बिहार में मां की बेरहमी! बच्ची के स्कूल बैग में भरी ईंटें, बाज़ार में घुमाया- VIDEO देख लोग भड़के
बिहार के मुजफ्फरपुर में एक माँ द्वारा बच्ची के स्कूल बैग में ईंटें भरकर बाज़ार में घुमाने का वीडियो वायरल हुआ है. स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप कर बच्ची को राहत दिलाई, मामला सोशल मीडिया पर गरमाया.;
बिहार के एक बाज़ार में हुई यह घटना देखकर किसी का भी दिल दुख जाता है. सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में एक मां अपनी छोटी बेटी को बहुत कठोर तरीके से सज़ा दे रही है. उसने बच्ची के स्कूल बैग में ईंटें भर दीं और उसे बाज़ार में घुमाने के लिए मजबूर कर रही है. छोटी बच्ची रो रही है, बैग का बोझ इतना ज़्यादा है कि वह ठीक से चल भी नहीं पा रही, लेकिन मां को कोई पछतावा नहीं दिख रहा.
वह बच्ची को डांट रही है, यहां तक कि मार भी रही है. यह वीडियो मुजफ्फरपुर, बिहार का बताया जा रहा है. @premkumarcbn01,नाम के यूज़र ने इसे 15 फरवरी 2026 को पोस्ट किया था. पोस्ट में लिखा है कि 'माता कभी कुमाता नहीं होती' जैसी बातें आम हैं, लेकिन यहां एक ऐसी मां दिख रही है जो बच्ची के साथ क्रूरता कर रही है.
यह कैसी सजा?
वीडियो में देखा जा सकता है कि बच्ची बार-बार रो रही है, उसका चेहरा दर्द से भरा हुआ है. मां उसे बीच सड़क पर चला रही है और लोगों से कह रही है, 'यह मेरी बेटी है, मैं जो चाहूं करूंगी, तुम इसका खर्चा उठाओगे क्या? फिर अच्छी बात यह हुई कि बाज़ार में मौजूद कुछ लोग यह सब देख नहीं सके. उन्होंने बीच में आकर मां को रोका. उन्होंने बच्ची के बैग से ईंटें निकाल दीं. बच्ची को राहत मिली. लोग बहुत गुस्से में थे और मां से बहस कर रहे थे. आखिरकार उन्होंने बच्ची के पिता को फोन किया और पूरी बात बताई. पिता से बात हो गई, शायद घर जाकर मामला सुलझाने की कोशिश होगी.
क्या बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार सही है?
इस वीडियो पर कई कमेंट्स आए हैं. ज़्यादातर लोग इस घटना की कड़ी निंदा कर रहे हैं. कोई कह रहा है कि यह अनुशासन नहीं, बल्कि क्रूरता है. कोई लिख रहा है कि ऐसी मां को सज़ा मिलनी चाहिए. कई यूज़र्स ने कहा कि बच्चे को मारना-पीटना कभी सही तरीका नहीं होता. वे माता-पिता से अपील कर रहे हैं कि बच्चों के साथ प्यार और समझदारी से बात करें, न कि डर और दर्द देकर. कुछ लोगों ने कानूनी कार्रवाई की मांग भी की है, क्योंकि यह बच्चे के साथ दुर्व्यवहार है. भारत में बच्चे के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून हैं, जैसे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, और ऐसे मामलों में पुलिस या चाइल्डलाइन को सूचना दी जा सकती है.
क्या कहती है यूनिसेफ रिपोर्ट
यह घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं है, बल्कि भारत में बच्चों के साथ होने वाले व्यवहार की एक बड़ी समस्या को दिखाती है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2 से 14 साल के उम्र के लगभग 65% बच्चे घर पर किसी न किसी तरह की हिंसक सज़ा का सामना करते हैं यानी हर 10 में से 6-7 बच्चे को मारना-पीटना या डराना आम बात मानी जाती है. कई परिवारों में यह सोच है कि मारोगे नहीं तो बच्चा बिगड़ जाएगा' या "कठोर अनुशासन से ही अच्छा इंसान बनता है.' द लैंसेट जैसे बड़े जर्नल में छपे रिसर्च बताते हैं कि बचपन में बार-बार शारीरिक सज़ा मिलने से बच्चे के दिमाग पर बुरा असर पड़ता है. वे डिप्रेशन, एंग्जायटी, गुस्सा और कम कॉन्फिडेंस जैसी समस्याओं का शिकार हो सकते हैं. बड़े होने पर उनके रिश्ते खराब हो सकते हैं और वे खुद भी हिंसा का रास्ता अपना सकते हैं यानी जो दर्द बचपन में दिया जाता है, वही दर्द आगे चलकर समाज को वापस मिलता है. अनुशासन सिखाना ज़रूरी है, लेकिन तरीका सही होना चाहिए. बच्चे को समझाना, उसकी बात सुनना, अच्छे काम की तारीफ करना, गलती पर प्यार से समझाना ये तरीके कहीं ज़्यादा असरदार होते हैं. मारना या शर्मिंदा करना सिर्फ डर पैदा करता है, सम्मान नहीं.