काम बोलता है! नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाने वाले नितिन नबीन यूं ही नहीं बने BJP के यंग बॉस
बिहार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से निकलकर नितिन नवीन का भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना संगठनात्मक राजनीति की बड़ी कहानी है. 45 वर्षीय नितिन नवीन ने युवा मोर्चा से लेकर विधायक, मंत्री और संगठन प्रमुख तक का सफर तय किया है. छत्तीसगढ़ और दिल्ली जैसे कठिन चुनावी मिशनों में उनकी सफलता ने शीर्ष नेतृत्व का भरोसा जीता. पार्टी के भीतर उन्हें समन्वय साधने वाला, जमीन से जुड़ा और भरोसेमंद नेता माना जाता है. उनकी नियुक्ति BJP के जनरेशन शिफ्ट और संगठन को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है, जो 2025–26 के राज्य चुनावों और 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी का संकेत देती है.;
बिहार की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि यहां जमीन से उठे नेता ही दिल्ली की राजनीति को दिशा देते हैं. पटना की पुरानी गलियों, छात्र राजनीति और संगठन की बैठकों से निकलकर एक ऐसा ही नाम धीरे-धीरे उभरा- नितिन नबीन. राजनीति उनके लिए अचानक चुना गया रास्ता नहीं था, बल्कि यह विरासत, विचार और संगठन की तपस्या से बना सफर था. पिता जनसंघ से जुड़े रहे, घर में राजनीति पर चर्चा आम थी और यही माहौल नितिन नवीन के राजनीतिक संस्कारों की पहली पाठशाला बना.
युवा उम्र में ही नितिन नबीन ने समझ लिया था कि बीजेपी में आगे बढ़ने का रास्ता भाषणों से नहीं, बल्कि संगठन के काम से होकर जाता है. बिहार में छात्र और युवा संगठन से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे विधानसभा, फिर संगठन और अब राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचा. मंगलवार को जब दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में उनके नाम की घोषणा पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में हुई, तो यह सिर्फ एक पद परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक लंबी राजनीतिक यात्रा की स्वाभाविक परिणति थी.
युवा चेहरा, बड़ा संदेश
45 वर्षीय नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना बीजेपी का सोचा-समझा संदेश माना जा रहा है. एक तरफ पार्टी आने वाले विधानसभा चुनावों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम और उत्तर प्रदेश की तैयारी में जुटी है, तो दूसरी ओर 2029 के लोकसभा चुनाव की नींव भी रखी जा रही है. नितिन नबीन की नियुक्ति इस बात का संकेत है कि बीजेपी अब संगठन और पीढ़ीगत बदलाव पर खुलकर दांव लगा रही है. यह फैसला कांग्रेस से भी एक स्पष्ट तुलना खड़ी करता है, जहां अब भी 84 वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी की कमान संभाले हुए हैं.
पार्टी के भीतर नितिन नबीन को एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जाता है जो “सामंजस्य” की राजनीति जानते हैं. न ज्यादा आक्रामक, न टकराव वाले बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले. यही वजह है कि शीर्ष नेतृत्व को भरोसा है कि वे वरिष्ठ नेताओं के अनुभव और युवाओं की ऊर्जा, दोनों के बीच संतुलन बना पाएंगे.
बिहार से विधायक, संगठन से राष्ट्रीय पहचान
नितिन नबीन की राजनीतिक ताकत सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं रही. वे 45 साल की उम्र में ही पांच बार विधायक चुने जा चुके हैं. 2006 में पटना पश्चिम से पहली जीत और फिर बांकीपुर विधानसभा से लगातार चार बार जीत. यह सिलसिला उनकी जमीनी पकड़ और जनसंपर्क का प्रमाण है. इसके साथ ही बिहार सरकार में कानून, पथ निर्माण और शहरी विकास जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी संभालने का अनुभव भी उनके खाते में रहा है. संगठन के स्तर पर भी उनका करियर उतना ही मजबूत रहा. भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री और फिर बिहार बीजेपी अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूत करने का काम किया. पार्टी के भीतर उन्हें ऐसा कार्यकर्ता माना जाता है, जो पद से पहले जिम्मेदारी को प्राथमिकता देता है.
