पेनिस को वजाइना के ऊपर रखना और रगड़ना रेप नहीं; छत्तीसगढ़ HC ने आधी की आरोपी की सजा

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा बिना पेनेट्रेशन इजैक्युलेशन ‘रेप’ नहीं बल्कि ‘रेप की कोशिश’ है. IPC 376/511 के तहत सजा घटाकर 3.5 साल की गई.;

No Penetration Means Attempt to Rape

(Image Source:  Sora_ AI )
By :  सागर द्विवेदी
Updated On : 18 Feb 2026 6:40 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में रेप और रेप की कोशिश के बीच कानूनी अंतर को साफ करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है जिसको लेकर हर को हैरान है. अदालत ने कहा कि यदि पुरुष जननांग को केवल योनि के ऊपर रखा गया हो और बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन हुआ हो, तो इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत ‘रेप’ नहीं माना जाएगा, बल्कि यह ‘रेप की कोशिश’ की श्रेणी में आएगा.

सोमवार (16 फरवरी) को जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए सजा में संशोधन किया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेप के अपराध के लिए “पेनिट्रेशन” आवश्यक तत्व है, न कि केवल इजैक्युलेशन. फैसले में कहा गया कि बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन, कानून की नजर में ‘रेप’ नहीं बल्कि ‘रेप करने का प्रयास’ है, जिसके तहत IPC की धारा 376/511 लागू होगी.

मेडिकल साक्ष्यों में पीड़िता का हाइमन सुरक्षित पाए जाने के बाद अदालत ने दोषी की सज़ा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दी. करीब दो 20 साल पुराने इस मामले में अदालत ने साफ किया कि आरोपी का इरादा आपराधिक और हिंसक था, लेकिन 2004 में लागू भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत ‘रेप’ सिद्ध करने के लिए पेनेट्रेशन का साफ और ठोस प्रमाण आवश्यक है. संदेह की स्थिति में लाभ आरोपी को मिलेगा.

मामला क्या था और कब का है?

यह मामला 21 मई 2004 की है, जब धमतरी जिले में पीड़िता के घर में अकेले होने का फायदा उठाकर आरोपी उसे जबरन अपने घर ले गया. अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने कपड़े उतारे, उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की, फिर उसे कमरे में बंद कर हाथ-पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया.

कुछ घंटों बाद पीड़िता की मां ने उसे छुड़ाया. ट्रायल कोर्ट ने 2005 में आरोपी को IPC की धारा 376(1) (बलात्कार) और 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई थी.

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल क्या था?

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया. पीड़िता ने शुरुआती बयान में पेनेट्रेशन का आरोप लगाया, लेकिन बाद में कहा कि आरोपी ने 'अपना प्राइवेट पार्ट उसके प्राइवेट पार्ट के ऊपर लगभग 10 मिनट तक रखा' और प्रवेश नहीं किया. मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित पाया गया. वल्वा में लालिमा और कपड़ों पर मानव शुक्राणु की मौजूदगी दर्ज की गई, जिसकी पुष्टि एफएसएल ने की.

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने माना कि आरोपी का इरादा साफ तौर से आपराधिक था और उसने हिंसक कृत्य किया. लेकिन 2013 से पहले के कानून के अनुसार रेप सिद्ध करने के लिए पूर्ण या आंशिक पेनेट्रेशन का स्पष्ट प्रमाण आवश्यक था. न्यायमूर्ति व्यास ने कहा कि जननांग रगड़ना और सीमित शारीरिक संपर्क, भले ही शुक्राणु की मौजूदगी के साथ हो, ‘रेप’ की सख्त कानूनी परिभाषा को पूरा नहीं करता. इसलिए धारा 376(1) की सजा को बदलकर धारा 376/511 (रेप का प्रयास) कर दिया गया.

उम्र और साक्ष्य पर क्या हुआ फैसला?

बचाव पक्ष ने पीड़िता की उम्र पर सवाल उठाया, लेकिन कोर्ट ने स्कूल रजिस्टर को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 35 के तहत वैध सार्वजनिक दस्तावेज माना. उम्र को लेकर कोई ठोस विरोधाभासी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया.

फैसले का व्यापक महत्व क्या है?

यह निर्णय 2013 से पहले के कानून की तकनीकी व्याख्या को फिर से चर्चा में लाता है. अदालत ने दोहराया कि “स्लाइट पेनेट्रेशन” भी स्पष्ट और सुसंगत तरीके से सिद्ध होना चाहिए. यदि संदेह है, तो उसका लाभ आरोपी को मिलेगा. करीब 20 साल बाद अदालत का अंतिम शब्द यही रहा. इरादा आपराधिक था, कृत्य हिंसक था, लेकिन उस समय के कानून की कसौटी पर यह ‘रेप’ नहीं, ‘रेप का प्रयास’ था.

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