7 साल पहले जिस हत्याकांड में मिली उम्रकैद की सजा, अब उसी में आखिर कैसे बरी हुआ राम रहीम?

रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड देश के चर्चित मामलों में से एक रहा है, जिसमें हरियाणा के सिरसा के एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि पत्रकार ने हत्या से पहले डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह से जुड़ा एक गुमनाम पत्र अपने अखबार में प्रकाशित किया था.

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Edited By :  समी सिद्दीकी
Updated On : 7 March 2026 5:03 PM IST

Ramchandra Chatrapati Murder Case: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शनिवार को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को सिरसा के पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया. मुख्य न्यायाधीश शील नागू और जस्टिस विक्रम अग्रवाल की खंडपीठ ने डेरा प्रमुख की अपील स्वीकार करते हुए यह आदेश सुनाया.

हालांकि अदालत ने इस मामले में अन्य तीन आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है. वहीं, बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण राम रहीम फिलहाल जेल में ही रहेगा. इस मामले में फैसले के बाद एक बार फिर राम चंद्र छत्रपति हत्याकांड सुर्खियों में आ गया है. आइये जानते हैं पूरी डिटेस

राम चंद्र छत्रपति हत्याकांड क्या है?

राम चंद्र छत्रपति एक भारतीय पत्रकार थे जिनकी 21 नवंबर 2002 को मौत हो गई थी. उनकी हत्या 2002 में एक टारगेटेड फायरिंग में हुई थी. छत्रपति हरियाणा के सिरसा में हिंदी भाषा के अखबार की कंपनी में काम करते थे. वह वही पत्रकार थे जिन्होंने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह पर बलात्कार का आरोप लगाने वाला एक गुमनाम पत्र अपने अखबार में प्रकाशित किया था, जिसके मामले में बाद में राम रहीम को दोषी ठहराया गया था. पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में जनवरी 2019 में राम रहीम को उम्रकैद की सजा हुई थी तो वहीं 50 हजार रुपये का जुर्माना लगा था इस मामले में अब हाईकोर्ट से बेल मिल गई है.

कैसे हुई रामचंद्र छत्रपति की हत्या?

24 अक्टूबर की रात मोटरसाइकिल पर सवार दो हमलावरों ने छत्रपति पर फायरिंग कर दी. उन्होंने इस घटना को उनके घर के बाहर ही अंजाम दिया. गंभीर रूप से घायल पत्रकार ने करीब चार सप्ताह बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया. बाद में इस मामले में गुरमीत राम रहीम सिंह को 11 जनवरी 2019 को हत्या की साजिश में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया और 17 जनवरी 2019 को विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. इसके साथ ही 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया.

क्या राम रहीम ने लगाया इल्जाम?

इस फैसले के खिलाफ डेरा प्रमुख ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दायर की थी. अपील में उन्होंने दावा किया था कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया है. उनका कहना था कि अन्य आरोपियों निर्मल, कुलदीप और कृष्ण लाल के खिलाफ पहली चार्जशीट पहले ही दायर की जा चुकी थी और उनमें से किसी ने भी साजिश में उनका नाम नहीं लिया था. ऐसे में सीबीआई के पास उन्हें साजिश से जोड़ने का कोई ठोस आधार नहीं था.

राम रहीम के वकील ने क्या कहा?

डेरा प्रमुख के वकील ने अदालत में दलील दी थी कि वर्ष 2002 में राज्य पुलिस द्वारा दायर पहली चार्जशीट में अपीलकर्ता का नाम बिल्कुल भी शामिल नहीं था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी कृष्ण लाल को सीबीआई अधिकारियों के जरिए प्रताड़ित किया गया और बाद में बदले की भावना से डेरा प्रमुख का नाम इस मामले में आरोपी के रूप में जोड़ा गया. वकील के मुताबिक, साजिश का प्रत्यक्षदर्शी बयान भी सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी एम. नारायणन द्वारा इस मामले के लिए खट्टा सिंह के रूप में गढ़ा गया था.

चश्मदीद के बयान पर कैसे उठा सवाल?

बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि खट्टा सिंह का यह दावा कि साजिश केवल उसकी मौजूदगी में रची गई थी और उसने इसके बारे में किसी को नहीं बताया था, जांच अधिकारी एम. नारायणन की जिरह के दौरान दिए गए बयान से ही गलत साबित होता है. वकील ने अदालत को बताया कि इस बयान से साफ होता है कि साजिश से जुड़े दावों में कई विरोधाभास हैं.

बचाव पक्ष का यह भी कहना था कि डेरा प्रमुख को केवल इस आधार पर दोषी ठहराया गया कि मृतक के खिलाफ उनका कथित तौर पर कोई मकसद था और वह उनके प्रति द्वेष रखते थे, क्योंकि पत्रकार अपने अखबार के माध्यम से डेरा के खिलाफ सक्रिय रूप से रिपोर्टिंग करते थे. हालांकि डेरा प्रमुख ने यह भी कहा था कि जांच एजेंसी यह साबित करने में नाकाम रही कि उन्होंने कभी उस अखबार को पढ़ा भी था.

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