गुजारा भत्ता मांगने पर कोर्ट सख्त, बोला- "पति का मांस नोचने जैसा”, पत्नी के अरमानों पर फेरा पानी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महिला की गुजारा भत्ता याचिका पर सख्त रुख अपनाते हुए उसे खारिज कर दियाय अदालत ने कहा कि अच्छी कमाई होने के बावजूद ऐसी मांग करना उचित नहीं है. कोर्ट ने इसे मांस नोचने जैसा कहा.

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Edited By :  समी सिद्दीकी
Updated On : 13 April 2026 1:47 PM IST

Madhya Pradesh High Court ने हाल ही में एक महिला द्वारा अपने पति से अंतरिम भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की मांग वाली याचिका पर कड़ी टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि महिला खुद इतनी कमाई कर रही है कि वह अपना खर्च आसानी से उठा सकती है.

जस्टिस Vivek Jain ने The Merchant of Venice का जिक्र करते हुए महिला की मांग को 'एक पाउंड मांस निकालने की कोशिश' जैसा बताया. उन्होंने कहा, 'यह याचिका पति से जबरन फायदा उठाने की कोशिश है, जिसे मंजूर नहीं किया जा सकता.'

अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने पाया कि पति और पत्नी दोनों की आय लगभग बराबर है और उनके कोई बच्चे भी नहीं हैं, जिनकी जिम्मेदारी उठानी हो. कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला की आय 1 लाख रुपये प्रति माह से अधिक है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें महिला को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें महिला ने 18 फरवरी 2026 को फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी. फैमिली कोर्ट ने तलाक की कार्यवाही के दौरान उसे आर्थिक सहायता और मुकदमे का खर्च देने से इनकार कर दिया था. जानकारी के अनुसार, दोनों की शादी 4 नवंबर 2022 को हुई थी, लेकिन जून 2023 से वे अलग रह रहे हैं. दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं. बाद में पति ने तलाक की अर्जी दाखिल की.

तलाक की प्रक्रिया के दौरान महिला ने फैमिली कोर्ट में अंतरिम भरण-पोषण के लिए आवेदन दिया. उसने अपने आवेदन में माना कि वह नौकरी करती है और सालाना करीब 20 लाख रुपये कमाती है. उसने यह भी दावा किया कि उसके पति की आय 30 लाख रुपये सालाना है, हालांकि पति ने इस दावे को खारिज किया.

फैमिली कोर्ट ने क्यों रिजेक्ट की पिटीशन?

फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी कि महिला पहले से ही अच्छी कमाई कर रही है और उस पर कोई आश्रित या अतिरिक्त आर्थिक जिम्मेदारी नहीं है. जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो महिला ने कहा कि उसकी आर्थिक स्थिति बदल गई है और उसकी सैलरी घटकर 14.81 लाख रुपये सालाना रह गई है.

हालांकि हाई कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर भी उसकी मासिक आय करीब 1.25 लाख रुपये बनती है, जिससे साफ है कि वह खुद अपना खर्च उठा सकती है. कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट ने सही तरीके से मामले का आकलन किया और उसके फैसले में कोई कानूनी गलती नहीं है, जिसके कारण हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े. इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने महिला की अंतरिम भरण-पोषण की मांग को उचित नहीं माना और उसकी याचिका खारिज कर दी.

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