नए इनकम टैक्स ड्राफ्ट नियमों ने ओल्ड टैक्स रिजीम को फिर बना दिया काम का, किनको हो सकता है ज्यादा फायदा?
नए इनकम टैक्स ड्राफ्ट 2026 ने पुराने टैक्स सिस्टम की उपयोगिता बढ़ा दी है. HRA छूट, बच्चों के अलाउंस और विदेशी आय नियमों में बदलाव से नौकरीपेशा करदाताओं को फायदा मिलेगा.
income tax draft
न्यू टैक्स रिजीम आने के बाद भी अगर आप ओल्ड टैक्स रिजीम यानी पुरानी कर व्यवस्था में बने हुए हैं तो ये खबर बस आपके लिए ही है. सरकार द्वारा जारी किए गए नए ड्राफ्ट इनकम टैक्स नियमों ने एक बार फिर पुराने टैक्स सिस्टम (Old Tax Regime) को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. आयकर विभाग ने शुक्रवार को इनकम टैक्स रूल्स, 2026 का ड्राफ्ट जारी किया है, जो नए इनकम टैक्स कानून, 2025 को 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का आधार बनेगा.
सरकार का दावा है कि इन नियमों का मकसद टैक्स प्रणाली को सरल बनाना और विवादों को कम करना है. इसके तहत नियमों की संख्या 511 से घटाकर 333 कर दी गई है, जबकि टैक्स से जुड़े फॉर्म्स की संख्या भी 399 से घटाकर 190 कर दी गई है. इससे करदाताओं और टैक्स प्रोफेशनल्स दोनों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. ड्राफ्ट नियमों को फिलहाल सार्वजनिक सलाह (स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन) के लिए रखा गया है, ताकि आम लोग, विशेषज्ञ और कारोबारी अपनी राय दे सकें.
कैसे फिर से चर्चा में आया पुराना टैक्स सिस्टम?
नए नियमों में प्रक्रियाओं को आसान बनाने, अनुपालन (Compliance) सरल करने और कानूनी विवाद घटाने की बात कही गई है. लेकिन टैक्स विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ प्रस्ताव ऐसे हैं, जो पुराने टैक्स सिस्टम को दोबारा आकर्षक बना सकते हैं. बीते कुछ वर्षों में सरकार नए टैक्स सिस्टम को बढ़ावा दे रही थी, जिसमें कम टैक्स दरें हैं लेकिन ज्यादातर छूट और कटौतियां नहीं मिलतीं. इसके उलट पुराना सिस्टम छूट और अलाउंस पर आधारित है. अब ड्राफ्ट नियमों में किए गए बदलावों से पुराना सिस्टम फिर से मजबूत होता दिख रहा है.
किन शहरों के लिए मिलेगा ज्यादा HRA का लाभ?
ड्राफ्ट नियमों का सबसे बड़ा बदलाव हाउस रेंट अलाउंस (HRA) से जुड़ा है. अभी तक सिर्फ चार महानगरों - मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई - में रहने वालों को वेतन का 50% तक HRA छूट मिलती थी, जबकि बाकी शहरों में यह सीमा 40% थी. नए ड्राफ्ट में सरकार ने इस सूची में चार और बड़े शहर जोड़ने का प्रस्ताव रखा है - बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद. इसका मतलब यह हुआ कि इन शहरों में काम करने वाले नौकरीपेशा लोगों को भी अब 50% तक HRA पर टैक्स छूट मिल सकती है. टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला देश के नए रोजगार केंद्रों में बढ़ते किराए को ध्यान में रखकर लिया गया है.
दशकों बाद बढ़े बच्चों से जुड़े अलाउंस
ड्राफ्ट नियमों में कुछ ऐसे अलाउंस भी बढ़ाए गए हैं, जिनकी राशि वर्षों से नहीं बदली थी. सरकार ने प्रस्ताव किया है कि चिल्ड्रन एजुकेशन अलाउंस को ₹100 से बढ़ाकर ₹3,000 प्रति माह प्रति बच्चा किया जाए (अधिकतम दो बच्चों के लिए). साथ ही हॉस्टल एक्सपेंस अलाउंस को ₹300 से बढ़ाकर ₹9,000 प्रति माह प्रति बच्चा किया जाए. अब तक ये अलाउंस महंगाई के कारण लगभग बेकार हो चुके थे. लेकिन नई रकम तय होने से ये फिर से टैक्स प्लानिंग में असरदार बन सकते हैं. इससे उन परिवारों को फायदा मिलेगा, जो बच्चों की पढ़ाई और हॉस्टल खर्च का बोझ उठा रहे हैं.
विदेशी आय पर टैक्स नियम सख्त
ड्राफ्ट नियमों में विदेशी आय (Foreign Income) से जुड़े नियमों को भी कड़ा किया गया है. अगर कोई व्यक्ति या कंपनी विदेश में टैक्स चुका कर भारत में फॉरेन टैक्स क्रेडिट (FTC) लेना चाहती है, तो अब कुछ मामलों में चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से प्रमाणपत्र अनिवार्य होगा. ये शर्तें तब लागू होंगी जब टैक्सदाता कोई कंपनी हो या विदेश में चुकाया गया टैक्स ₹1 लाख से ज्यादा हो. CA को यह प्रमाणित करना होगा कि विदेशी आय सही है, टैक्स भुगतान के सबूत मौजूद हैं और टैक्स संधि (Tax Treaty) के तहत लाभ सही तरीके से लिया जा रहा है. सरकार का कहना है कि इससे फर्जी दावों पर रोक लगेगी और टैक्स सिस्टम ज्यादा पारदर्शी बनेगा.
क्यों अब भी रिलेवेंट रहेगा पुराना टैक्स सिस्टम?
हाल के वर्षों में सरकार नए टैक्स सिस्टम को बढ़ावा दे रही थी, क्योंकि उसमें दरें कम हैं और प्रक्रिया सरल है. लेकिन ड्राफ्ट नियमों में किए गए बदलावों से संकेत मिलता है कि सरकार पुराने सिस्टम को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहती. विशेषज्ञों के मुताबिक जिन कर्मचारियों का किराया ज्यादा है, जिनके बच्चे महंगे स्कूलों या हॉस्टल में पढ़ते हैं और जो टैक्स प्लानिंग के जरिए छूट और कटौतियों का फायदा उठाते हैं, उनके लिए पुराना टैक्स सिस्टम अब भी फायदेमंद बना रह सकता है. महंगाई के अनुरूप अलाउंस बढ़ाकर सरकार ने पुराने सिस्टम की उपयोगिता को दोबारा जिंदा कर दिया है.
टैक्स नीति पर नई बहस
इन ड्राफ्ट नियमों के आने के बाद टैक्स नीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई है कि क्या सरकार धीरे-धीरे सिर्फ नए टैक्स सिस्टम पर जाएगी या दोनों सिस्टम साथ-साथ चलते रहेंगे? फिलहाल इतना साफ है कि सरकार टैक्स प्रक्रिया को आसान बनाना चाहती है, लेकिन साथ ही उन करदाताओं को भी राहत देना चाहती है जो छूट और अलाउंस के जरिए अपनी टैक्स देनदारी कम करते हैं. अब सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि स्टेकहोल्डर सुझावों के बाद इन ड्राफ्ट नियमों में क्या बदलाव किए जाते हैं और अंतिम नियमों में पुराना टैक्स सिस्टम कितनी ताकत के साथ बना रहता है.





