अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक कोशिशें तेज हो गई हैं. इस बीच एक प्रस्तावित समझौते का शुरुआती मसौदा सामने आया है, जिसमें ईरान के अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के भंडार को किसी तीसरे देश में भेजने या उसके संवर्धन का स्तर कम करने का विकल्प रखा गया है. इसके बदले अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री रास्तों को खोलने और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने पर सहमति बनाने की कोशिश है. अल अरबिया इंग्लिश की रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती सहमति बनने के सात दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए फिर से खोलने का प्रस्ताव है. इस मसौदे में चीन को संभावित गारंटर देश के रूप में शामिल करने की बात भी कही गई है, ताकि समझौते को लागू कराने और लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सके.

प्रस्तावित ढांचे के तहत अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत इस्तांबुल के बजाय कतर की राजधानी दोहा में कराने का सुझाव दिया गया है. समझौते में ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम और समुद्री सुरक्षा से जुड़े कुछ वादे करने होंगे. इसके बदले अमेरिका प्रतिबंधों, नाकेबंदी और दूसरे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने की दिशा में कदम उठा सकता है. हालांकि, यह अभी बातचीत का शुरुआती मसौदा है. इसे अंतिम समझौता या दोनों देशों की सहमति के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

ईरान-अमेरिका संभावित डील की 10 बड़ी बातें

1. यूरेनियम के भंडार पर क्या है प्रस्ताव?

अमेरिका और ईरान के बीच विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. प्रस्तावित फ्रेमवर्क में ईरान के अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के भंडार को किसी तीसरे देश में स्थानांतरित करने का विकल्प रखा गया है. दूसरा विकल्प इस यूरेनियम के संवर्धन का स्तर कम करना है. इसका मकसद ईरान के पास मौजूद अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम की मात्रा और उसके स्तर को लेकर अमेरिका की चिंताओं को कम करना है.

हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यूरेनियम किस देश को सौंपा जा सकता है, कितनी मात्रा स्थानांतरित होगी या संवर्धन का स्तर कितना कम किया जाएगा. ये ऐसे सवाल हैं जिन पर बातचीत के दौरान सहमति बननी बाकी है.

2. क्या सात दिन में खुल जाएगा होर्मुज स्ट्रेट?

प्रस्तावित समझौते का दूसरा बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोलने से जुड़ा है. मसौदे के मुताबिक, शुरुआती सहमति बनने के सात दिनों के भीतर इस समुद्री रास्ते पर अंतरराष्ट्रीय नौवहन फिर से शुरू कराने का प्रस्ताव है. होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम समुद्री मार्ग है. यहां तनाव या जहाजों की आवाजाही में रुकावट का असर अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ सकता है. इसलिए इस रास्ते को खोलना केवल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव घटाने का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों की ऊर्जा और व्यापारिक जरूरतों से भी जुड़ा है.

3. चीन को क्यों बनाया जा सकता है गारंटर?

अल अरबिया इंग्लिश की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित फ्रेमवर्क में चीन को समझौते का संभावित गारंटर बनाने की बात कही गई है.  गारंटर देश की भूमिका यह सुनिश्चित करने की हो सकती है कि समझौते में किए गए वादों का पालन हो और कोई पक्ष अपनी जिम्मेदारियों से पीछे न हटे. चीन को इस भूमिका में शामिल करने का प्रस्ताव इसलिए भी अहम है क्योंकि समझौते को केवल अमेरिका और ईरान के आपसी भरोसे पर निर्भर नहीं रखना है. हालांकि, चीन ने इस प्रस्ताव के तहत गारंटर बनने की सहमति दी है या नहीं, इसकी जानकारी रिपोर्ट में नहीं दी गई है.

4. दोहा में होगी सीधी बातचीत की कोशिश

मसौदे में अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत के लिए दोहा को संभावित जगह बताया गया है. इससे पहले इस्तांबुल में बातचीत कराने का विकल्प चर्चा में था. अब कतर की राजधानी को बातचीत के नए केंद्र के तौर पर प्रस्तावित किया गया है. कतर पहले भी क्षेत्रीय तनाव के दौरान मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। ताजा घटनाक्रम में भी कतर ने दोनों देशों के बीच संपर्क बढ़ाने की कोशिश की है. हालांकि, बातचीत की तारीख और औपचारिक कार्यक्रम को लेकर अभी अंतिम जानकारी सामने नहीं आई है.

