Hug Day 2026: जब मैं ट्रेन की सीट पर बगल में बैठे अनजान शख्स के गले लगकर खूब रोई
भीड़ से भरे उस सफर में, एक अजनबी के कंधे ने मुझे अपना सा सहारा दिया और बरसों से दबे आंसू अचानक बह निकले.;
ट्रेनें सिर्फ शहरों को नहीं जोड़तीं, वे लोगों के भीतर छिपे अनकहे दुखों को भी एक-दूसरे तक पहुँचा देती हैं. उस दिन मुझे यह बात समझ आई, जब मैं अपनी सीट पर बैठी थी और बगल में बैठे एक अनजान शख्स से बातें करते-करते अचानक उसके गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ी.
सर्दियों की हल्की शाम थी. प्लेटफॉर्म पर चाय की भाप, कुलियों की आवाजें और विदा करते हाथ, सब कुछ सामान्य था. असामान्य था तो बस मेरा दिल. बाहर से मैं बिल्कुल शांत दिख रही थी, लेकिन भीतर जैसे किसी ने बरसों का दर्द जमा कर रखा हो.
मैं खिड़की के पास वाली सीट पर बैठी थी. ट्रेन छूटी तो शहर पीछे छूटने लगा, लेकिन यादें नहीं. फोन की स्क्रीन बार-बार जलती, फिर बुझ जाती. कुछ मैसेज थे जिनका जवाब देने की हिम्मत नहीं थी, कुछ नाम थे जिन्हें पढ़ते ही आंखें भर आती थीं.
मेरे बगल में लगभग पचपन-साठ साल के एक सज्जन आकर बैठे. साधारण से कपड़े, आंखों में अजीब सी नरमी. उन्होंने बैग ठीक से रखा और मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, खिड़की बंद कर दूं क्या? हवा तेज है.” मैंने सिर हिलाकर ‘नहीं’ कहा. बात वहीं खत्म हो सकती थी, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था. थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर पूछा, “कहीं दूर जा रही हो?”
बस इतना सा सवाल था, मगर पता नहीं क्यों मेरे भीतर जमी दीवार में एक दरार पड़ गई. मैंने औपचारिक सा जवाब दिया, “हां, काम से.” उन्होंने ज़्यादा कुरेदा नहीं. बस चुपचाप बैठ गए. लेकिन उनकी मौजूदगी में एक अजीब सा सुकून था—जैसे कोई बिना पूछे भी समझ रहा हो.
कुछ घंटे बीते. बाहर अंधेरा घिर आया. डिब्बे की हल्की पीली रोशनी में लोग ऊंघने लगे. तभी अचानक उन्होंने अपने टिफिन से पराठे निकाले और मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, “घर का खाना है, थोड़ा ले लो.” मैंने मना किया, पर उन्होंने पिता जैसी जिद में कहा, “यात्रा में साथ बैठने वाले अपने हो जाते हैं.”‘अपने’ यह शब्द सुनते ही मेरी आंखें छलक पड़ीं. शायद मुझे उसी शब्द का इंतजार था. मैंने खाना नहीं लिया, पर खुद को रोक भी नहीं पाई.
उन्होंने धीरे से पूछा, “सब ठीक है न?” और बस… मैं टूट गई. जैसे किसी ने बांध खोल दिया हो. मैंने बताना शुरू किया. नौकरी की उलझनें, घर की जिम्मेदारियां, हाल ही में खोया हुआ एक रिश्ता, और वो मजबूत बनने की थकान जो अब बोझ बन चुकी थी. वो बस सुनते रहे. बीच-बीच में सिर हिलाते, कभी पानी पकड़ाते. उन्होंने कोई बड़ी सीख नहीं दी, कोई भारी भरकम ज्ञान नहीं बांटा. बस इतना कहा, “रो लो. कभी-कभी मजबूत बनने के लिए रोना जरूरी होता है.”
उनकी आवाज में ऐसा अपनापन था कि मैं खुद को रोक नहीं पाई. मैं झुककर उनके कंधे से लग गई और बच्चों की तरह रोने लगी. ट्रेन की आवाज, पटरियों की खटखट, सब धुंधला गया. उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा, वैसे ही जैसे पिता रखते हैं. उस छुअन में भरोसा था, सुरक्षा थी, और एक अजीब सा वादा कि सब ठीक हो जाएगा.
काफी देर बाद जब मैं संभली, तो लगा जैसे दिल हल्का हो गया हो. समस्याएं वहीं थीं, जिंदगी भी वैसी ही थी, पर अब मैं अकेली नहीं महसूस कर रही थी. स्टेशन आने वाला था. उन्होंने अपना सामान उठाया. उतरते हुए बस इतना कहा, “बेटा, मुस्कुराती रहना. जिंदगी बहुत कीमती है.” मैंने जल्दी से उनके पैर छुए. वो मुस्कुराए और भीड़ में खो गए. नाम तक नहीं पूछा हमने एक-दूसरे का.
ट्रेन फिर चल पड़ी, लेकिन इस बार मैं अलग थी. खिड़की से बाहर देखते हुए मेरे होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी. उस दिन समझ आया, हर रिश्ता खून से नहीं बनता. कुछ लोग बस सफर में मिलते हैं, दिल का बोझ हल्का करते हैं और फिर चुपचाप उतर जाते हैं. पर उनकी दी हुई हिम्मत, उनका कंधा, और वो दो शब्द “रो लो” जिंदगी भर साथ रह जाते हैं.