क्यों खास है Brigade Parade Ground जहां शुभेंदु ने ली शपथ, अंग्रेजों के शासन से लेकर लेफ्ट की ताकत, TMC का वर्चस्व तक देखा
कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड का इतिहास जानें- ब्रिटिश सैन्य अड्डे से लेकर वामपंथी, TMC और BJP के लिए सबसे बड़े राजनीतिक मंच बनने तक का सफर.
कोलकाता का ब्रिगेड परेड ग्राउंड (Brigade Parade Ground) सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीतिक स्मृति, सत्ता संघर्ष और ऐतिहासिक बदलावों का जीवंत दस्तावेज है. कभी यह अंग्रेजों की सैन्य ताकत का प्रतीक था, फिर स्वतंत्रता आंदोलन की सभाओं का गवाह बना. बाद में यही मैदान वामपंथी राजनीति की शक्ति का केंद्र बना और फिर Mamata Banerjee के ‘परिवर्तन’ आंदोलन का मंच. अब भारतीय जनता पार्टी और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के कार्यक्रम ने, इसे बंगाल की नई राजनीतिक लड़ाई का प्रतीक बना दिया है. करीब 269 साल से ज्यादा पुराने इस मैदान ने अंग्रेजों का शासन, लेफ्ट का लाल दौर, TMC का उभार और अब भगवा राजनीति की चुनौती, का आज गवाह बन गया. इसलिए, परेड ग्राउंड को बंगाल की धड़कन माना जाता है. साथ ही ये भी कहा जाता है कि, “जिसकी ब्रिगेड बड़ी, उसकी राजनीति भारी.”
अंग्रेजों ने क्यों बनाया था Brigade Parade Ground?
दरअसल, कोलकाता का ब्रिगेड परेड ग्राउंड का इतिहास 1757 की प्लासी की लड़ाई के बाद शुरू होता है. इस युद्ध में ब्रिटिश सरकार ने जीत मिलने के बाद कोलकाता में नए Fort William के निर्माण का फैसला किया. इसके लिए गोविंदपुर गांव की आबादी हटाई गई और आसपास का बड़ा इलाका खाली कराया गया.
1758 से इस मैदान का विकास सैन्य जरूरतों के हिसाब से शुरू हुआ. यहां ब्रिटिश सेना की परेड, अभ्यास और हथियार प्रदर्शन होते थे. “ब्रिगेड” नाम ब्रिटिश सेना की ब्रिगेड यूनिट्स से जुड़ा है. अंग्रेजों के लिए यह सिर्फ खुला मैदान नहीं बल्कि फोर्ट विलियम की सुरक्षा का रणनीतिक हिस्सा था.
कैसे बना कोलकाता का ‘फेफड़ा’?
समय के साथ यह मैदान सिर्फ सैन्य क्षेत्र नहीं रहा. लगभग 1200 एकड़ से ज्यादा में फैला यह इलाका धीरे-धीरे कोलकाता का सबसे बड़ा खुला हरित क्षेत्र बन गया. Victoria Memorial, Eden Gardens और St. Paul's Cathedral जैसे ऐतिहासिक स्थल इसी इलाके के आसपास विकसित हुए. आज भी इसे “कोलकाता का फेफड़ा” कहा जाता है क्योंकि भीड़भाड़ और कंक्रीट के बीच यही मैदान शहर को खुली हवा देता है.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसकी भूमिका क्या?
1900 के दशक की शुरुआत में कोलकाता राष्ट्रवादी राजनीति का केंद्र बन चुका था. बंगाल विभाजन 1905 से 1911 के आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बड़े सार्वजनिक मैदान राजनीतिक सभाओं के लिए इस्तेमाल होने लगे.हालांकि, उस समय ब्रिगेड पूरी तरह राजनीतिक मंच नहीं था, लेकिन राष्ट्रवादी नेताओं की सभाओं ने इसे जनता की राजनीति से जोड़ना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे यह मैदान ब्रिटिश सैन्य शक्ति के प्रतीक से जनभावनाओं के केंद्र में बदलने लगा.
कैसे बना वामपंथ का सबसे बड़ा गढ़?
1947 के बाद पश्चिम बंगाल में वामपंथी राजनीति तेजी से मजबूत हुई. 1960 और 1970 के दशक तक आते-आते कम्युनिस्ट पार्टी (Marxist) और दूसरे वाम दलों ने ब्रिगेड को शक्ति प्रदर्शन का सबसे बड़ा मंच बना दिया. यहां होने वाली “ब्रिगेड रैलियां” लाखों की भीड़ जुटाने लगीं. मजदूर, किसान, छात्र और ट्रेड यूनियन के लोग पूरे राज्य से यहां पहुंचते थे. बंगाल की राजनीति में यह धारणा बन गई कि जिस दल की ब्रिगेड रैली जितनी बड़ी, उसका जनाधार उतना मजबूत.
