Upper Assam vs Lower Assam : मुद्दे और नैरेटिव से लेकर वोटिंग पैटर्न तक अलग, समझें कितना दिलचस्प है मुकाबला
असम में Upper Assam और Lower Assam के बीच चुनावी मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि मुद्दों, नैरेटिव और वोटिंग पैटर्न का है. जानिए कैसे दोनों क्षेत्रों की राजनीति एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है.
असम की राजनीति को अगर गहराई से समझना हो, तो “Upper Assam vs Lower Assam” का फर्क समझना बेहद जरूरी है. यह सिर्फ भौगोलिक विभाजन नहीं है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर दो अलग-अलग दुनिया हैं. दोनों क्षेत्र के मुद्दे भी अलग हैं और नैरेटिव भी अलग हैं. यहां तक कि वोटिंग पैटर्न भी.
अपर बनाम लोअर: इस बार सबसे बड़ा मुद्दा क्या?
असम के वरिष्ठ पत्रकार अरुण ज्योति बोरा का कहना है कि ये बात सही है कि अपर और लोअर असम के मुद्दे अलग अलग हैं. इसका असर चुनाव प्रचार में दिखाई दे रहा है. इसके बावजूद बीजेपी और कांग्रेस एक-दूसरे के प्रभाव क्षेत्र में जनाधार बढ़ाने की कोशिश में जुटी है. इस बार के चुनाव में भी 2021 की तरह असमिया अस्मिता यानी पहचान पर लोगों को जोर है. बीजेपी बांग्लादेशी घुसपैठिए, भूमि स्वामित्य, असम की मूल संस्कृति पर जोर दे रही है. इसके अलावा, सीएए और एनआरसी का मुद्दा भी लोगों के जेहन में है. कांग्रेस सेक्युलर पॉलिटिक्स पर जोर दे रही है. जबकि एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल पहले की तरह अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर जोर रहे हैं. फिलहाल, आप यह कह सकते हैं जो, असमिया पहचान पर वोट लेने में सफल होगी, उसी की सरकार इस बार भी बनने की संभावना ज्यादा है.
1. Upper Assam: पहचान, संसाधन और अस्मिता की राजनीति
अपर असम में डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, जोरहाट, शिवसागर जैसे जिले आते हैं. असमिया अस्मिता और संसाधनों की राजनीति का केंद्र माना जाता है. यहां चाय बागान, तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधन प्रमुख हैं.
यह इलाका ऐतिहासिक रूप से यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम की गतिविधियों का गढ़ रहा है. इसलिए यहां 'इंसर्जेंसी बनाम डेवलपमेंट' एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है. आज भी अपर असम में वोटिंग का झुकाव अक्सर उन दलों की तरफ जाता है जो असमिया पहचान, 'स्थानीय अधिकार और घुसपैठ विरोध की बात करते हैं. सर्वानंद सोनोवाल जैसे नेताओं की पकड़ इसी क्षेत्र में मजबूत रही है.
2. Lower Assam: पहचान से ज्यादा गणित
लोअर असम में बारपेटा, धुबरी, नगांव, बोंगाईगांव जैसे इलाके शामिल हैं. यहां की राजनीति ज्यादा डेमोग्राफिक यानी जनसंख्या संरचना पर आधारित है.
यहां मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा है, इसलिए चुनावी नैरेटिव सेक्युलर बनाम पॉलिटिकल पोलराइजेशन के इर्द-गिर्द घूमता है. बदरुद्दीन अजमल (Badruddin Ajmal) की पार्टी ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट का प्रभाव खासकर लोअर असम में ही दिखता है. इस इलाके में मुद्दे अक्सर नागरिकता, NRC, CAA, और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े होते हैं.
3. अलग मुद्दे, अलग चुनावी एजेंडा
अपर असम में जहां भूमि अधिकार, रोजगार, उद्योग और असमिया संस्कृति चुनावी मुद्दे हैं, वहीं लोअर असम में पहचान, सुरक्षा, नागरिकता और प्रतिनिधित्व प्रमुख मुद्दे हैं. उदाहरण के लिए NRC और CAA का असर दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग रहा. अपर असम में इसे घुसपैठ रोकने का कदम माना गया. जबकि लोअर असम में इसे अस्तित्व के खतरे के रूप में देखा गया.
4. वोटिंग पैटर्न: क्लियर डिवाइड
अपर असम में वोटिंग पैटर्न अपेक्षाकृत “नेशनलिस्ट और क्षेत्रीय अस्मिता” के आधार पर रहता है, जिससे भारतीय जनता पार्टी को अक्सर फायदा मिलता है. वहीं, लोअर असम में वोटिंग “कंसोलिडेशन” पर आधारित होती है. यानी एक समुदाय या वर्ग का वोट एक दिशा में जाता है. यहां, कांग्रेस और AIUDF के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलती है.
5. असम में क्या बदल रहा है?
हाल के वर्षों में यह पारंपरिक डिवाइड थोड़ा बदलता दिख रहा है. BJP ने लोअर असम में भी अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश की है. वहीं, कांग्रेस अपर असम में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है. साथ ही, विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और वेलफेयर स्कीम्स जैसे मुद्दे दोनों क्षेत्रों में कॉमन होते जा रहे हैं.
6. 2026 का चुनाव दिलचस्प क्यों?
2026 का असम चुनाव इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह सिर्फ अपर और लोअर असम की चुनावी जंग नहीं रह गया है. अब यह पुराने नैरेटिव vs नए डेवलपमेंट मॉडल की लड़ाई भी बनता जा रहा है. अपर असम में सवाल होगा. क्या अस्मिता की राजनीति अभी भी सबसे बड़ा फैक्टर है? लोअर असम में अहम सवाल क्या वोट बैंक की राजनीति टूटेगी या और मजबूत होगी?
असम, इसी दोहरी राजनीति के कारण असम का हर चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि नैरेटिव की जंग भी बन जाता है. यही इसे देश के सबसे दिलचस्प चुनावी मुकाबलों में से एक बनाता है.