ट्रंप का ड्रोन वाला गेम, अमेरिका ऐसे कर रहा पाकिस्तान में एंट्री, भारत की कितनी बढ़ेगी टेंशन, चीन-तुर्की का भी बड़ा कनेक्शन
ट्रंप के बेटों से जुड़े निवेश वाली अमेरिकी ड्रोन कंपनी Powerus का पाकिस्तान से समझौता भारत की सुरक्षा और चीन-तुर्की के साथ बदलते ड्रोन समीकरण को अहम बनाता है.
भारत-पाक के बीच तनातनी जगजाहिर है. इसमें पाकिस्तान को मजबूत बनाए रखने के लिए एक तरफ चीन और तुर्की पाकिस्तान को ड्रोन और सैन्य तकनीक दे रहा है, दूसरी तरफ तुर्की अपने लड़ाकू ड्रोन के साथ खड़ा है और अब अमेरिका की एक ऐसी कंपनी पाकिस्तान पहुंच रही है, जिससे ट्रंप के बेटों से जुड़े निवेश का नाम जुड़ा है. सितंबर 2026 में Powerus को पाकिस्तान से ड्रोन से जुड़ा शुरुआती आदेश मिला और स्थानीय उत्पादन की संभावनाएं भी सामने आईं. दिलचस्प बात यह है कि यही कंपनी भारत में भी एंटी ड्रोन सिस्टम के निर्माण के लिए समझौता कर चुकी है. ऐसे में सवाल सिर्फ ड्रोन का नहीं, बल्कि बदलते दक्षिण एशियाई शक्ति समीकरण का है.
क्या ट्रंप परिवार से जुड़ी कंपनी Pakistan पहुंच गई?
सितंबर 2026 में ट्रंप के बेटों से जुड़े निवेश वाली अमेरिकी कंपनी Powerus ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय से मानवरहित हवाई प्रणालियों के लिए शुरुआती आदेश हासिल किया. इसके साथ पाकिस्तान में स्थानीय उत्पादन और संयुक्त उद्यम की संभावनाओं पर भी बात सामने आई. इसलिए इसे सीधे तौर पर ‘ट्रंप के बेटों की ड्रोन फैक्ट्री’ कहना अभी सही नहीं होगा. फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि ट्रंप परिवार से जुड़े निवेश वाली कंपनी पाकिस्तान के रक्षा क्षेत्र में अपनी तकनीक के जरिए प्रवेश कर रही है.
क्या PAK में अमेरिकी ड्रोन बनेंगे?
अभी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने की पुष्टि नहीं हुई है. Powerus और पाकिस्तान के बीच समझौते में स्थानीय स्तर पर उत्पादन की संभावना तलाशने की बात सामने आई है. अगर आगे संयुक्त उद्यम बनता है और उत्पादन शुरू होता है तो पाकिस्तान को तैयार ड्रोन खरीदने के बजाय उनके निर्माण और रखरखाव की क्षमता भी मिल सकती है. यही पहलू भारत की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थानीय उत्पादन से सैन्य तकनीक की उपलब्धता और इस्तेमाल का दायरा बढ़ सकता है.
भारत के लिए यह मामला क्यों अहम है?
Powerus का पाकिस्तान से समझौता भारत के साथ हुए उसके पहले के समझौते के बाद सामने आया है. जून 2026 में कंपनी ने भारतीय कंपनी पारस डिफेंस के साथ गार्जियन-1 ड्रोन रोधी प्रणाली के भारत में निर्माण और बिक्री के लिए समझौता किया था. यानी एक ही अमेरिकी कंपनी भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ रक्षा क्षेत्र में काम कर रही है. हालांकि दोनों देशों के समझौतों की पूरी तकनीकी जानकारी सार्वजनिक नहीं है, इसलिए दोनों को समान सैन्य क्षमता मिल रही है, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगा.
पाकिस्तान के साथ चीन का कनेक्शन कितना मजबूत?
अमेरिका की नई मौजूदगी के बावजूद पाकिस्तान की चीन पर सैन्य निर्भरता काफी मजबूत है. चीन लंबे समय से पाकिस्तान का प्रमुख रक्षा साझेदार है और पाकिस्तान चीनी ड्रोन तथा कई अन्य सैन्य प्रणालियों का इस्तेमाल करता है. 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के हथियार आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत रही. इसलिए अमेरिकी कंपनी की एंट्री को चीन से पाकिस्तान के अलग होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा. ज्यादा संभावित तस्वीर यह है कि पाकिस्तान अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों से तकनीक और निवेश लेने की कोशिश कर रहा है.
तुर्की ड्रोन खेल में कहां है?
तुर्की भी पाकिस्तान के ड्रोन नेटवर्क का अहम हिस्सा है. पाकिस्तान तुर्की के बायराक्तर टीबी-2 और अकिनजी जैसे ड्रोन इस्तेमाल करता है. दोनों देशों के बीच मानवरहित प्रणालियों, विमान तकनीक और संयुक्त रक्षा उत्पादन में सहयोग बढ़ा है. अगस्त 2026 में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौता भी हुआ. ऐसे में पाकिस्तान के पास चीन से सैन्य तकनीक, तुर्की से लड़ाकू ड्रोन और अमेरिका से ड्रोन रोधी तकनीक हासिल करने का रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है.
मिडिल ईस्ट वॉर से ड्रोन की अहमियत क्यों बढ़ी?
मध्य पूर्व और दूसरे युद्धक्षेत्रों में कम लागत वाले हमलावर ड्रोन के इस्तेमाल ने दुनिया की सेनाओं के सामने नई चुनौती खड़ी की है. शाहेद-136 और गेरान-2 जैसे ड्रोन ने दिखाया कि अपेक्षाकृत सस्ती तकनीक से महत्वपूर्ण सैन्य और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है. इसी वजह से ड्रोन को रोकने वाली प्रणालियों की मांग भी बढ़ी है. Powerus का गार्जियन तंत्र इसी तरह के खतरों से निपटने के लिए बनाया गया है. इसका असर अब मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया तक रक्षा रणनीतियों में दिखाई दे रहा है.
Operation Sindoor के बाद भारत के लिए क्या बदला?
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच ड्रोन और उन्हें रोकने वाली तकनीक की अहमियत और बढ़ गई है. इस अभियान ने आधुनिक संघर्ष में ड्रोन की भूमिका को फिर सामने रखा. अब चुनौती केवल पाकिस्तान से आने वाले ड्रोन की नहीं है, बल्कि उसके पीछे मौजूद अलग-अलग देशों की तकनीक और उत्पादन क्षमता भी महत्वपूर्ण है. अगर पाकिस्तान को चीन, तुर्की और अमेरिका से अलग-अलग प्रणालियां मिलती हैं और स्थानीय उत्पादन बढ़ता है, तो भारत के लिए निगरानी और ड्रोन रोधी क्षमता को लगातार मजबूत रखना महत्वपूर्ण होगा. यही इस पूरे घटनाक्रम का बड़ा सुरक्षा पहलू है.