उत्तर प्रदेश की सियासत में स्वामी प्रसाद मौर्य की एंट्री को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच खींचतान सामने आ गई है. अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि स्वामी प्रसाद मौर्य को उनके गठबंधन में जगह नहीं मिलेगी. वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम खुलकर इस फैसले के खिलाफ बोल रहे हैं.

बताया जा रहा है कि कांग्रेस की ओर से स्वामी प्रसाद मौर्य को गठबंधन में शामिल करने का भरोसा दिया गया था और उनकी राहुल गांधी से मुलाकात भी कराई गई थी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस और सपा के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर यह विवाद आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक टकराव बन सकता है?

अखिलेश ने क्यों बंद किए स्वामी प्रसाद मौर्य के लिए दरवाजे?

स्वामी प्रसाद मौर्य की गठबंधन में एंट्री को लेकर अखिलेश यादव का रुख बिल्कुल साफ नजर आ रहा है. जब उनसे पत्रकार ने पूछा कि क्या स्वामी प्रसाद मौर्य महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं, तो अखिलेश ने दो टूक जवाब दिया कि वह उनके गठबंधन में शामिल नहीं होंगे. यानी सपा की तरफ से फिलहाल स्वामी प्रसाद मौर्य के लिए कोई जगह नहीं है.  

अखिलेश के इस बयान को सिर्फ एक नेता की एंट्री रोकने के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके पीछे समाजवादी पार्टी की अपनी राजनीतिक रणनीति भी बताई जा रही है. सपा के भीतर यह धारणा है कि पार्टी के पास अब उस सामाजिक आधार से जुड़े कई बड़े चेहरे मौजूद हैं, जिसके लिए कभी स्वामी प्रसाद मौर्य को अहम माना जाता था. ऐसे में पार्टी को अब उनकी राजनीतिक जरूरत पहले जैसी नहीं लगती.

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सपा के पास बाबू सिंह कुशवाहा समेत कई बड़े चेहरे

स्वामी प्रसाद मौर्य की जाति के नेताओं की बात करें तो सपा में अब कई ऐसे चेहरे हैं, जिनका अपने क्षेत्र और समुदाय में राजनीतिक प्रभाव माना जाता है. इनमें बाबू सिंह कुशवाहा का नाम सबसे प्रमुख है. इसके अलावा आंवला से सपा सांसद नीरज मौर्य और एटा से सांसद देवेश शाक्य भी पार्टी के अहम चेहरों में शामिल हैं.

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सियासी नजरिए से देखें तो सपा के पास अब ऐसे नेताओं की मौजूदगी है, जिनके जरिए वह अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है. यही वजह है कि अखिलेश यादव स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने साथ नहीं जोड़ना चाहते हैं.  

2022 के विवादित बयानों का असर अब भी?

समाजवादी पार्टी से जुड़े लोगों के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान स्वामी प्रसाद मौर्य के बार-बार दिए गए विवादित बयानों से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा था. उस समय अखिलेश यादव ने केशव प्रसाद मौर्य के मुकाबले राजनीतिक संदेश देने और एक खास सामाजिक समीकरण साधने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने साथ रखा था... लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं.

स्वामी प्रसाद मौर्य की सियासी उपयोगिता को लेकर सपा के भीतर पहले जैसी सहमति नहीं दिखती. पार्टी के पास दूसरे नेताओं के रूप में विकल्प मौजूद हैं और पुराने विवादित बयानों का अनुभव भी उसके फैसले को प्रभावित कर सकता है. 

फाजिलनगर में हार ने भी कमजोर की सियासी स्थिति?

  • स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करते समय 2022 का विधानसभा चुनाव भी अहम हो जाता है. उस चुनाव में उन्होंने फाजिलनगर सीट से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन बीजेपी के कुशवाहा उम्मीदवार के हाथों उन्हें करीब 28 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा था. यह नतीजा उनके राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल खड़े करता है. 
  • जिस सामाजिक समीकरण के सहारे स्वामी प्रसाद मौर्य को सपा में अहमियत मिलने की बात कही जाती थी, उसी समीकरण वाली सीट पर उन्हें हार मिली.
  • ऐसे में सपा नेतृत्व के लिए उनकी चुनावी उपयोगिता पर दोबारा विचार करना स्वाभाविक माना जा सकता है. हालांकि, किसी एक चुनाव की हार को उनकी पूरी राजनीतिक ताकत का पैमाना नहीं माना जा सकता.

