खुल गई ख़ामेनेई की पोल! तीर्थयात्री बनाकर इराक से बुलाए जा रहे सैकड़ों शिया मिलिशिया, नागरिकों को कुचलने का ये कैसा प्लान?
ईरान में जारी व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच अयातुल्ला खामेनेई पर आरोप है कि उन्होंने अपने ही नागरिकों को कुचलने के लिए इराकी शिया मिलिशिया को बुलाया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरानी सुरक्षा बलों के गोली चलाने से इनकार के बाद अरबी भाषी लड़ाकों की तैनाती की गई. इसी दौरान मौतों की संख्या में तेज उछाल, इंटरनेट ब्लैकआउट और मानवाधिकार उल्लंघनों ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है.;
ईरान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहा है. दिसंबर के आखिरी हफ्ते में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब सिर्फ महंगाई या बेरोज़गारी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सीधे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता को चुनौती देने लगे हैं. “मुल्लाओं को जाना होगा” जैसे नारे अब देशभर में गूंज रहे हैं. इसी बढ़ते जनाक्रोश के बीच खामेनेई सरकार पर एक बेहद गंभीर आरोप सामने आया है कि उसने अपने ही लोगों पर गोली चलाने से हिचक रहे सुरक्षा बलों की जगह विदेशी मिलिशिया को उतार दिया है.
रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, ईरान की IRGC और बसीज जैसी अर्धसैनिक इकाइयों के भीतर असंतोष बढ़ रहा है. कई जवानों ने कथित तौर पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया. ऐसे जवानों को हिरासत में लेने की खबरें भी सामने आई हैं. इसी पृष्ठभूमि में खामेनेई शासन ने कथित तौर पर इराक से शिया मिलिशिया को बुलाकर सड़कों पर उतारने का फैसला किया. यह कदम शासन की घबराहट और आंतरिक अविश्वास को उजागर करता है.
तीर्थयात्रियों के भेष में हथियारबंद दस्ते
इराक-ईरान सीमा पर तैनात एक इराकी अधिकारी की गवाही ने इस पूरे ऑपरेशन पर से पर्दा उठाया. उन्होंने बताया कि बसों में “तीर्थयात्री” बताकर सैकड़ों युवा पुरुषों को ईरान भेजा गया. इन बसों में न परिवार थे, न बुज़ुर्ग सिर्फ एक जैसे काले कपड़ों में युवा लड़ाके. 11 जनवरी तक ऐसी करीब 60 बसें सीमा पार कर चुकी थीं. यह किसी धार्मिक यात्रा से ज्यादा एक सुनियोजित सैन्य मूवमेंट जैसा लग रहा था.
हिंसा के आंकड़े और अचानक बढ़ती मौतें
प्रदर्शन शुरू होने के शुरुआती दिनों में मौतों का आंकड़ा सैकड़ों में था, लेकिन कुछ ही दिनों में यह तेजी से बढ़ता चला गया. अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक 2,600 से ज्यादा लोग मारे गए हैं, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान यह संख्या कहीं अधिक बता रहे हैं. गौर करने वाली बात यह है कि मौतों में तेज उछाल उसी समय आया, जब अरबी बोलने वाले सशस्त्र लड़ाकों के ईरान में प्रवेश की खबरें सामने आईं. इससे संदेह और गहरा हो गया है.
अरबी भाषा और विदेशी मौजूदगी के संकेत
ईरान के कई शहरों से ऐसे वीडियो और संदेश सामने आए हैं, जिनमें हथियारबंद लोग अरबी भाषा में बात करते सुने गए. स्थानीय नागरिकों का दावा है कि ये लोग फारसी नहीं समझते और बेहद बेरहमी से कार्रवाई कर रहे हैं. कुछ क्षेत्रों में कर्फ्यू, छतों पर स्नाइपर्स और अंधाधुंध गोलीबारी की खबरें आई हैं. यह सब उस धारणा को मजबूत करता है कि शासन अब बाहरी ताकतों के सहारे अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.
Axis of Resistance अब जनता के खिलाफ?
जिन मिलिशिया समूहों के नाम सामने आए हैं जैसे काताइब हिज़्बुल्लाह, हरकत अल-नुजाबा और हश्द अल-शाबी वे वही नेटवर्क हैं, जिन्हें ईरान ने दशकों तक क्षेत्रीय रणनीति के लिए तैयार किया था. अमेरिका और इज़राइल इन्हें “Axis of Evil” कहकर निशाना बनाते रहे हैं. अब आरोप है कि यही नेटवर्क ईरान के भीतर, ईरानी जनता के खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है. यह शासन की नैतिक और राजनीतिक वैधता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
पैसे के बदले लड़ाई: बेरोज़गारी का फायदा
रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई इराकी युवाओं को 600 डॉलर मासिक वेतन का लालच देकर भर्ती किया गया. बेरोज़गारी से जूझ रहे युवाओं के लिए यह ऑफर आकर्षक था. परिवारों की आपत्तियों के बावजूद कई लोग ईरान भेजे गए, जिनसे बाद में संपर्क टूट गया. इंटरनेट बंदी और संचार साधनों पर छापों ने सच्चाई को बाहर आने से रोकने की कोशिश की है.
इंटरनेट ब्लैकआउट और सूचनाओं पर पहरा
ईरान सरकार ने विरोध को दबाने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं और सैटेलाइट कनेक्शन तक को निशाना बनाया. स्टारलिंक जैसी सेवाओं को जाम करने के बाद, उनके इस्तेमाल करने वालों पर छापे मारे गए. आम जनता अंधेरे में धकेली जा रही है, जबकि सत्ता पक्ष एक सुरक्षित “व्हाइटलिस्ट नेटवर्क” के जरिए संवाद कर रहा है. यह असमानता खुद में डर और अविश्वास को और बढ़ा रही है.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और चेतावनियां
अमेरिकी विदेश विभाग समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इन घटनाओं पर चिंता जताई है. सवाल उठाया जा रहा है कि जब कोई शासन अपने ही नागरिकों को दबाने के लिए विदेशी बंदूकधारियों का सहारा ले, तो उसकी वैधता कितनी बचती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह 1979 के बाद से चले आ रहे उस मॉडल की पुनरावृत्ति है, जिसमें दमन को “आउटसोर्स” किया जाता रहा है.
सत्ता बनाम जनता: निर्णायक मोड़ पर ईरान
इन तमाम घटनाओं को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ होती है. ईरान में विरोध अब निर्णायक मोड़ पर है. अपने ही सुरक्षा बलों पर भरोसा खो चुका शासन बाहरी ताकतों के सहारे टिका हुआ है. यह सिर्फ दमन नहीं, बल्कि ईरान के सामाजिक अनुबंध का टूटना भी दर्शाता है. सवाल अब यही है कि जब सत्ता को बचाने के लिए विदेशी बंदूकें बुलानी पड़ें, तो वह सत्ता जनता के दिलों में कितनी देर टिक पाएगी?