कोई स्वतंत्रता सेनानी तो कोई रहा मुख्यमंत्री, वो तीन महान हस्ती; जिन्हें फॉलो कर आज भी कुंवारे हैं शुभेंदु अधिकारी
Suvendu Adhikari 56 साल की उम्र में भी अविवाहित हैं. इसकी वजह राजनीति नहीं, बल्कि तीन महान हस्तियों से मिली प्रेरणा है. छात्र राजनीति के दौरान वे स्वतंत्रता सेनानी Satish Chandra Samanta, Sushil Kumar Dhara और पूर्व मुख्यमंत्री Ajoy Kumar Mukherjee से बेहद प्रभावित हुए. आइए इन तीनों के बारे में विस्तार से जानते हैं...
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनने के बाद 56 वर्षीय शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. लेकिन सत्ता संभालने के साथ ही उनकी निजी जिंदगी को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं. खासकर एक सवाल लोगों के बीच सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है कि आखिर शुभेंदु अधिकारी ने आज तक शादी क्यों नहीं की?
दरअसल, बंगाल की राजनीति में लंबे समय से एक्टिव रहे शुभेंदुअधिकारी ने इसका जवाब खुद ही कई साल पहले दे रखा है. उन्होंने बताया था कि छात्र राजनीति के दिनों में कुछ ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा मिली, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया था. उसी प्रेरणा ने उन्हें जीवनभर अविवाहित रहने का फैसला लेने के लिए मजबूर किया.
शुभेंदुअधिकारी ने शादी नहीं करने का फैसला क्यों लिया?
शुभेंदु अधिकारी ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि साल 1987 में उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा. इसी दौरान उनके जीवन पर तीन बड़े स्वतंत्रता सेनानियों का असर हुआ जिसमें सतीश सामंत,सुशील धारा और अजय मुखर्जी हैं. उन्होंने कहा कि इन तीनों नेताओं ने बिना शादी किए अपना पूरा जीवन देश और समाज सेवा में लगा दिया. यही बात उनके दिल को छू गई और उन्होंने भी तय कर लिया कि वे शादी नहीं करेंगे और अपना जीवन जनता की सेवा को समर्पित करेंगे. आइए इन तीन स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानते हैं...
कौन थे सतीश चंद्र सामंत?
15 दिसंबर 1900 को जन्मे Satish Chandra Samanta बचपन से ही राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थे. महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने उनके भीतर आजादी की ऐसी आग जलाई कि उन्होंने खुद को पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया. 1942 में जब पूरे देश में भारत छोड़ो आंदोलन की लपटें उठीं, तब तामलुक में सतीश चंद्र सामंत ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ा दांव खेला. 17 दिसंबर 1942 को उन्होंने ‘ताम्रलिप्त जातीय सरकार’ की स्थापना कर दी. यह एक ऐसी समानांतर सरकार थी, जिसने ब्रिटिश शासन को सीधी चुनौती दी.
इस सरकार ने सिर्फ विरोध नहीं किया, बल्कि जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएं, राहत कार्य और प्रशासनिक व्यवस्था भी संभाली. उस दौर में मलेरिया और हैजा जैसी बीमारियों से लोग परेशान थे, तब सामंत ने गांव-गांव स्वास्थ्य शिविर लगाए. आजादी के बाद भी उनका सफर नहीं रुका. वे 1952 से 1977 तक लगातार पांच बार तामलुक लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. संसद में उनकी पहचान एक सादगीपूर्ण और जनसेवा करने वाले नेता की रही.
सुशील धारा कौन थे?
अगर ताम्रलिप्त जातीय सरकार का कोई ‘फील्ड कमांडर’ कहा जाए, तो वह नाम था Sushil Kumar Dhara. 2 मार्च 1911 को जन्मे सुशील धारा सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी योद्धा थे. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र रणनीति तैयार की. उन्होंने ‘विद्युत वाहिनी’ नाम की एक विशेष इकाई बनाई, जो ताम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार की सुरक्षा और कार्रवाई संभालती थी.
ब्रिटिश सरकार उन्हें इतना खतरनाक मानती थी कि उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया. अपने जीवन के लगभग 12 साल उन्होंने जेल में बिताए. लेकिन जेल की सलाखें भी उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं. आजादी के बाद भी उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. वे पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य बने और राज्य सरकार में उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री भी रहे. 1977 में वे तामलुक से लोकसभा सांसद चुने गए. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी उनका त्याग. उन्होंने कभी शादी नहीं की और अपना पूरा जीवन समाज सेवा और राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया. बंगाल भाजपा नेता Suvendu Adhikari आज भी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं.
अजय कुमार मुखर्जी कैसे बने बंगाल के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री?
अजय कुमार मुखर्जी का नाम बंगाल की राजनीति में सादगी और नैतिकता की मिसाल माना जाता है. 15 अप्रैल 1901 को जन्मे अजय मुखर्जी गांधीवादी विचारधारा से बेहद प्रभावित थे. उन्होंने भी भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और ताम्रलिप्त जातीय सरकार के संस्थापकों में शामिल रहे. लेकिन आजादी के बाद उनकी पहचान सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी तक सीमित नहीं रही.
1966 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर ‘बांग्ला कांग्रेस’ नाम की पार्टी बनाई. इसके बाद बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आया. 1967 में वे पश्चिम Bengal के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. उन्होंने कुल तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला. उनकी राजनीति सत्ता के प्रदर्शन से ज्यादा सादगी और सिद्धांतों के लिए जानी जाती थी. यही वजह रही कि उन्हें 1977 में भारत सरकार ने पद्म विभूषण से सम्मानित किया. कहा जाता है कि पूर्व राष्ट्रपति Pranab Mukherjee को राजनीति में आगे बढ़ाने में भी अजय मुखर्जी की बड़ी भूमिका थी.