Budget 2026: रिटायरमेंट का सपना या टैक्स ट्रैप? मिडिल क्लास की सबसे सुरक्षित बचत अब सबसे ज्यादा उलझी
Budget 2026 से पहले रिटायरमेंट सेविंग पर बढ़ते टैक्स को लेकर सैलरीड मिडिल क्लास में गहरी चिंता है. PF, सुपरएनुएशन और NPS में एम्प्लॉयर के ₹7.5 लाख से अधिक योगदान पर टैक्स, उस पर मिलने वाले ब्याज की सालाना टैक्सेशन और कर्मचारी के अपने PF योगदान पर ₹2.5 लाख से ऊपर ब्याज को टैक्सेबल बनाना रिटायरमेंट प्लानिंग को जटिल और महंगा बना रहा है. सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लोगों से उस पैसे पर टैक्स वसूला जा रहा है, जो अभी उन्हें मिला भी नहीं है.
भारत खुद को एक मजबूत और तेजी से बढ़ते मिडिल क्लास वाला देश बताता है. लेकिन सच्चाई यह है कि बीते कुछ सालों में टैक्स कानूनों में किए गए बदलावों ने उसी मिडिल क्लास की रिटायरमेंट प्लानिंग को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है. जिन सैलरीड कर्मचारियों को हमेशा यह सिखाया गया कि “आज बचाओ, ताकि कल सुरक्षित रहे”, वही लोग अब टैक्स के ऐसे जाल में फंसते जा रहे हैं जहां बचत करना भी सजा जैसा महसूस होने लगा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का मानना है कि ये नियम बचत को प्रोत्साहित करने के बजाय दंडित करते हैं. बढ़ती उम्र, महंगे इलाज और कमजोर सोशल सिक्योरिटी सिस्टम के बीच Budget 2026 में इन प्रावधानों की समीक्षा और सैलरी क्लास को राहत देने की मांग तेज हो गई है. Budget 2026 से पहले यह सवाल और भी गंभीर हो गया है - क्या भारत में रिटायरमेंट सेविंग अब टैक्स ट्रैप बन चुकी है?
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तीन फैसले जिन्होंने बिगाड़ दी रिटायरमेंट की तस्वीर
बीते कुछ वर्षों में किए गए तीन बड़े टैक्स बदलाव सैलरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए सबसे ज्यादा परेशानी का कारण बने हैं. प्रोविडेंट फंड (PF), सुपरएनुएशन फंड और NPS में अगर नियोक्ता का सालाना योगदान ₹7.5 लाख से ज्यादा होता है, तो वह अब टैक्सेबल माना जाता है. सिर्फ योगदान ही नहीं, बल्कि उस अतिरिक्त रकम पर मिलने वाला ब्याज या ग्रोथ भी हर साल टैक्स के दायरे में आ जाती है. यानी कर्मचारी खुद जो बचत करता है, अगर वह तय सीमा से ऊपर चली जाए, तो उस पर मिलने वाला ब्याज भी टैक्स के दायरे में है. अलग-अलग देखें तो ये फैसले तकनीकी लग सकते हैं, लेकिन मिलकर देखें तो ये रिटायरमेंट प्लानिंग को पूरी तरह उलझा देते हैं.
फायदा मिलने से पहले ही टैक्स!
Finance Act 2020 ने सबसे पहला झटका दिया. इस कानून के तहत एम्प्लॉयर द्वारा PF, सुपरएनुएशन और NPS में ₹7.5 लाख से ज्यादा योगदान को ‘परक्विजिट’ मानकर टैक्सेबल कर दिया गया. सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि टैक्स लगाया गया, बल्कि यह है कि यह टैक्स उस पैसे पर लगाया जा रहा है जो कर्मचारी को अभी मिला ही नहीं है. रिटायरमेंट फंड दशकों तक लॉक रहते हैं, लेकिन सरकार आज ही उस पर टैक्स वसूल रही है. इसे ही टैक्स एक्सपर्ट “नोटियोनल इनकम पर टैक्स” कह रहे हैं - यानी ऐसी कमाई पर टैक्स, जो अभी जेब में आई ही नहीं.
