कौन है Baby Ariha Shah? 40 महीने से जर्मनी के फोस्टर केयर में रह रही, क्लीन चिट के बाद भी माता-पिता से है दूर

बेबी आरिहा शाह पिछले तीन साल से जर्मनी के फोस्टर केयर सिस्टम में रह रही है, जबकि उसके भारतीय माता-पिता सभी आपराधिक आरोपों से बरी हो चुके हैं. यह मामला अब कानूनी से ज्यादा मानवीय संकट बन चुका है. भारत सरकार ने इसे उच्चतम कूटनीतिक स्तर पर उठाया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक जर्मन नेतृत्व से बात हो चुकी है. जानिए पूरा मामला, परिवार की पीड़ा और अंतरराष्ट्रीय बहस.;

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Edited By :  नवनीत कुमार
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बेबी आरिहा शाह की कहानी एक ऐसे भारतीय परिवार की है, जिसने बेहतर भविष्य के सपने के साथ विदेश का रुख किया, लेकिन किस्मत ने उन्हें लंबे कानूनी संघर्ष में झोंक दिया. 2021 में जन्मी आरिहा, धारा और भावेश शाह की पहली संतान थीं. भावेश को 2018 में जर्मनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी मिलने के बाद दंपती बर्लिन में बस गए थे.

नवजात बेटी के आने से जीवन में खुशियों का सैलाब आया, लेकिन यह मुस्कान ज्यादा दिन टिक नहीं सकी. कुछ ही महीनों में मामला ऐसा उलझा कि परिवार की दुनिया बिखरती चली गई. आज यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और बाल कल्याण की बहस का विषय बन चुकी है.

एक हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया

सितंबर 2021 में, जब आरिहा महज सात महीने की थीं, तब एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा हुआ. दादी की देखरेख में बच्ची को चोट लग गई, जिसे परिवार ने सामान्य दुर्घटना माना. बाद में मां को डायपर बदलते समय खून दिखा, जिससे घबराए माता-पिता तुरंत अस्पताल पहुंचे. यहीं से मामला स्वास्थ्य से निकलकर कानूनी जांच की ओर मुड़ गया. परिवार को अंदाजा भी नहीं था कि यह घटना उनकी बेटी को उनसे वर्षों के लिए दूर कर देगी.

जांच के निष्कर्ष और कानूनी मोड़

विस्तृत मेडिकल जांच और पुलिस जांच के बाद 2022 की शुरुआत में जर्मन अधिकारियों ने साफ किया कि आरिहा के साथ किसी तरह का यौन शोषण नहीं हुआ. इस निष्कर्ष के साथ आपराधिक मामला बंद कर दिया गया और माता-पिता को आरोपों से मुक्त कर दिया गया. लेकिन इसके बावजूद जर्मन चाइल्ड सर्विसेज ने अभिरक्षा लौटाने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था कि चोट ‘देखभाल में लापरवाही’ का संकेत है, न कि अपराध का. इसी आधार पर अदालत ने माता-पिता की कस्टडी समाप्त कर दी.

फोस्टर केयर में बीतते बचपन के साल

अदालत के फैसले के बाद आरिहा को फोस्टर केयर में भेज दिया गया, जहां वह पिछले तीन साल से अधिक समय से रह रही हैं. इस दौरान बच्ची को एक से अधिक फोस्टर होम में शिफ्ट किए जाने की बात भी सामने आई. परिवार और समर्थकों का कहना है कि स्थिरता के बिना बचपन बिताना बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास पर गहरा असर डालता है. यही चिंता इस मामले को और संवेदनशील बना देती है.

परिवार का दर्द और ‘गलतफहमी’ का आरोप

आरिहा की बुआ किंजल शाह का कहना है कि यह पूरा मामला जर्मन बाल सेवा की एक “गलतफहमी” का नतीजा है. उनके अनुसार, माता-पिता पर कोई आपराधिक आरोप नहीं हैं और वे स्वतंत्र रूप से कहीं भी यात्रा कर सकते हैं, फिर भी उनकी बेटी उनसे दूर है. परिवार का दर्द इस बात में छिपा है कि कानून ने उन्हें निर्दोष माना, लेकिन माता-पिता होने का अधिकार नहीं लौटाया. किंजल का कहना है कि यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी है.

‘सेव आरिहा’ अभियान की आवाज़

आरिहा के समर्थन में ‘सेव आरिहा’ अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय समुदाय के लोग शामिल हैं. अभियान का दावा है कि बच्ची को उसके जैविक माता-पिता और सांस्कृतिक जड़ों से दूर रखना उसके अधिकारों का उल्लंघन है. उनका कहना है कि भारत लौटकर आरिहा अपने परिवार, भाषा और संस्कृति से जुड़ सकती है. यह अभियान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींच रहा है.

भारत सरकार की कूटनीतिक पहल

भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह मामला उच्चतम कूटनीतिक स्तर पर उठाया जा रहा है. विदेश मंत्रालय लगातार जर्मन अधिकारियों के संपर्क में है और स्थिति पर नजर बनाए हुए है. सरकार का मानना है कि अब इस मुद्दे को केवल कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए. इसी सोच के साथ भारत ने बातचीत का रास्ता चुना है.

प्रधानमंत्री स्तर पर चर्चा

विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने पुष्टि की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह विषय सीधे जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज़ के सामने उठाया. यह बातचीत दर्शाती है कि भारत इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रहा है. सरकार का संदेश साफ है कि एक मासूम बच्चे का भविष्य किसी कानूनी जटिलता में नहीं उलझना चाहिए. यह संवाद उम्मीद की एक किरण बनकर उभरा है.

संस्कृति, पहचान और बचपन का सवाल

भारत का जोर इस बात पर है कि आरिहा का पालन-पोषण ऐसे माहौल में हो, जहां उसकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सके. बचपन सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि अपनापन और भावनात्मक जुड़ाव का भी समय होता है. परिवार का तर्क है कि जैविक माता-पिता के साथ रहना बच्चे का मौलिक अधिकार है. यही तर्क इस मामले को अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाता है.

मानवीय समाधान की उम्मीद

तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आरिहा अपने माता-पिता से दूर है, जो कई सवाल खड़े करता है. क्या कानून की कठोर व्याख्या इंसानियत से ऊपर हो सकती है? भारत और जर्मनी के बीच बातचीत से परिवार को उम्मीद है कि जल्द कोई मानवीय समाधान निकलेगा. इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है, लेकिन दुआ यही है कि आरिहा को उसका बचपन और परिवार दोनों वापस मिलें.

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