ईरान-अमेरिका जंग में Mediator बना पाकिस्तान का अफगानिस्तान से पंगा भारी, इस देश में चल रही दोनों की बातचीत

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को एक मीडिएटर के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन अफगानिस्तान के साथ उसका टकराव उसे भारी पड़ता दिख रहा है. दोनों देशों के बीच सीमा पर संघर्ष और आरोप-प्रत्यारोप के बीच चीन के उरुमकी में शांति वार्ता जारी है, जिसे अफगानिस्तान ने 'उपयोगी' बताया है.

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मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की भूमिका एक 'मीडिएटर' के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसी समय उसका अपने पड़ोसी अफगानिस्तान के साथ संघर्ष और गहरा होता नजर आ रहा है. हालात ऐसे बन गए हैं कि एक तरफ पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर शांति की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ उसकी सीमाओं पर गोलाबारी और टकराव जारी है.

इसी बीच राहत की एक खबर यह है कि चीन की मध्यस्थता में दोनों देशों के बीच चल रही शांति वार्ता को अफगानिस्तान ने 'उपयोगी' बताया है. उरुमकी में हो रही यह बातचीत न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अहम मानी जा रही है, बल्कि वैश्विक कूटनीति में भी इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है.

क्या चीन में चल रही शांति वार्ता से हालात सुधर रहे हैं?

अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय के डिप्टी प्रवक्ता जिया अहमद तकाल के मुताबिक, कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने चीन के राजदूत से मुलाकात के दौरान बातचीत को 'रचनात्मक' बताया. उन्होंने उम्मीद जताई कि 'छोटी-छोटी गलतफहमियां' इस प्रक्रिया में बाधा नहीं बनेंगी. मुत्ताकी ने साफ कहा कि अब तक हुई बातचीत 'उपयोगी' रही है, जो यह इशारा देती है कि दोनों देशों के बीच संवाद की दिशा सकारात्मक बनी हुई है.

चीन की भूमिका कितनी अहम है?

यह पूरी शांति पहल उरुमकी में चीन के निमंत्रण पर शुरू हुई है. इसका मुख्य उद्देश्य सीमा पर बढ़ती हिंसा को रोकना और दोनों देशों के बीच भरोसा बहाल करना है. चीन के अलावा सऊदी अरब, तुर्किये, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने भी इस वार्ता में सहयोग दिया है, जिससे यह मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय महत्व का बन चुका है.

सीमा पर क्या अभी भी जारी है संघर्ष?

हालांकि बातचीत जारी है, लेकिन जमीनी हालात अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं. अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर कई बार सीमा पार गोलाबारी के आरोप लगाए हैं, जिसमें आम नागरिकों के हताहत होने की बात सामने आई है. वहीं पाकिस्तान की ओर से इन आरोपों पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन वह लगातार अफगानिस्तान पर आतंकी संगठनों को पनाह देने का आरोप लगाता रहा है.

इस संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई?

फरवरी में शुरू हुए इस संघर्ष ने तब गंभीर रूप लिया जब पाकिस्तान ने आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाते हुए अफगानिस्तान में हवाई हमले किए. इसके जवाब में अफगानिस्तान ने भी सीमा पार कार्रवाई की, जिससे हालात तेजी से बिगड़ गए. इससे पहले कतर की मध्यस्थता में हुआ सीज़फायर भी टूट गया था.

मानवीय संकट कितना गहरा है?

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, इस संघर्ष के चलते करीब 94,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं. वहीं सीमा से सटे इलाकों में लगभग 1 लाख लोग पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कट गए हैं. यह स्थिति क्षेत्र में बढ़ते मानवीय संकट और अस्थिरता की गंभीर तस्वीर पेश करती है.

क्या आतंकी संगठनों की मौजूदगी से बढ़ रहा खतरा?

इस पूरे क्षेत्र में अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों की मौजूदगी पहले से ही चिंता का विषय रही है. ऐसे में अफगानिस्तान-पाकिस्तान संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता को और बढ़ा दिया है. पाकिस्तान अक्सर अफगानिस्तान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को शरण देने का आरोप लगाता है, जबकि काबुल इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करता है. दूसरी ओर, अफगानिस्तान का कहना है कि पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई में आम नागरिकों को निशाना बनाया गया, जबकि इस्लामाबाद का दावा है कि हमले केवल सैन्य ठिकानों पर किए गए.

आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बातचीत इसी तरह सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती रही, तो आने वाले समय में स्थायी शांति की उम्मीद की जा सकती है. हालांकि, सीमा पर जारी तनाव, अविश्वास और लगातार आरोप-प्रत्यारोप इस प्रक्रिया को अब भी चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं.

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