डिजिटल दुनिया पर सरकार का डंडा! अब हर वीडियो, हर रील, हर वेब-सीरीज़ होगी रेगुलेट - ऑनलाइन अश्लीलता पर नए कानून की तैयारी

केंद्र सरकार ऑनलाइन अश्लीलता और आपत्तिजनक डिजिटल कंटेंट पर लगाम लगाने के लिए आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का ड्राफ्ट तैयार कर रही है. नए नियमों में उम्र आधारित वर्गीकरण और सख्त नैतिक मानक शामिल होंगे.;

( Image Source:  Sora AI )
Edited By :  प्रवीण सिंह
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डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ते बोल्ड, भड़काऊ और विवादित कंटेंट को लेकर सरकार अब सख्त क़ानूनी शिकंजा कसने की तैयारी में है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का ड्राफ्ट तैयार कर रही है, जिसके तहत सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म, यूट्यूब और अन्य ऑनलाइन माध्यमों पर प्रसारित कंटेंट को “अश्लीलता”, “नैतिकता” और “उम्र-उपयुक्तता” के आधार पर नियंत्रित किया जाएगा.

ऐसा पहली बार है जब पूरे डिजिटल कंटेंट को उसी तराज़ू पर तौलने की कोशिश की जा रही है, जिस पर कभी केबल टीवी चैनलों को कसा जाता था.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से निकला रास्ता

इस पूरे मामले की जड़ सुप्रीम कोर्ट के एक अहम निर्देश में है. मार्च 2025 में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए, अनुच्छेद 19(2) में निहित “उचित प्रतिबंधों” को स्पष्ट करने वाला ढांचा तैयार करे. यह निर्देश सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रणवीर अल्लाहबादिया और कॉमेडियन समय रैना से जुड़े विवाद के बाद आया था, जिनकी टिप्पणियों को लेकर सार्वजनिक नाराज़गी देखी गई थी. इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने सरकार से स्पष्ट नियम लाने को कहा. इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को प्रस्तावित है.

किस कानून के तहत बन रहे हैं नए नियम?

सूत्रों के अनुसार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इन नए नियमों को आईटी एक्ट, 2000 की धारा 87(1) के तहत तैयार किया है. इन्हें विशेष रूप से इन धाराओं से जोड़ा गया है...

  • धारा 67: इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने पर सज़ा
  • धारा 67A: यौन प्रकृति की सामग्री
  • धारा 67B: बाल अश्लीलता
  • धारा 66B: चोरी के डिजिटल संसाधनों का इस्तेमाल

ड्राफ्ट नियमों की भाषा और भावना काफी हद तक केबल टीवी नेटवर्क नियम, 1994 के प्रोग्राम कोड से ली गई प्रतीत होती है.

‘अश्लील कंटेंट’ की नई परिभाषा

ड्राफ्ट आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 के अनुसार, कोई भी डिजिटल कंटेंट “अश्लील” माना जाएगा यदि वह कामुक (lascivious) हो, यौन उत्तेजना को बढ़ावा देता हो, देखने या सुनने वाले व्यक्ति के नैतिक पतन का कारण बने और समाज पर भ्रष्ट प्रभाव डालता हो. यह परिभाषा वही पुरानी कानूनी भाषा दोहराती है, जिसका उपयोग दशकों से टीवी और फिल्मों के लिए किया जाता रहा है.

किन बातों पर पूरी तरह मनाही होगी?

ड्राफ्ट नियमों में विस्तार से बताया गया है कि डिजिटल कंटेंट में क्या नहीं होना चाहिए. इसके तहत कंटेंट:

  • किसी जाति, धर्म, रंग, भाषा या समुदाय का मज़ाक नहीं उड़ाएगा
  • धार्मिक समूहों पर हमला या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा
  • जानबूझकर झूठे और भड़काऊ संकेत (innuendos) नहीं देगा
  • अपराध, हिंसा या अव्यवस्था को बढ़ावा नहीं देगा
  • हिंसा और अश्लीलता को आकर्षक या वांछनीय नहीं दिखाएगा
  • महिलाओं को वस्तु के रूप में प्रस्तुत नहीं करेगा
  • बच्चों को अपमानजनक या यौनिक रूप में नहीं दिखाएगा
  • दिव्यांग व्यक्तियों का उपहास नहीं करेगा
  • क्षेत्रीय, भाषाई या नस्लीय समूहों के प्रति तंज या व्यंग्य नहीं करेगा
  • किसी व्यक्ति या समूह की सामाजिक और नैतिक छवि को नुकसान नहीं पहुंचाएगा

ड्राफ्ट के मुताबिक, ऐसा कोई भी कंटेंट जो “अशोभनीय, भद्दा या आपत्तिजनक” माना जाएगा, उसे नियमों का उल्लंघन समझा जाएगा.

