Middle East War: जंग की आग और जहरीली बारिश! क्या पाकिस्तान पर गिर सकती है ‘ब्लैक रेन’ की मार?
मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और ईरान के तेल प्लांटों पर हमलों के बाद ‘ब्लैक रेन’ का खतरा चर्चा में है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों तक भी पहुंच सकता है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव और संभावित बड़े युद्ध की आशंकाओं के बीच पाकिस्तान को एक नए खतरे की चिंता सताने लगी है, जिसे एक्सपर्ट “ब्लैक रेन” का जोखिम बता रहे हैं. आर्थिक संकट, महंगाई और ऊर्जा निर्भरता से पहले ही जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह खतरा पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिहाज से भी गंभीर माना जा रहा है. अगर क्षेत्र में बड़ा सैन्य संघर्ष होता है और तेल ठिकानों या रिफाइनरियों पर हमले होते हैं, तो उसके धुएं और प्रदूषण का असर पाकिस्तान तक पहुंच सकता है.
ब्लैक रेन क्या होती है और यह कैसे बनती है?
ब्लैक रेन दरअसल अत्यधिक प्रदूषित बारिश होती है, जिसमें हवा में मौजूद धुआं, कालिख और जहरीले कण बारिश के साथ जमीन पर गिरते हैं. जब बड़े पैमाने पर तेल भंडार, रिफाइनरी या औद्योगिक ठिकाने जलते हैं, तो वातावरण में काले धुएं और कार्बन कणों की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. ये कण बादलों में मिलकर बारिश के साथ नीचे आते हैं, जिससे पानी काला या बेहद गंदा दिखाई देता है. ऐसी बारिश मिट्टी, फसलों और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकती है.
मिडिल ईस्ट के युद्ध से पाकिस्तान पर क्यों बढ़ा खतरा?
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है. अगर इस इलाके में बड़े स्तर पर सैन्य हमले होते हैं और तेल के कुएं या रिफाइनरियां जलती हैं, तो उससे निकलने वाला धुआं हजारों किलोमीटर दूर तक फैल सकता है. पाकिस्तान भौगोलिक रूप से मिडिल ईस्ट के काफी करीब है, इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर धुएं और प्रदूषण का असर उसकी हवा और मौसम प्रणाली पर भी पड़ सकता है. हवाओं की दिशा और मौसम की स्थिति के अनुसार यह प्रदूषण पाकिस्तान के आसमान तक पहुंच सकता है.
क्या इतिहास में पहले भी ‘ब्लैक रेन’ जैसी घटना हुई है?
ऐसी घटनाओं के उदाहरण पहले भी देखे जा चुके हैं. 1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत के कई तेल कुओं में आग लगा दी गई थी. महीनों तक जलते रहे इन कुओं से निकले धुएं ने पूरे क्षेत्र के वातावरण को प्रदूषित कर दिया था. उस समय कई जगहों पर कालिख मिली बारिश की रिपोर्ट सामने आई थी. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े पैमाने पर तेल आगजनी का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के देशों तक फैल सकता है.
पाकिस्तान पर इसका कितना पड़ सकता है असर?
अगर ब्लैक रेन जैसी स्थिति बनती है तो इसका असर खेती, पानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है. प्रदूषित बारिश से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो सकती है और फसलों को नुकसान पहुंच सकता है. इसके अलावा हवा में मौजूद जहरीले कण सांस से जुड़ी बीमारियों, आंखों में जलन और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ा सकते हैं. पहले से प्रदूषण और आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है.
क्या PAK पहले से क्लाइमेट क्राइसिस से जूझ रहा है?
पाकिस्तान पहले से ही कई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है. वायु प्रदूषण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव वहां लगातार बढ़ रहे हैं. कई बड़े शहरों में सर्दियों के दौरान स्मॉग की गंभीर समस्या देखने को मिलती है. ऐसे में अगर मिडिल ईस्ट में युद्ध से बड़े पैमाने पर धुआं और प्रदूषण फैलता है, तो यह पहले से कमजोर पर्यावरणीय स्थिति को और खराब कर सकता है.
क्या आने वाले समय में खतरा और बढ़ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में सैन्य तनाव बढ़कर बड़े युद्ध में बदलता है और तेल ठिकानों को नुकसान पहुंचता है, तो प्रदूषण का असर क्षेत्रीय स्तर पर फैल सकता है. ऐसे में पाकिस्तान समेत कई पड़ोसी देशों को भी इसके पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं. इसलिए क्षेत्र में बढ़ते तनाव को सिर्फ सैन्य या राजनीतिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी गंभीर माना जा रहा है.
दरअसल 28 फरवरी को ईरान पर इजरायल और अमेरिकी हमले के बाद से ब्लैक रेन की स्थिति उत्पन्न हुई है. पिछले 12 दिनों में तेहरान के आस-पास कम से कम चार तेल प्लांट पर हमले हुए हैं, जिसमें उत्तर-पश्चिम में शाहरान डिपो और दक्षिण-पूर्व में तेहरान तेल रिफाइनरी शामिल हैं. इजरायल के इन हमलों की वजह से ब्लैक रेन की घटनाएं ईरान में हुई है. अब यह खतरा पाकिस्तान पर मंडरा रहा है.