5. कतर ने तेज की कूटनीतिक पहल

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने की कोशिशों के तहत शुक्रवार को कतर का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचा. ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के एक वरिष्ठ सलाहकार ने किया. प्रतिनिधिमंडल का मकसद ईरानी अधिकारियों से बातचीत करना और अमेरिका के साथ कूटनीतिक प्रयासों में समन्वय बनाना था. रिपोर्ट के मुताबिक, कतर के दूतों के जरिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का एक पत्र भी ईरान के सुरक्षा अधिकारी मोहसिन रजाई तक पहुंचाया गया. इस पत्र को तेहरान में एक नए कूटनीतिक रास्ते के प्रस्ताव के तौर पर देखा गया, जिससे अमेरिका के संभावित नए सैन्य हमलों को टाला जा सके.

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6. ट्रंप बोले- युद्ध खत्म करने की कोई जल्दबाजी नहीं

एक तरफ बातचीत की कोशिशें चल रही हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ संकेत दिया है कि अमेरिका को युद्ध खत्म करने की कोई जल्दी नहीं है. ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान बातचीत करना चाहता है और दोनों देशों के बीच चर्चा जारी है. ट्रंप ने दावा किया कि ईरान आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहा है. उनके मुताबिक, ईरान के पास अपने सैनिकों और पुलिसकर्मियों को वेतन देने तक के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं. उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास समय है और यह कोई सामान्य युद्ध नहीं है.  

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7. वेनेजुएला का जिक्र कर सैन्य खर्च पर क्या बोले ट्रंप?

ट्रंप ने अमेरिका के सैन्य अभियान पर होने वाले खर्च को भी कम बताया. उनका दावा था कि इस संघर्ष में अमेरिका अपेक्षाकृत कम पैसा खर्च कर रहा है और वेनेजुएला से मिली आर्थिक बढ़त के कारण यह खर्च कई गुना पूरा हो चुका है. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने जितना पैसा खर्च किया है, उससे करीब दस गुना ज्यादा रकम वेनेजुएला से हासिल की है. हालांकि, उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में कोई आंकड़ा या विस्तृत जानकारी नहीं दी.  

8. फिर सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दे चुके हैं ट्रंप

ट्रंप ने बातचीत की संभावना जताने के साथ-साथ ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई का विकल्प भी खुला रखा है. इससे पहले उन्होंने 'एक और छोटा एपिक फ्यूरी' अभियान शुरू करने की संभावना का जिक्र किया था. यह नाम ईरान के खिलाफ अमेरिका के शुरुआती सैन्य अभियान के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, ट्रंप ने यह भी कहा था कि ईरान के साथ एक बड़ा और अच्छा समझौता हो सकता है. इस तरह अमेरिकी प्रशासन की तरफ से एक ओर बातचीत के संकेत दिए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर सैन्य दबाव बनाए रखने की रणनीति भी दिखाई दे रही है.

9. तुर्किये भी अमेरिका के साथ कर रहा बातचीत

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने के लिए तुर्किये भी कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय है. शुक्रवार को तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की. यह बैठक अमेरिका में आयोजित G20 विदेश मंत्रियों की बैठक से इतर हुई. तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच अमेरिका-ईरान बातचीत, क्षेत्रीय हालात और द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा हुई. इससे पहले तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने भी ट्रंप से फोन पर बात की थी. इस बातचीत में अंकारा ने समुद्री मार्गों को लेकर अपनी चिंता जताई और क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया.

10. समझौते की निगरानी और विवाद सुलझाने का भी प्रस्ताव

प्रस्तावित फ्रेमवर्क में केवल समझौते की शर्तें तय करने की बात नहीं है, बल्कि उनके पालन की निगरानी का तरीका भी सुझाया गया है. इसके तहत एक स्वतंत्र सत्यापन व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है, जो समझौते के हर चरण से पहले यह जांच करेगी कि दोनों पक्षों ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी की हैं या नहीं. इसके अलावा, विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थों और गारंटर देशों को शामिल करने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है. इसका मकसद किसी भी देरी या उल्लंघन की स्थिति में बातचीत के जरिए समस्या सुलझाना और सैन्य तनाव को दोबारा बढ़ने से रोकना है.

हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी को लेकर मतभेद बने हुए हैं. ऐसे में यह देखना अहम होगा कि शुरुआती मसौदा किसी स्थायी समझौते में बदल पाता है या नहीं.