभी ADAS कारें Level-2 तक की हैं. इसका मतलब यह नहीं कि कार खुद चल सकती है. स्टीयरिंग, ब्रेक और एक्सीलरेटर पर अंतिम जिम्मेदारी हमेशा ड्राइवर की रहती है.
यदि चालक सड़क पर ध्यान नहीं देगा तो केवल ADAS के भरोसे दुर्घटना टल जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
दुनिया में ADAS को लेकर क्या आंकड़े कहते हैं?
अमेरिका की सड़क सुरक्षा एजेंसी NHTSA और यूरोपीय सड़क सुरक्षा संस्थाओं के कई अध्ययनों में पाया गया है कि Automatic Emergency Braking (AEB) जैसी तकनीकें पीछे से होने वाली टक्करों को लगभग 40% से 50% तक कम कर सकती हैं. वहीं Insurance Institute for Highway Safety (IIHS) के अनुसार फ्रंट क्रैश की घटनाओं में भी तेजी से कमी दर्ज की गई है.
हालांकि, ये अध्ययन मुख्य रूप से उन देशों में हुए हैं जहां सड़कें, लेन अनुशासन और ट्रैफिक भारतीय परिस्थितियों से काफी अलग हैं.
भारत में ADAS का भविष्य है?
ऑटो इंडस्ट्री तेजी से इस तकनीक को अपनाने लगी है. पहले ADAS केवल लग्जरी कारों में मिलता था, लेकिन अब 15 से 20 लाख रुपये के आसपास की कई एसयूवी और सेडान में भी उपलब्ध है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह फीचर मिड-सेगमेंट कारों में भी सामान्य हो जाएगा.
इसके पीछे दो बड़े कारण हैं- ग्राहकों की बढ़ती सुरक्षा जागरूकता और वैश्विक सुरक्षा मानकों का दबाव.
क्या ADAS वाली कार खरीदना सही फैसला होगा?
अगर आपका अधिकांश सफर हाईवे या अच्छे शहरी मार्गों पर होता है तो ADAS निश्चित रूप से अतिरिक्त सुरक्षा देता है. यह लंबी दूरी की ड्राइविंग में थकान कम करता है और कई बार संभावित दुर्घटनाओं से भी बचा सकता है.
लेकिन यदि आप यह सोचकर कार खरीद रहे हैं कि अब कार खुद ही सब संभाल लेगी, तो यह धारणा गलत है. ADAS एक सहायक (Assistance) तकनीक है, ड्राइवर का विकल्प (Replacement) नहीं.
क्या ADAS सिर्फ मार्केटिंग है?
ADAS केवल मार्केटिंग का हिस्सा नहीं है. यह आधुनिक ऑटोमोबाइल सुरक्षा की महत्वपूर्ण तकनीक है और सही परिस्थितियों में दुर्घटनाओं का जोखिम कम करने में मदद करती है. लेकिन भारतीय सड़कों की वास्तविकता- खराब लेन मार्किंग, अव्यवस्थित ट्रैफिक, सड़क पर जानवर, अचानक यू-टर्न और मौसम की चुनौतियां, इसकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती हैं.
इसलिए कार खरीदते समय ADAS को एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच मानें, पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं. आखिरकार, सबसे स्मार्ट सिस्टम भी सतर्क और जिम्मेदार ड्राइवर का विकल्प नहीं बन सकता.




