आज ही के दिन अयोध्या में कारसेवकों पर चली थी गोली, 36 साल पहले क्या हुआ था, मुलायम को घेरते हुए अमित शाह ने अखिलेश पर साधा निशाना
30 अक्टूबर 1990 के अयोध्या गोलीकांड के 36 साल बाद अमित शाह ने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पर निशाना साधा. जानिए पूरा मामला और राजनीतिक बयान.
यूपी में एमएलसी चुनाव का परिणाम आने के बाद अचानक प्रदेश की राजनीति चरम पहुंच गया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लखनऊ में 30 अक्टूबर 2026 को आयोजित उत्तर प्रदेश बीजेपी की कार्यसमिति की बैठक में अयोध्या में 36 साल पहले हुए कारसेवक गोलीकांड का मुद्दा उठाकर समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हुए भुलावे में न रहने की नसीहद दी है. मुलायम सिंह यादव की तत्कालीन सरकार का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि राम भक्तों पर चलाई गई गोलियों को जनता कभी नहीं भूलेगी. उन्होंने अखिलेश यादव की सरकार बनाने की दावेदारी पर भी सवाल उठाए.
अमित शाह के इस बयान पर सपा प्रमुख ने पलटवार करते हुए कहा कि हार-जीत भाषणों से नहीं, बल्कि जनता के वोट से तय होती है. एमएलसी चुनाव के बाद दोनों दलों के बीच बढ़ती तल्खी के बीच इस बयानबाजी ने यूपी की सियासत को गरमा दिया है.
शाह ने क्या कहा, मुलायम और अखिलेश पर क्यों साधा निशाना?
अमित शाह ने बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में कारसेवकों पर हुई गोलीबारी का जिक्र किया. उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इसी दिन राम भक्तों और बीजेपी कार्यकर्ताओं पर गोलियां चलाई गई थीं.
शाह ने अपने संबोधन में कहा कि सरयू का पानी राम भक्तों के खून से लाल हो गया था. उन्होंने अखिलेश यादव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा, "अखिलेश बाबू, आप किस मुंह से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की बात करते हैं?" शाह ने कहा कि राम भक्तों पर गोली चलाने वालों को जनता कभी माफ नहीं करेगी.
उन्होंने बीजेपी की मौजूदा सरकार को अंगद के पैर की तरह मजबूत बताते हुए दावा किया कि पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार भारी बहुमत के साथ सरकार बनाएगी. शाह ने कार्यकर्ताओं से आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अभी से जुटने की अपील भी की.
नेता जी को निशाने पर लेने के पीछे क्या है वजह?
अमित शाह का मुलायम सिंह यादव का नाम लेकर हमला करना बीजेपी की उस राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसमें पार्टी अयोध्या गोलीकांड को समाजवादी पार्टी की पुरानी सरकार से जोड़कर पेश करती रही है.
30 अक्टूबर 1990 को जब राम मंदिर आंदोलन के दौरान हजारों कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे, उस समय मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उनकी सरकार ने विवादित ढांचे की सुरक्षा के लिए अयोध्या में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए थे. इसी दौरान कारसेवकों पर गोलीबारी हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई.
बीजेपी इस घटना को राम मंदिर आंदोलन और हिंदुत्व की राजनीति से जोड़कर देखती है. अमित शाह ने मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत का जिक्र करके अखिलेश यादव को घेरने की कोशिश की.
अखिलेश यादव ने पलटवार कर क्या कहा?
अमित शाह के बयान पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी जवाब दिया. उन्होंने कहा कि चुनाव में हार और जीत भाषणों से तय नहीं होती, बल्कि जनता अपने वोट से फैसला करती है. अखिलेश ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए वाराणसी के चुनावी नतीजों का जिक्र किया. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जनता ने वहां डबल इंजन की सरकार को डबल जीरो दिया है. उन्होंने अयोध्या की जनता का आभार जताते हुए कहा कि वहां के मतदाताओं ने चुनाव में अपना फैसला सुना दिया है.
अखिलेश का इशारा 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी की जीत की ओर था. इस चुनाव में सपा के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को हराया था. अखिलेश ने अपने जवाब के जरिए यह बताने की कोशिश की कि बीजेपी को चुनावी नतीजों के आधार पर जनता के मूड को समझना चाहिए.
अमित शाह आज कहां हैं और क्या कर रहे हैं?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दौरे पर हैं. वह यूपी बीजेपी की कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने पहुंचे हैं. इस बैठक का उद्देश्य पार्टी संगठन की समीक्षा करना, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाना और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों को दिशा देना है.
