भारत के लिए चीन जरूरी या मजबूरी? मोदी सरकार ने 4 चीनी कंपनियों को दी सरकारी टेंडर की मंजूरी
गलवान के बाद सख्ती के बावजूद मोदी सरकार ने चार चीनी कंपनियों को पावर प्रोजेक्ट्स के सरकारी टेंडर में छूट दी. जानिए भारत की रणनीति, मजबूरी और चीन पर निर्भरता.
भारत और चीन के रिश्ते गलवार वॉर यानी पिछले छह साल से सामान्य नहीं चल रहे थे. 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत सरकार ने चीन के खिलाफ कई बड़े फैसले लिए. चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया, निवेश के नियम सख्त कर दिए, सरकारी टेंडरों में चीनी कंपनियों की एंट्री रोक दी और सुरक्षा के लिहाज से कई नई शर्तें लागू कर दी गईं. उस समय सरकार का संदेश साफ था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में कोई समझौता नहीं होगा.
अब वही मोदी सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने नई बहस छेड़ दी है. सरकार ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चला रही चार चीनी कंपनियों को अहम पावर प्रोजेक्ट्स के सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने की मंजूरी दे दी है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत का चीन को लेकर रुख बदल रहा है या फिर यह फैसला देश की औद्योगिक जरूरतों और आर्थिक मजबूरियों का नतीजा है?
क्या भारत अभी भी कुछ अहम क्षेत्रों में चीन पर इतना निर्भर है कि सरकार को सीमित छूट देनी पड़ रही है?
किन चार कंपनियों को मिली है राहत?
केंद्र सरकार ने TBEA Energy, Nanjing Electric India, New Northeast Electric India और Taikai Electric (India) को सरकारी खरीद के नियमों में विशेष छूट दी है. ये चारों कंपनियां भारत में फैक्ट्री चलाती हैं और बिजली ट्रांसमिशन सेक्टर के लिए जरूरी उपकरण बनाती हैं. इनमें पावर ट्रांसफॉर्मर, हाई-वोल्टेज स्विचगियर, गैस इंसुलेटेड स्विचगियर (GIS), ट्रांसमिशन लाइन उपकरण, केबल और अन्य इलेक्ट्रिकल सिस्टम शामिल हैं. देश में चल रहे बड़े बिजली प्रोजेक्ट्स में इन उपकरणों की अहम भूमिका होती है. यानी यह कोई सामान्य औद्योगिक उत्पाद नहीं बल्कि बिजली व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले उपकरण हैं.
पहले क्या थे नियम?
गलवान हिंसा के बाद केंद्र सरकार ने सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) के नियमों में बड़ा बदलाव किया गया था. इसके तहत भारत के साथ जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों (चीन, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार) की कंपनियों को सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने से पहले विशेष रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया था.
इसके अलावा, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से सुरक्षा एवं राजनीतिक मंजूरी लेना भी जरूरी था. सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि संवेदनशील क्षेत्रों में काम करने वाली विदेशी कंपनियों की पूरी जांच हो और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कोई जोखिम न रहे.
अब छह साल बाद क्या बदला?
वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने 24 जून को आदेश जारी कर इन चार कंपनियों को दो साल के लिए इस नियम से छूट दे दी. हालांकि, सरकार ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि यह छूट सिर्फ इन कंपनियों और तय अवधि तक सीमित रहेगी. इसे भविष्य की नीति या कोई स्थायी मिसाल नहीं माना जाएगा. यानी बाकी चीनी कंपनियों पर पहले जैसे ही नियम लागू रहेंगे और उन्हें सरकारी टेंडर में भाग लेने के लिए पूरी मंजूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा.
आखिर सरकार ने यह फैसला क्यों लिया?
इस साल जनवरी में ऊर्जा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से अनुरोध किया था कि भारत में पहले से उत्पादन कर रही कुछ चीनी कंपनियों को सरकारी खरीद में सीमित छूट दी जाए.
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि देशभर में बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन से जुड़े कई बड़े प्रोजेक्ट तेजी से चल रहे हैं. इन परियोजनाओं में इस्तेमाल होने वाले कुछ विशेष उपकरण अभी भी बहुत कम कंपनियां बनाती हैं. अगर इन कंपनियों को पूरी तरह बाहर रखा जाता, तो कई परियोजनाओं में देरी होती, लागत बढ़ती और बिजली ढांचे के विस्तार की रफ्तार प्रभावित होती.
इसी आधार पर सचिवों की समिति (Committee of Secretaries) और DPIIT की रजिस्ट्रेशन कमेटी की सिफारिश के बाद यह मंजूरी दी गई.
ये कंपनियां आखिर बनाती क्या हैं?
चारों कंपनियां ऐसे उपकरण तैयार करती हैं जिनके बिना बिजली ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार लगभग असंभव माना जाता है.
इनमें पावर ट्रांसफॉर्मर, हाई वोल्टेज स्विचगियर, गैस इंसुलेटेड स्विचगियर (GIS), ट्रांसमिशन लाइन उपकरण, इलेक्ट्रिकल केबल और हाई वोल्टेज कंट्रोल सिस्टम शामिल हैं. इनका इस्तेमाल 220 केवी, 400 केवी और 765 केवी जैसी हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों में होता है.
इनमें से New Northeast Electric India अपनी वेबसाइट पर पूरे देश में कम से कम 11 ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स में काम करने का दावा करती है. इससे साफ है कि ये कंपनियां पहले से भारतीय बिजली ढांचे का हिस्सा रही हैं.
गलवान के बाद क्यों लगाए गए थे प्रतिबंध?
15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इसके बाद भारत सरकार ने चीन के खिलाफ कई बड़े कदम उठाए.