छत्तीसगढ़ बना टर्निंग पॉइंट
अगर नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की असली वजह तलाशनी हो, तो नजरें 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव पर टिकती हैं. उस वक्त कांग्रेस के भूपेश बघेल की सरकार मजबूत मानी जा रही थी और ज्यादातर एग्जिट पोल बीजेपी के खिलाफ थे. ऐसे माहौल में नितिन नवीन को छत्तीसगढ़ में चुनावी जिम्मेदारी सौंपी गई. उन्होंने महीनों तक राज्य में डेरा डाला. संगठन का पुनर्गठन, बूथ स्तर तक माइक्रो मैनेजमेंट और स्थानीय समीकरणों की बारीक समझ. नतीजा यह हुआ कि बीजेपी ने साफ बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की. पार्टी के भीतर माना जाता है कि यही वह परीक्षा थी, जिसने नितिन नवीन को शीर्ष नेतृत्व की नजरों में “डिलीवर करने वाला नेता” साबित किया.
दिल्ली फतह और अमित शाह की भूमिका
छत्तीसगढ़ के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नितिन नबीन को दिल्ली की राजनीति में भी बड़ी जिम्मेदारी दी. करीब तीन दशक से सत्ता से बाहर रही बीजेपी को राजधानी में वापसी दिलाने की रणनीति में नितिन नवीन की भूमिका अहम रही. संगठन और चुनावी तालमेल के जरिए पार्टी ने दिल्ली में बड़ी सफलता हासिल की. पार्टी सूत्र बताते हैं कि अमित शाह को नितिन नबीन की सबसे बड़ी खूबी यही लगी. कठिन परिस्थितियों में शांत रहकर काम करना और तय रणनीति से न भटकना. यही भरोसा धीरे-धीरे उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व के बेहद करीब ले गया.
जातीय समीकरण
राजनीति में समीकरण भी अहम होते हैं. नितिन नबीन कायस्थ समुदाय से आते हैं, जिसे बिहार और देश की राजनीति में अपेक्षाकृत “न्यूट्रल” माना जाता है. यह पहचान उन्हें किसी बड़े सामाजिक टकराव से दूर रखती है और विभिन्न वर्गों में स्वीकार्यता दिलाती है. पार्टी के लिए यह भी एक व्यावहारिक लाभ है. साथ ही, उनका व्यवहार सुलभ, जमीन से जुड़ा और संवाद पर भरोसा रखने वाला उन्हें कैडर के बीच लोकप्रिय बनाता है. यही कारण है कि वरिष्ठ नेता भी उनके साथ सहज महसूस करते हैं.
बिहार में मजबूत पकड़
बिहार में नितिन नबीन की भूमिका सिर्फ विधायक तक सीमित नहीं रही. हालिया चुनावी दौर में उनकी पटना स्थित आवास पर अमित शाह की मौजूदगी को संगठनात्मक काम की सार्वजनिक सराहना के तौर पर देखा गया. उन्होंने जीविका दीदी नेटवर्क को साधने और एनडीए समन्वय बैठकों में अहम भूमिका निभाई. पार्टी के भीतर माना जाता है कि बिहार जैसे जटिल राज्य में संगठन को एकजुट रखना उनकी बड़ी उपलब्धि रही. यही अनुभव अब राष्ट्रीय स्तर पर उनके काम आने वाला है.
अनजाने में मिली जिम्मेदारी
दिलचस्प बात यह रही कि जिस सुबह नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा हुई, उस वक्त वे खुद इससे अनजान थे. वे पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मान समारोह में शामिल थे. दिल्ली मुख्यालय पहुंचते ही उन्हें इस नई जिम्मेदारी का औपचारिक संदेश मिला. यह क्षण उनके लिए जितना चौंकाने वाला था, उतना ही भावनात्मक भी.
बीजेपी का दांव
नितिन नबीन की ताजपोशी बीजेपी के लिए सिर्फ संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक बयान भी है. यह संदेश है कि पार्टी युवा नेतृत्व को आगे लाकर आने वाले दशकों की राजनीति की तैयारी कर रही है. कांग्रेस के नेतृत्व मॉडल के बरक्स बीजेपी का यह कदम साफ तौर पर “जनरेशन शिफ्ट” को रेखांकित करता है. अब चुनौती बड़ी है- राज्य चुनाव, संगठन का विस्तार और 2029 की लड़ाई. बिहार की पृष्ठभूमि से निकला यह नेता अब पूरे देश की राजनीति में अपनी भूमिका निभाने जा रहा है. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या नितिन नबीन इस भरोसे को इतिहास में बदल पाएंगे? समय ही इसका जवाब देगा.