हर डिजिटल कंटेंट पर लगेगा ‘उम्र का ठप्पा’

ड्राफ्ट नियमों का सबसे बड़ा और विवादित प्रावधान यह है कि अब हर डिजिटल कंटेंट को उम्र के हिसाब से वर्गीकृत करना अनिवार्य होगा. इसके तहत कंटेंट को इन श्रेणियों में बांटा जाएगा:

  • सभी उम्र के लिए उपयुक्त
  • 7 वर्ष से ऊपर
  • 13 वर्ष से ऊपर
  • 16 वर्ष से ऊपर
  • केवल वयस्कों के लिए
  • कुछ विशेष कंटेंट केवल पेशेवर वर्ग (जैसे डॉक्टर या वैज्ञानिक) के लिए

साथ ही कंटेंट को यह भी बताना होगा कि उसमें कौन-से तत्व मौजूद हैं - हिंसा, नग्नता, सेक्स, नशीले पदार्थ, डरावने दृश्य या आपत्तिजनक भाषा.

पैरेंटल लॉक और उम्र सत्यापन की व्यवस्था

ड्राफ्ट नियमों के अनुसार 13+ या उससे ऊपर की रेटिंग वाले कंटेंट पर पैरेंटल कंट्रोल सिस्टम अनिवार्य होगा. वयस्कों के लिए बने कंटेंट पर विश्वसनीय उम्र सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी. हर वीडियो या शो के शुरू में उसकी उम्र सीमा और चेतावनी स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुझाव दे चुका है कि उम्र की पुष्टि के लिए आधार आधारित व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है.

पुराने डिजिटल नियम भी रहेंगे लागू

इन नए प्रस्तावित नियमों पर भी आईटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 लागू रहेंगे. यानी प्लेटफॉर्म्स पर शिकायत निवारण तंत्र, कंटेंट हटाने की समय-सीमा और जवाबदेही जैसे प्रावधान पहले की तरह जारी रहेंगे. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ड्राफ्ट तैयार कर रही है और इसे जल्द ही सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया जाएगा.

‘डिजिटल पर टीवी युग के नियम’

ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल कंटेंट निर्माताओं में इस प्रस्ताव को लेकर भारी चिंता है. इंडस्ट्री सूत्रों का कहना है कि सरकार ऑन-डिमांड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वही नियम लागू करना चाहती है, जो 1990 के दशक में टीवी चैनलों पर लागू होते थे. उनका तर्क है कि ओटीटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘पुल मॉडल’ पर काम करते हैं, जहां दर्शक खुद कंटेंट चुनता है. इसके विपरीत टीवी ‘पुश मॉडल’ है, जहां कंटेंट बिना मांगे घरों तक पहुंचता है. इसी वजह से टीवी पर कड़े प्रोग्राम कोड की ज़रूरत पड़ी थी.

नीति में ‘यू-टर्न’ का आरोप

सूत्रों के मुताबिक, जब 2021 में डिजिटल मीडिया नियम बनाए गए थे, तब मंत्रालय ने यह मानने से इनकार कर दिया था कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पर केबल टीवी का प्रोग्राम कोड लागू किया जाए, क्योंकि दोनों की तकनीकी प्रकृति अलग है. अब वही मंत्रालय उसी पुराने कोड को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर थोपने की तैयारी कर रहा है. इंडस्ट्री इसे “नीतिगत यू-टर्न” बता रही है और कह रही है कि इससे नीति में अनिश्चितता बढ़ेगी और निवेशकों का भरोसा कमजोर होगा.

असली मुद्दा: यूज़र जनरेटेड कंटेंट?

सूत्रों का यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में जो मामला उठा, वह मुख्य रूप से यूज़र जनरेटेड कंटेंट (UGC) यानी यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेंट को लेकर था. लेकिन सरकार के नए ड्राफ्ट नियमों में ओटीटी प्लेटफॉर्म, न्यूज़ वेबसाइट और क्यूरेटेड डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी उसी दायरे में लाया जा रहा है. जबकि ज़रूरत थी कि अलग-अलग माध्यमों के लिए अलग नियम बनाए जाते.

बड़ा सवाल: नैतिकता तय कौन करेगा?

ड्राफ्ट नियमों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि:

  • “अश्लील” की परिभाषा कौन तय करेगा?
  • क्या व्यंग्य और आलोचना को भी आपत्तिजनक माना जाएगा?
  • क्या रचनात्मक स्वतंत्रता पर अंकुश लगेगा?
  • क्या शिकायतों के आधार पर मनमाने ढंग से कंटेंट हटाया जाएगा?

डिजिटल क्रिएटर्स को डर है कि कोई भी असंतुष्ट समूह शिकायत दर्ज कर सकता है और कंटेंट को हटवाया जा सकता है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होगी.

सुरक्षा बनाम सेंसरशिप की जंग

सरकार का दावा है कि नए नियमों का मकसद बच्चों और समाज को अश्लील और भड़काऊ कंटेंट से बचाना है. वहीं आलोचकों का कहना है कि यह कदम डिजिटल प्लेटफॉर्म को टीवी युग की सेंसरशिप में धकेलने जैसा है. अब सबकी निगाहें 29 जनवरी की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि इंटरनेट की दुनिया पर सुरक्षा का कवच चढ़ेगा या आज़ादी की सीमाएं और सिकुड़ेंगी.

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