Jharkhand Nikay Chunav 2026: चुनाव करवाएंगे, लेकिन खुद वोट नहीं दे पाएंगे - सिस्टम पर खड़े हुए सवाल

झारखंड निकाय चुनाव 2026 में तैनात हजारों मतदानकर्मी खुद वोट नहीं डाल पाएंगे, क्योंकि पोस्टल बैलेट की व्यवस्था नहीं की गई है. यह स्थिति चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर बहस खड़ी कर रही है.

( Image Source:  ANI )
Edited By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 23 Feb 2026 12:59 AM IST

झारखंड के नगर निकाय चुनाव 2026 के लिए मतदान दलों को उनके-अपने बूथों पर रवाना कर दिया गया है और प्रशासन चुनाव को लेकर संतोष जता रहा है. लेकिन इसी बीच लोकतंत्र से जुड़ा एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जो पूरे चुनावी तंत्र की संवेदनशीलता पर चोट करता है - जो लोग चुनाव करवा रहे हैं, क्या वे खुद वोट डाल पाएंगे?

जमीनी हकीकत यह है कि इस बार हजारों मतदानकर्मियों के लिए वोट डालने का रास्ता ही बंद हो गया है. वजह है - पोस्टल बैलेट की व्यवस्था न होना.

चुनाव कराने वालों को ही क्‍यों नहीं वोट डालने का अधिकार?

प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार, नगर निकाय चुनावों में तैनात किए गए कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें मतदान प्रक्रिया संपन्न कराने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन बदले में उनके अपने मताधिकार को नजरअंदाज कर दिया गया है. रांची के राम लखन सिंह कॉलेज में चल रही ट्रेनिंग के दौरान यह मुद्दा खुलकर सामने आया. वहां मौजूद कई कर्मचारियों ने कहा कि वे मतदान के दिन बूथ पर मौजूद रहेंगे, लेकिन खुद वोट डालने का कोई विकल्प उन्हें नहीं दिया गया.

एक अनुभवी मतदानकर्मी ने बताया कि वह पिछले सात-आठ चुनावों में चुनाव ड्यूटी कर चुका है. लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उसे पोस्टल बैलेट से वोट डालने की सुविधा मिलती थी, लेकिन इस बार अधिकारियों ने साफ कह दिया है कि नगर निकाय चुनाव में ऐसा कोई प्रावधान नहीं रखा गया है.

50 हजार वोट बाहर?

अगर कर्मचारियों का दावा सही है, तो इसका मतलब यह हुआ कि पूरे राज्य में करीब 50 हजार मतदाता सूची में दर्ज लोग मतदान से बाहर हो जाएंगे, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे चुनाव ड्यूटी पर हैं. यह आंकड़ा इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि नगर निकाय चुनावों में कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम होता है. कई वार्डों में 10–20 वोट से ही फैसला हो जाता है. ऐसे में हजारों प्रशिक्षित और जागरूक मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया से बाहर होना, परिणामों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है.

पोस्‍टल बैलेट का क्‍यों नहीं दिया गया विकल्‍प?

मतदानकर्मियों का तर्क है कि सरकार उनसे लोकतंत्र को मजबूत करने की जिम्मेदारी तो ले रही है, लेकिन बदले में उन्हें वही लोकतांत्रिक अधिकार इस्तेमाल करने से रोक रही है. उनका कहना है कि पोस्टल बैलेट कोई नई सुविधा नहीं है. यह पहले से चली आ रही व्यवस्था है, जिसका मकसद यही था कि ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी भी मतदान से वंचित न रहें. अब अचानक इस व्यवस्था को हटाना नीतिगत चूक माना जा रहा है.

क्या यह सिर्फ तकनीकी चूक है या बड़ा प्रशासनिक फैसला?

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह महज व्यवस्था की कमी है या जानबूझकर लिया गया प्रशासनिक फैसला? अगर चुनाव कराने वाले कर्मचारी ही वोट नहीं डाल पाएंगे, तो यह लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को कमजोर करता है, जिसमें हर नागरिक को मतदान का अधिकार बराबरी से दिया गया है. अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है. क्योंकि अगर हजारों मतदानकर्मी वोट से बाहर रह गए, तो यह सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की अनदेखी मानी जाएगी.

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