सैकड़ों चीनी मोबाइल ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया. FDI नियमों में बदलाव कर दिया गया. सरकारी टेंडरों में चीनी कंपनियों की भागीदारी कठिन बना दी गई. संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश की जांच सख्त कर दी गई.
इसी दौरान अप्रैल 2020 में सरकार ने Press Note-3 (PN-3) लागू किया. इसके तहत भारत से जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले किसी भी निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई, ताकि कोरोना महामारी के दौरान कमजोर मूल्यांकन का फायदा उठाकर विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों का अधिग्रहण न कर सकें.
क्या भारत अभी भी चीन पर निर्भर है?
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. सरकार लगातार आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की बात कर रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई रणनीतिक उद्योग आज भी चीन पर काफी हद तक निर्भर हैं.
बिजली उपकरणों के कई महत्वपूर्ण पार्ट्स, हाई वोल्टेज स्विचगियर, कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल और विशेष औद्योगिक कंपोनेंट्स आज भी बड़ी मात्रा में चीन से आते हैं. यही वजह है कि सरकार को कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है.
कुछ क्षेत्रों में निर्भरता पहले से भी ज्यादा क्यों?
2014 के मुकाबले भारत ने कई क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन जरूर बढ़ाया है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण सेक्टर ऐसे हैं जहां चीन पर निर्भरता कम होने के बजाय और बढ़ी है.
मोबाइल फोन भारत में बनने लगे हैं, लेकिन उनके अधिकांश कंपोनेंट चीन से आते हैं. सोलर पैनल की असेंबली भारत में हो रही है, लेकिन सोलर सेल और कई जरूरी कच्चे माल का बड़ा हिस्सा चीन से आता है. इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कई औद्योगिक उपकरणों के लिए भी स्थिति लगभग यही है. यानी अंतिम उत्पाद भारत में तैयार हो रहा है, लेकिन उसकी सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा अभी भी चीन से जुड़ा हुआ है.
दवा उद्योग भी चीन पर क्यों निर्भर है?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा निर्माता माना जाता है, लेकिन दवा बनाने के लिए जरूरी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा चीन से आयात किया जाता है.
अगर किसी कारण से चीन से API की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो भारत के दवा उद्योग पर भी सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि सरकार इस क्षेत्र में भी घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार योजनाएं चला रही है.
चीनी इंजीनियरों के बिना क्यों अटक रहे थे प्रोजेक्ट?
पिछले साल कई भारतीय उद्योग संगठनों ने सरकार से चीनी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए वीजा नियम आसान करने की मांग की थी.
उद्योग का तर्क था कि मशीनें तो चीन से आयात हो गई हैं, लेकिन उन्हें इंस्टॉल करने और चालू करने वाले विशेषज्ञ भारत नहीं आ पा रहे हैं. इससे बिजली, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और लेदर सेक्टर की कई परियोजनाएं प्रभावित हुईं.
कई कंपनियों का कहना था कि करोड़ों रुपये की मशीनें प्लांट में लगी हैं, लेकिन प्रशिक्षित तकनीशियन नहीं होने की वजह से उत्पादन शुरू नहीं हो पा रहा है.
चीन के साथ व्यापार का गणित क्या कहता है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत हर साल चीन से लगभग 112 अरब डॉलर का सामान आयात करता है. इसमें करीब 60 प्रतिशत हिस्सा इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का होता है.
मोबाइल, मशीनरी, बिजली उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, केमिकल और औद्योगिक कंपोनेंट्स का बड़ा हिस्सा चीन से आता है. इसके मुकाबले भारत का चीन को निर्यात काफी कम है. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा लगातार बना हुआ है.
सरकार निर्भरता कम करने के लिए क्या कर रही है?
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजनाओं के जरिए घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दिया है.
मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, बैटरी, सोलर उपकरण और दवा उद्योग में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए अरबों रुपये की प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की गई हैं. इसके अलावा सस्ते आयात की निगरानी बढ़ाने और घरेलू उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई चेन पूरी तरह बदलने में अभी कई साल लग सकते हैं.
क्या भारत का चीन को लेकर रुख बदल गया?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. सरकार ने केवल चार कंपनियों को सीमित अवधि के लिए राहत दी है और यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यह कोई नई नीति नहीं है.
हालांकि, इस फैसले से इतना जरूर संकेत मिलता है कि सरकार अब पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बजाय 'चयनात्मक अनुमति' (Selective Permission) की नीति अपनाती दिख रही है. यानी जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना औद्योगिक जरूरतें पूरी करनी हों और घरेलू विकल्प उपलब्ध न हों, वहां सीमित और नियंत्रित तरीके से छूट दी जा सकती है.
जरूरी या मजबूरी?
चार चीनी कंपनियों को मिली यह छूट केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह भारत की मौजूदा औद्योगिक सच्चाई भी सामने लाती है. एक तरफ सरकार आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है, दूसरी तरफ बिजली, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और दवा जैसे कई अहम क्षेत्रों में चीन की भूमिका अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
यही वजह है कि फिलहाल भारत की नीति पूरी तरह 'चीन से दूरी' की नहीं, बल्कि 'जहां विकल्प उपलब्ध हैं वहां आत्मनिर्भरता और जहां विकल्प नहीं हैं वहां नियंत्रित निर्भरता' की दिखाई देती है. ऐसे में सवाल अभी भी बना हुआ है. क्या चीन भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक साझेदार है, या कुछ रणनीतिक क्षेत्रों में आज भी एक ऐसी मजबूरी है, जिससे पूरी तरह बाहर निकलने में अभी समय लगेगा.