शाह ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत का श्रेय पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया. उन्होंने कहा कि 2017 में बीजेपी ने करीब 40 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 312 सीटें हासिल की थीं. वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को करीब 41 प्रतिशत वोट मिले और उसने दोबारा बहुमत की सरकार बनाई. शाह ने कार्यकर्ताओं से अर्जुन की तरह लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की अपील की. उन्होंने कहा कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए पूरी ताकत से जुटना होगा.
सपा-बीजेपी के बीच अचानक तल्खी क्यों बढ़ी?
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच राजनीतिक मुकाबला लगातार तेज हो रहा है. एमएलसी चुनाव के बाद दोनों दलों के नेताओं की बयानबाजी ने इस टकराव को और बढ़ा दिया है. दोनों पार्टियां आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अपने-अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटी हैं.
बीजेपी जहां अपने संगठन की मजबूती, सरकार की उपलब्धियों और राम मंदिर निर्माण को प्रमुखता दे रही है, वहीं सपा महंगाई, बेरोजगारी और सरकार के कामकाज को लेकर बीजेपी को घेर रही है.
अयोध्या गोलीकांड का मुद्दा उठाकर बीजेपी ने एक बार फिर सपा की पुरानी सरकार के फैसलों को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है. वहीं अखिलेश यादव चुनावी नतीजों और जनता के समर्थन को आधार बनाकर बीजेपी के आरोपों का जवाब दे रहे हैं. ऐसे में दोनों दलों के बीच यह टकराव आने वाले विधानसभा चुनाव तक और तेज होने की संभावना है.
36 साल पहले 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या में क्या हुआ था?
अयोध्या में 30 अक्टूबर 1990 का दिन राम मंदिर आंदोलन के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और विवादित घटनाओं में शामिल है. उस समय विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी के नेतृत्व में राम मंदिर निर्माण आंदोलन अपने चरम पर था.
बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन के समर्थन में राम रथ यात्रा निकाली थी. 23 अक्टूबर 1990 को बिहार में उनकी गिरफ्तारी के बाद आंदोलन और तेज हो गया. देश के अलग-अलग हिस्सों से कारसेवक अयोध्या पहुंचने लगे.
तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने विवादित ढांचे की सुरक्षा के लिए अयोध्या में कड़े इंतजाम किए थे. शहर में बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बल तैनात किए गए थे. आवागमन पर पाबंदियां लगाई गईं और कई जगहों पर लोगों को हिरासत में लिया गया.
मुलायम सिंह यादव का उस समय का चर्चित बयान था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता. हालांकि, भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद 30 अक्टूबर की सुबह हजारों कारसेवक सुरक्षा घेरा तोड़कर विवादित परिसर की ओर बढ़ गए.
कारसेवक हनुमानगढ़ी और आसपास की गलियों से होते हुए विवादित परिसर तक पहुंचे. कुछ कारसेवक विवादित ढांचे के गुंबद पर भी चढ़ गए. स्थिति बिगड़ने पर पुलिस और सुरक्षा बलों ने पहले लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. इसके बाद गोलीबारी की गई.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 30 अक्टूबर को पांच कारसेवकों की मौत हुई थी. इसके बाद 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में दोबारा गोलीबारी हुई. दोनों दिनों को मिलाकर आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या करीब 15 से 16 बताई गई, जबकि विश्व हिंदू परिषद और कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने इससे कहीं अधिक लोगों के मारे जाने का दावा किया था.
शाह ने कारसेवा और कल्याण सिंह का जिक्र क्यों किया?
अमित शाह ने अपने संबोधन में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की भूमिका को भी याद किया. उन्होंने कहा कि कल्याण सिंह ने अयोध्या में कारसेवा होने दी और इसके लिए अपनी सरकार गिरने की भी परवाह नहीं की.
शाह का यह बयान बीजेपी के पुराने राजनीतिक संघर्ष और राम मंदिर आंदोलन से पार्टी के जुड़ाव को रेखांकित करने वाला था. बीजेपी लंबे समय से राम मंदिर निर्माण को अपने वैचारिक संघर्ष की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है. ऐसे में कल्याण सिंह का जिक्र करके शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को उस दौर के आंदोलन और उसके राजनीतिक महत्व की याद दिलाई.
क्या 2027 के चुनाव में बड़ा मुद्दा बनेगा अयोध्या गोलीकांड?
केंद्रीय गृह मंत्री शाह के बयान से साफ है कि बीजेपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले अयोध्या गोलीकांड और राम मंदिर आंदोलन के इतिहास को बहस का मुद्दा बनाना चाहती है. पार्टी इस मुद्दे के जरिए समाजवादी पार्टी की पुरानी सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहती है.
दूसरी तरफ अखिलेश यादव बीजेपी के आरोपों का जवाब जनता के फैसले और चुनावी नतीजों के जरिए दे रहे हैं. दोनों दलों के बीच यह लड़ाई केवल पुराने इतिहास को लेकर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के भविष्य की सत्ता पर कब्जे की भी है.