EEE का दावा, लेकिन हकीकत कुछ और
सरकार ने यह कहकर इन बदलावों को सही ठहराया कि PF, सुपरएनुएशन और NPS एक EEE (Exempt-Exempt-Exempt) सिस्टम है. लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि यह दावा पूरी तरह सच नहीं है. NPS में रिटायरमेंट पर सिर्फ 60% रकम टैक्स-फ्री होती है, बाकी 40% से एन्यूटी खरीदनी पड़ती है और उस एन्यूटी से मिलने वाली पेंशन पूरी तरह टैक्सेबल होती है. यानी NPS पूरी तरह EEE नहीं है. इसके बावजूद सरकार ने इसे आधार बनाकर अतिरिक्त टैक्स लगा दिया, जो कर्मचारियों को अनुचित लगता है.
अपनी ही बचत पर टैक्स: दूसरा बड़ा झटका
Finance Act 2021 ने सैलरी क्लास को दूसरा झटका दिया. इसके तहत कर्मचारी द्वारा PF में ₹2.5 लाख से ज्यादा योगदान पर मिलने वाला ब्याज टैक्सेबल कर दिया गया. भारत में PF ही अधिकांश सैलरीड कर्मचारियों की सबसे भरोसेमंद और अनुशासित बचत योजना है. यह कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि भविष्य की मजबूरी है - खासतौर पर तब, जब देश में सभी के लिए कोई मजबूत सोशल सिक्योरिटी सिस्टम मौजूद नहीं है.
समस्या तब और बढ़ जाती है जब किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी ज्यादा हो और 12% का अनिवार्य PF योगदान ही ₹2.5 लाख की सीमा पार कर जाए, ऐसे में कर्मचारी ने जानबूझकर ज्यादा बचत नहीं की, फिर भी उसे टैक्स देना पड़ता है.
क्या अच्छी आदतों को सजा मिल रही है?
इन सभी नियमों को एक साथ देखें तो एक तस्वीर साफ उभरती है कि भारत में अब रिटायरमेंट सेविंग को प्रोत्साहन नहीं, बल्कि दंडित किया जा रहा है.
आज एक सैलरीड कर्मचारी को झेलना पड़ता है:
- ₹7.5 लाख से ज्यादा एम्प्लॉयर कॉन्ट्रिब्यूशन पर टैक्स
- उस पर मिलने वाले ब्याज पर हर साल टैक्स
- अपनी PF बचत पर ब्याज टैक्स
- रिटायरमेंट पर NPS पेंशन पर टैक्स
- समय से पहले निकासी पर अलग टैक्स नियम
- यानी एक ही बचत पर बार-बार टैक्स.
Budget 2026 से क्यों है उम्मीद
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और टैक्स विशेषज्ञ मानते हैं कि Budget 2026 में इन प्रावधानों की समीक्षा बेहद जरूरी है. यह मांग किसी टैक्स छूट की “मांग” नहीं, बल्कि न्याय और सुरक्षा की है. भारत में आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है, मेडिकल खर्च लगातार बढ़ रहा है, सीनियर सिटीज़न के लिए हेल्थ इंश्योरेंस महंगा और मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे में अगर रिटायरमेंट सेविंग ही कमजोर कर दी जाएगी, तो भविष्य में पूरा परिवार आर्थिक तनाव में आ सकता है.
टैक्स एक्सपर्ट अमीत पटेल के मुताबिक, सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य शायद सभी छूट और कटौतियां खत्म कर सिर्फ ‘न्यू टैक्स रिजीम’ लागू करना है. लेकिन ऐसा हुआ तो रिटायरमेंट प्लानिंग सबसे बड़ा शिकार बनेगी.
बचत लग्ज़री नहीं, ज़रूरत है
भारत का सैलरीड वर्ग टैक्स देने से नहीं डरता, लेकिन वह यह जरूर चाहता है कि रिटायरमेंट सेविंग को अपराध न माना जाए. Budget 2026 सरकार के पास मौका है रिटायरमेंट सेविंग को फिर से भरोसेमंद बनाने का, टैक्स सिस्टम को इंसाफ़पूर्ण करने का और मिडिल क्लास को यह भरोसा देने का कि “आज की बचत, कल बोझ नहीं बनेगी.” अगर ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में रिटायरमेंट भारत के करोड़ों कर्मचारियों के लिए सुरक्षा नहीं, सबसे बड़ी चिंता बन जाएगी.