कांग्रेस ने दिखाई नजदीकी, राहुल गांधी से मुलाकात भी

इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू कांग्रेस से जुड़ा है.  बताया जा रहा है कि कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की ओर से स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी के साथ जोड़ने का भरोसा दिया गया था. इतना ही नहीं, उनकी राहुल गांधी से मुलाकात भी कराई गई थी। इससे स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के करीब आने की अटकलों को बल मिला.. लेकिन अब अखिलेश यादव के साफ इनकार के बाद कांग्रेस के सामने राजनीतिक असमंजस खड़ा हो गया है. अगर कांग्रेस स्वामी प्रसाद मौर्य को गठबंधन में शामिल करने की कोशिश करती है, तो उसे सपा के विरोध का सामना करना पड़ सकता है. दूसरी तरफ, अगर कांग्रेस अखिलेश के फैसले के साथ खड़ी होती है, तो स्वामी को दिए गए कथित भरोसे पर सवाल उठ सकते हैं.

राजेंद्र पाल गौतम ने अखिलेश के फैसले पर उठाए सवाल

अखिलेश यादव के इनकार के बाद कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम खुलकर उनके फैसले के खिलाफ बोल रहे हैं. यानी जिस गठबंधन को बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता के तौर पर पेश किया जाता है, उसके भीतर ही एक नेता की एंट्री को लेकर मतभेद सामने आ गए हैं.

यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस दोनों की राजनीतिक जरूरतें और चुनावी रणनीति अलग-अलग हो सकती हैं. एक तरफ अखिलेश यादव अपने संगठन और सामाजिक समीकरण के हिसाब से फैसले लेना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस अपने राजनीतिक विस्तार और नए चेहरों को जोड़ने की कोशिश कर सकती है. स्वामी प्रसाद मौर्य का मामला इन दोनों रणनीतियों के टकराव को सामने ला रहा है.

स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश पर साधा निशाना

अखिलेश यादव के बयान के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी उन पर पलटवार किया है. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद कन्फ्यूज हो, जो कभी D का मतलब Dalit बताए और कभी D का मतलब Dimple Yadav बताए, वह अपनी पार्टी और प्रदेश को क्या निर्देश दे सकता है?

स्वामी प्रसाद मौर्य का यह बयान सीधे अखिलेश यादव पर निशाना है. इससे साफ है कि गठबंधन में जगह नहीं मिलने के मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक तल्खी बढ़ गई है. अब तक मामला सिर्फ एंट्री पर असहमति का था, लेकिन बयानबाजी ने इसे व्यक्तिगत राजनीतिक हमले का रूप भी दे दिया है.

स्वामी प्रसाद मौर्य का कैसा रहा है अब तक का पॉलिटिकल करियर?

  • स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक सफर लंबा और कई दलों में बदलाव वाला रहा है.  उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1980 के दशक में लोकदल और जनता दल के साथ की.
  • 1996 में वह पहली बार विधायक बने. बसपा सरकार में वह कई बार मंत्री रहे और उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे. टिकट बिक्री के आरोपों का हवाला देते हुए उन्होंने 2016 में बसपा छोड़ दी.
  •  2016 में वह बीजेपी में शामिल हुए और 2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार में कैबिनेट मंत्री (श्रम मंत्री) बने.
  • 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा और उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया. हालांकि, फाजिलनगर सीट से उन्हें हार का सामना करना पड़ा.  रामचरितमानस से जुड़े बयानों और पार्टी से मतभेदों के चलते उन्होंने फरवरी 2024 में सपा के पद और सदस्यता से इस्तीफा दे दिया.
  • सपा छोड़ने के बाद उन्होंने पहले 'राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (आरएसएसपी)' / 'अपनी जनता पार्टी' का गठन किया. उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव कुशीनगर सीट से लड़ा था जिसमें उन्हें हार मिली.

  

यूपी की सियासत में आगे क्या होगा?

फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम में तीन बातें अहम हैं. पहली, अखिलेश यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य को गठबंधन में शामिल करने से साफ इनकार कर दिया है. दूसरी, कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम इस फैसले के खिलाफ बोल रहे हैं। तीसरी, स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है.

अब बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर अखिलेश यादव के साथ खड़ी रहती है या स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर अपनी अलग राजनीतिक लाइन अपनाती है. अगर दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बनती, तो इसका असर उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन के तालमेल पर पड़ सकता है. फिलहाल इतना तय है कि स्वामी प्रसाद मौर्य की एंट्री का मुद्दा सपा और कांग्रेस के बीच नई सियासी खींचतान की वजह बन गया है.