कितने खतरनाक होते हैं Vacuum बम जो इंसान के जिस्‍म को कर देते हैं 'धुआं धुआं'?

गाजा में थर्मोबारिक या वैक्यूम बम के इस्तेमाल का दावा सामने आया है, जिन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक गैर परमाणु हथियारों में गिना जाता है. जानें ये बम कैसे काम करते हैं, कितनी तबाही मचाते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है.;

( Image Source:  Sora AI )
Edited By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 12 Feb 2026 1:12 PM IST

इजरायल–गाजा युद्ध ने दुनिया के सामने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में इस्तेमाल हो रहे हथियार कितने भयावह हो चुके हैं. हाल ही में अल जजीरा की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि गाजा में ऐसे हथियारों का इस्तेमाल हुआ, जिनकी गर्मी और दबाव इतना अधिक था कि हजारों लोग भाप (धुआं) बनकर उड़ गए. यानी उनके शरीर के पूरे अवशेष तक नहीं मिले. रिपोर्ट में जिन हथियारों का जिक्र किया गया, उन्हें थर्मोबारिक या वैक्यूम बम कहा जाता है. इन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक गैर-परमाणु हथियारों में गिना जाता है.

कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ये बम सामान्य विस्फोटकों से कहीं ज्यादा तबाही मचाते हैं. इनकी खासियत यह है कि ये सिर्फ विस्फोट नहीं करते, बल्कि आग, प्रेशर वेव और ऑक्सीजन खत्म करने वाली वैक्यूम वेव पैदा करते हैं, जिससे इंसानी शरीर को बचने का लगभग कोई मौका नहीं मिलता.

 

क्या होता है थर्मोबारिक या वैक्यूम बम?

थर्मोबारिक बम को वैक्यूम बम, एयरोसोल बम या फ्यूल-एयर एक्सप्लोसिव (FAE) भी कहा जाता है. यह पारंपरिक बमों से अलग तरीके से काम करता है. आमतौर पर एक थर्मोबारिक हथियार में दो चरणों वाला विस्फोट होता है:

पहला चरण : बम के अंदर मौजूद ईंधन (fuel) को हवा में फैलाया जाता है. यह ईंधन एक गैस या एयरोसोल बादल की तरह चारों तरफ फैलता है और इमारतों के अंदर तक घुस जाता है - खिड़कियों, दरवाजों, सुरंगों और बंकरों में.

दूसरा चरण : इसके बाद दूसरा विस्फोट उस ईंधन के बादल को आग लगा देता है. इससे एक बेहद विशाल आग का गोला (fireball) बनता है, जबरदस्त ब्लास्ट वेव पैदा होती है और आसपास की सारी ऑक्सीजन खिंच जाती है.

यही कारण है कि इसे 'वैक्यूम बम' कहा जाता है, क्योंकि विस्फोट के बाद एक तरह का खालीपन बन जाता है, जिसमें सांस लेना असंभव हो जाता है.

तापमान और ताकत कितनी होती है?

  • अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, गाजा में इस्तेमाल किए गए कुछ हथियारों का तापमान 3,500 डिग्री सेल्सियस (करीब 6,300 फॉरेनहाइट) तक पहुंच गया. यह तापमान इतना ज्यादा है कि इंसानी शरीर का सॉफ्ट टिशू पल भर में जलकर खत्म हो सकता है. रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया कि:
  • थर्मोबारिक बम से पैदा होने वाली प्रेशर वेव फेफड़ों को फाड़ सकती है.
  • गर्मी से त्वचा और मांस तुरंत जल जाता है.
  • बंद जगहों (कमरे, सुरंग, बेसमेंट) में इसका असर कई गुना ज्यादा होता है.
  • यही वजह है कि यह हथियार खास तौर पर सुरंगों, बंकरों, इमारतों और गुफाओं के अंदर छिपे लोगों को मारने के लिए डिजाइन किया गया है.

कहां और कब इस्तेमाल हुए हैं ऐसे बम?

इतिहास : थर्मोबारिक हथियार नए नहीं हैं. इनका इतिहास करीब 80 साल पुराना है.

द्वितीय विश्व युद्ध : जर्मनी ने शुरुआती रूप में ऐसे हथियारों का प्रयोग किया.

वियतनाम युद्ध (1960s) : अमेरिका ने जंगल और सुरंगों में छिपे लड़ाकों के खिलाफ इस्तेमाल किया.

अफगानिस्तान : अमेरिका ने अल-कायदा के ठिकानों पर प्रयोग किया.

चेचन्या युद्ध (1999) : रूस ने इनका इस्तेमाल किया, जिसकी मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना की.

सीरिया युद्ध : असद सरकार पर ऐसे हथियारों के प्रयोग के आरोप लगे.

यूक्रेन युद्ध : रूस पर थर्मोबारिक हथियारों के उपयोग के आरोप लगे, जिसकी जांच की बात ICC ने कही.

क्या ये बम अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत प्रतिबंधित हैं?

सीधे तौर पर थर्मोबारिक बमों पर कोई अलग से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं है. लेकिन अगर इनका इस्तेमाल नागरिक इलाकों, स्कूलों, अस्पतालों और शरणार्थी शिविरों में किया जाता है तो यह युद्ध अपराध (War Crime) माना जा सकता है. हेग कन्वेंशन (1899 और 1907) और जिनेवा कन्वेंशन के तहत नागरिकों को निशाना बनाना अपराध है. इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के अभियोजक करीम खान पहले ही यूक्रेन जैसे मामलों में जांच की बात कह चुके हैं.

क्यों ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं ये बम?

थर्मोबारिक बम इसलिए ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये सिर्फ मारते नहीं, दम घोंटते हैं. बंद जगहों में इनसे बचना लगभग असंभव होता है. शरीर पर बाहरी घाव कम दिखते हैं, लेकिन अंदरूनी अंग फट जाते हैं. कई बार कोई शव ही नहीं बचता. यानी मौत सिर्फ विस्फोट से नहीं, बल्कि ऑक्सीजन खत्म होने, प्रेशर से और अत्‍याधिक गर्मी से होती है.

ऐसे हथियारों का इस्तेमाल कितना सही?

गाजा के मामले ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या ऐसे हथियारों का इस्तेमाल नैतिक है? क्या तकनीकी ताकत इंसानी करुणा से ऊपर हो गई है? जब किसी शहर में रहने वाले लोग, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल हों, ऐसे हथियारों की चपेट में आते हैं, तो यह सिर्फ सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी बन जाती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का कहना है कि ChatGPT जैसे डिजिटल टूल्स पर हम भरोसा करते हैं, लेकिन युद्ध में इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी इंसानों को मिटा देने की क्षमता रखती है. यही विरोधाभास आधुनिक युग की सबसे बड़ी सच्चाई है.

Similar News