आत्महत्या के लिए उकसावे में शक नहीं, सबूत जरूरी: 21 साल बाद पति हुआ बरी, उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
21 साल पुराने आत्महत्या उकसावे मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि IPC 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए ठोस और प्रत्यक्ष सबूत अनिवार्य हैं. सिर्फ शक या सामान्य वैवाहिक विवाद को उकसावा नहीं माना जा सकता, आरोपी को बरी किया गया.
21 साल पुराने एक संवेदनशील मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC धारा 306) के मामलों में केवल शक या आरोप काफी नहीं होते, बल्कि ठोस और प्रत्यक्ष सबूत जरूरी हैं. न्यायमूर्ति जस्टिस आशीष नैथानी की पीठ ने उद्यम सिंह नगर की सेशंस कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुनील दत्त पाठक को बरी कर दिया.
आरोप था कि पत्नी के चरित्र पर शक और मानसिक उत्पीड़न के कारण उसने आत्महत्या की. लेकिन पोस्टमार्टम में हत्या के संकेत नहीं मिले, न ही कोई सुसाइड नोट बरामद हुआ. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उकसावे, जानबूझकर मदद या सक्रिय भूमिका का प्रमाण होना अनिवार्य है. सामान्य वैवाहिक विवाद या संदेह को आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता. इस फैसले ने आपराधिक कानून में प्रमाण के मानक को फिर से रेखांकित किया है.
पढ़ें अदालत में सुनवाई की 10 बड़ी बातें...
- हाईकोर्ट ने कहा, आत्महत्या के लिए उकसावे में दोषसिद्धि हेतु ठोस सबूत चाहिए; केवल मजबूत शक या सामान्य आरोप IPC धारा 306 के तहत सजा का आधार नहीं बन सकते.
- मामला 15 सितंबर 2004 का है, जब आरोपी की पत्नी ने खटीमा में मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या की; पोस्टमार्टम में हत्या के संकेत नहीं मिले.
- अभियोजन का आरोप था कि पति चरित्र पर संदेह करता था और मानसिक उत्पीड़न करता था, जिससे पत्नी ने कथित तौर पर आत्महत्या जैसा कदम उठाया.
- ट्रायल कोर्ट ने दहेज हत्या और क्रूरता के आरोपों से आरोपी को बरी किया था, लेकिन धारा 306 IPC के तहत सात साल की सजा सुनाई थी.
- अपील में दलील दी गई कि आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे, जानबूझकर मदद या सक्रिय भूमिका का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है.
- बचाव पक्ष ने कहा कि कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ और वैवाहिक कलह या चरित्र पर संदेह को कानूनी तौर पर उकसावा नहीं माना जा सकता.
- हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा कर दोहराया कि धारा 306 में दोषसिद्धि के लिए स्पष्ट ‘इंस्टिगेशन’ या ‘इंटेंशनल एड’ साबित करना जरूरी है.
- अदालत ने पाया कि आरोप सामान्य मानसिक उत्पीड़न तक सीमित हैं और आत्महत्या के समय से जुड़ा कोई विशिष्ट उकसाने वाला कृत्य प्रमाणित नहीं हुआ.
- आपराधिक कानून के सिद्धांत पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा, “गंभीर से गंभीर शक भी सबूत का स्थान नहीं ले सकता.”
- पर्याप्त प्रमाण न मिलने पर सेशंस कोर्ट का फैसला रद्द किया गया और आरोपी सुनील दत्त पाठक को धारा 306 IPC के आरोप से बरी कर दिया गया.