ज्योति बसु के दौर में क्यों बना सत्ता का प्रतीक?
आजादी के बाद करीब 25 साल तक कांग्रेस के शासन के बाद 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट सत्ता में आया और लगातार 34 वर्षों तक शासन किया. इस दौरान ब्रिगेड परेड ग्राउंड लेफ्ट राजनीति की पहचान बन गया. 1984 में यहां कांग्रेस विरोधी विशाल सम्मेलन हुआ जिसमें N. T. Rama Rao और Farooq Abdullah जैसे नेता शामिल हुए. यह मैदान सिर्फ बंगाल नहीं बल्कि राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति का भी केंद्र बनने लगा.
अंतरराष्ट्रीय नेताओं के लिए क्यों अहम रहा ब्रिगेड?
- ब्रिगेड परेड ग्राउंड सिर्फ भारतीय राजनीति तक सीमित नहीं रहा. 1955 में सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव और निकोलाई बुल्गानिन ने यहां जनसभा की.
- 1972 में बांग्लादेश की आजादी के बाद शेख मुजीबुर रहमान और इंदिरा गांधी ने इसी मैदान से ऐतिहासिक सभा को संबोधित किया. लाखों लोगों की मौजूदगी में ‘जय बांग्ला-जय हिंद’ के नारे गूंजे.
- 2005 में वेनेजुएला के राष्ट्रपति Hugo Chávez ने भी यहां वाम मोर्चे की रैली को संबोधित किया था. इससे इसकी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक पहचान और मजबूत हुई.
ममता बनर्जी ने कैसे बदली ब्रिगेड की राजनीति?
1990 के दशक में ममता बनर्जी ने लेफ्ट के खिलाफ आक्रामक राजनीति शुरू की. 1998 में तृणमूल कांग्रेस बनने के बाद उन्होंने ब्रिगेड को अपने राजनीतिक संघर्ष का बड़ा मंच बनाया.
उनकी रैलियों ने संकेत देना शुरू किया कि बंगाल की राजनीति बदल रही है. 2011 के विधानसभा चुनाव से पहले ब्रिगेड में जुटी भीड़ ने साफ कर दिया था कि राज्य में “परिवर्तन” की हवा चल रही है. उसी चुनाव में TMC ने 34 साल पुराना लेफ्ट शासन खत्म कर दिया.
BJP और शुभेंदु के लिए क्यों अहम बना परेड ग्राउंड?
साल 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में तेजी से विस्तार शुरू किया. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की विशाल रैलियों ने ब्रिगेड को भाजपा की बंगाल रणनीति का अहम हिस्सा बना दिया.
अब, वही पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के कार्यक्रम इस मैदान को नई राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बना रहे हैं. कभी TMC के प्रमुख चेहरों में रहे शुवेंदु अब ममता बनर्जी के सबसे बड़े विरोधियों में हैं. ऐसे में ब्रिगेड में उनका शपथ ग्रहण या शक्ति प्रदर्शन सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि बदलते बंगाल का प्रतीक माना जा रहा है.
बंगाल की राजनीति में अहम क्यों है Brigade मैदान?
- ब्रिगेड परेड ग्राउंड बंगाल की राजनीतिक संस्कृति का “पावर मीटर” माना जाता है. यहां भीड़ सिर्फ संख्या नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश होती है.
- यहां पर 6 फरवरी 1972 की घटना जिक्र करना भी जरूरी है. जब इस मैदान ने एक ऐतिहासिक नजारा पेश किया. करीब 10 लाख लोगों की मौजूदगी में एक विशाल रैली हुई. मंच पर उस वक्त बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान और भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मौजूद थीं. इसी रैली में शेख मुजीबुर रहमान ने ‘जय भारत‑जय बांग्ला' का नारा दिया था.
- यह मैदान अंग्रेजों की सैन्य शक्ति का प्रतीक रहा है. स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह बना. लेफ्ट के लाल दौर का केंद्र भी रहा. फिर ममता बनर्जी के उभार का मंच बना. अब BJP की चुनौती यानी भगवा लहर का प्रतीक बन चुका है
- यानी बंगाल की हर बड़ी राजनीतिक कहानी किसी न किसी रूप में ब्रिगेड से होकर गुजरती है. इसलिए यहां होने वाला हर आयोजन सिर्फ रैली नहीं बल्कि सत्ता और जनसमर्थन का प्रदर्शन माना जाता है.