Live-in Relationship: लिव-इन से नहीं मिलता पति-पत्नी का हक, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- बिना तलाक दूसरा रिश्ता नाजायज
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप अपने आप में पति-पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं देती. अदालत ने कहा कि पहली शादी के रहते दूसरा रिश्ता हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शून्य है और ऐसे रिश्ते से जन्मे बच्चों को उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिलता. यह फैसला संपत्ति, वैधता और पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में एक अहम नज़ीर माना जा रहा है.;
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में यह साफ कर दिया है कि लिव-इन रिलेशनशिप अपने आप में पति-पत्नी का वैध रिश्ता नहीं बनाती. अदालत ने कहा कि जब तक पहली शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं होती, तब तक किसी दूसरे रिश्ते को विवाह का दर्जा नहीं दिया जा सकता. यह फैसला सिर्फ निजी संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे कानूनी अधिकारों को लेकर भी दूरगामी असर डालता है.
यह मामला बिलासपुर से जुड़ा है, जहां चंद्रकली और उनकी दो बेटियों ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में दावा किया गया कि ब्रिजमोहन दूआ ही चंद्रकली के पति हैं और उनकी दोनों बेटियां उसी की संतान हैं. उनका तर्क था कि वे दशकों तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे और ब्रिजमोहन ने भी बेटियों को अपनी संतान के रूप में स्वीकार किया है.
फैमिली कोर्ट से हाईकोर्ट तक की यात्रा
फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2019 में इस याचिका को खारिज कर दिया था. अदालत ने माना कि पूरा विवाद मूल रूप से संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़ा हुआ है, न कि वैध वैवाहिक स्थिति से. इस फैसले को चुनौती देते हुए चंद्रकली और उनकी बेटियां हाईकोर्ट पहुंचीं और दोबारा पति-पत्नी के रिश्ते की कानूनी मान्यता की मांग की.
पहली शादी बना कानूनी रोड़ा
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि चंद्रकली की पहली शादी 1960 में आत्मप्रकाश से हुई थी. चंद्रकली का दावा था कि उनके पहले पति 1984 में घर छोड़कर चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए. लेकिन अदालत के सामने न तो तलाक का कोई दस्तावेज पेश किया गया और न ही पति की मृत्यु का कोई प्रमाण. यही तथ्य पूरे मामले की दिशा तय करने वाला बन गया.
हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं पर टिका फैसला
डिवीजन बेंच ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 11 का हवाला देते हुए कहा कि पहली शादी के रहते दूसरी शादी कानूनन शून्य होती है. अदालत ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति, लंबे समय तक साथ रहना या सार्वजनिक स्वीकार्यता, किसी अवैध विवाह को वैध नहीं बना सकती. कानून के सामने भावनात्मक तर्कों की कोई जगह नहीं है.
बच्चों की वैधता पर भी कोर्ट का स्पष्ट नजरिया
अदालत ने बच्चों की वैधता को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को कानूनन पहले पति की संतान माना जाएगा. बाद के किसी रिश्ते या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पिता होने की स्वीकृति, इस कानूनी धारणा को नहीं बदल सकती. यह सिद्धांत सामाजिक नहीं, बल्कि विधिक आधार पर लागू होता है.
सरकारी दस्तावेज बने निर्णायक सबूत
हाईकोर्ट ने आधार कार्ड और अन्य सरकारी रिकॉर्ड्स का भी हवाला दिया, जिनमें बेटियों के पिता के रूप में आत्मप्रकाश का नाम दर्ज था. अदालत ने माना कि आधिकारिक दस्तावेजों का कानूनी महत्व होता है और इन्हें सिर्फ मौखिक बयान या निजी स्वीकारोक्ति से बदला नहीं जा सकता. यही रिकॉर्ड्स अपीलकर्ताओं के दावों पर भारी पड़े.
अंतिम फैसला और बड़ा संदेश
अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा कि चंद्रकली को ब्रिजमोहन दूआ की पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता और न ही बेटियों को उनका कानूनी उत्तराधिकारी माना जा सकता है. यह फैसला एक बार फिर रेखांकित करता है कि लिव-इन रिलेशनशिप सामाजिक रूप से चाहे जितनी स्वीकृत हो, लेकिन बिना कानूनी प्रक्रिया के वह विवाह या उत्तराधिकार का अधिकार नहीं देती. अदालत का यह संदेश साफ है- कानून भावनाओं से नहीं, विधि से चलता है.