28 साल पहले छोड़ा साथ, फिर थामेंगी हाथ? घूम गई दीदी की 360 डिग्री में राजनीति- कहानी ममता के 19 वफादार नेताओं की बेवफाई की
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की TMC सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजरती दिख रही है. दावा है कि पार्टी के 19 सांसद बागी खेमे में शामिल हो गए हैं, जिनमें यूसुफ पठान, सायोनी घोष, देव और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे चर्चित चेहरे भी शामिल हैं.
यूसुफ पठान से सायोनी घोष तक, ममता के 'स्टार सांसद' बने बागी
(Image Source: ANI )पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उथल-पुथल मचा हुआ है. विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आता दिख रहा है. दावा किया जा रहा है कि पार्टी के 19 सांसदों ने अलग गुट बनाकर लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है और NDA को समर्थन देने की तैयारी कर ली है. अगर यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा झटका माना जाएगा.
इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प बात यह है कि बागी खेमे में बड़ी संख्या में वे चेहरे शामिल बताए जा रहे हैं, जिन्हें ममता बनर्जी ने खुद राजनीति में लाया था. इनमें अभिनेता, क्रिकेटर, टीवी स्टार, साहित्यकार और सांस्कृतिक जगत के चर्चित नाम शामिल हैं. यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि क्या ममता का 'स्टार पावर' वाला प्रयोग संकट की घड़ी में कमजोर साबित हो गया?
360 डिग्री में ममता की घूमने वाली राजनीति
बंगाल में पिछले 15 साल से राज करने वाली टीएमसी चीफ ममता बनर्जी ने साल 1997 में कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था और 1 जनवरी 1998 को खुद की पार्टी TMC की स्थापना की थी. इसके बाद ममता ने 28 साल तक न दाएं- देखा न बाए. लेकिन साल 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद ऐसा लग रहा है जैसे मानो ममता की रीढ़ की हड्डी ही टूट गई हो और पार्टी के सभी दिक्कत नेता एक के बाद बगावत करते हुए अपना अलग दल बनाने जा रहे हैं. तो वहीं मीडिया में अब खबर फैल गई है कि ममता फिर से कांग्रेस के शरण में जा सकती है यानी कांग्रेस से अपनी पार्टी विलय कर सकती है यानी एक तरह से ऐसा मानिए कि ममता की राजनीति 360 डिग्री वाले मोड़ पर घूम गई हो.
आखिर क्यों फेल हुआ ममता का 'स्टार एक्सपेरिमेंट'?
TMC ने वर्षों तक फिल्म, टीवी और खेल जगत के सितारों को टिकट देकर चुनावी फायदा उठाया. पार्टी की लोकप्रियता और ममता की छवि के दम पर ये चेहरे चुनाव जीतते रहे, लेकिन इनमें से कई नेताओं का खुद का मजबूत जमीनी संगठन नहीं था. जैसे ही पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा, कई स्टार सांसदों ने दूरी बनानी शुरू कर दी. इससे यह बहस तेज हो गई कि क्या लोकप्रियता, संगठन और वैचारिक प्रतिबद्धता की जगह ले सकती है?
कौन हैं TMC के 19 बागी सांसद ?
1. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात)
TMC की वरिष्ठ नेता और पूर्व चीफ व्हिप काकोली घोष इस कथित बागी गुट की सबसे अहम चेहरा मानी जा रही हैं. पेशे से डॉक्टर काकोली लंबे समय से ममता बनर्जी की भरोसेमंद नेताओं में गिनी जाती थीं. बताया जा रहा है कि लोकसभा में उन्हें हटाकर कल्याण बनर्जी को चीफ व्हिप बनाए जाने, संगठन में प्रभाव कम होने और बेटे को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिए जाने से उनकी नाराजगी बढ़ी. वह इस पूरे बागी गुट का नेतृत्व कर रही हैं.
2. शत्रुघ्न सिन्हा (आसनसोल)
बॉलीवुड के 'शॉटगन' शत्रुघ्न सिन्हा BJP और कांग्रेस के बाद TMC में आए थे. 2022 के आसनसोल उपचुनाव में उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की और फिर 2024 में भी सांसद चुने गए. राष्ट्रीय राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाले शत्रुघ्न सिन्हा ने टीएमसी के क्षेत्रीय दायरे और बंगाल चुनाव में हार के बाद पार्टी के बिखरने की स्थिति को देखते हुए NDA के साथ जाने का फैसला किया है.
3. यूसुफ पठान (बहरामपुर)
2007 टी20 विश्व कप और 2011 वनडे विश्व कप विजेता टीम के सदस्य रहे यूसुफ पठान को ममता बनर्जी ने 2024 में राजनीति में उतारा था. उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ी जीत दर्ज की, लेकिन उनका बंगाल की राजनीति से गहरा जुड़ाव नहीं माना जाता था. इसलिए उनका नाम इस बगावत में सबसे ज्यादा चर्चा में है. यूसुफ पठान मूल रूप से गुजरात (बड़ौदा) के रहने वाले हैं. बंगाल में टीएमसी की हार के बाद वे असहज महसूस कर रहे थे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सीधे संपर्क और आमंत्रण के बाद उन्होंने एनडीए का रुख किया.
4. सायोनी घोष (जादवपुर)
बंगाली अभिनेत्री सायोनी घोष कभी TMC की सबसे आक्रामक युवा नेताओं में गिनी जाती थीं. वह तृणमूल कांग्रेस की युवा विंग की अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्हें अभिषेक बनर्जी का बेहद करीबी माना जाता था. जादवपुर से बड़ी जीत के बाद उन्हें पार्टी का भविष्य माना जा रहा था. ऐसे में उनका कथित रूप से बागी खेमे में जाना ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक और भावनात्मक झटका माना जा रहा है.
5. शताब्दी रॉय (बीरभूम)
शताब्दी रॉय TMC की सबसे सफल स्टार सांसदों में से एक रही हैं. वे 2009 से लगातार चार बार सांसद (2009, 2014, 2019, 2024) चुनी जा चुकी हैं. वह टीएमसी के संस्थापक चेहरों में से एक रही हैं. बीरभूम में टीएमसी के बाहुबली नेता अनुब्रत मंडल के प्रभाव के बाद से ही शताब्दी खुद को उपेक्षित महसूस कर रही थीं. पूर्व में भी उनके पाला बदलने की अटकलें थीं, और इस संकट के समय उन्होंने बागी सांसदों को अपने दिल्ली आवास पर बैठक के लिए जगह दी, जिससे साफ हो गया कि वह भी विद्रोही गुट मुख्य हिस्सा हैं.
6. देव उर्फ दीपक अधिकारी (घाटल)
बंगाली सिनेमा के सुपरस्टार देव उर्फ दीपक अधिकारी वर्षों से TMC का बड़ा चेहरा रहे हैं. वे लगातार तीन बार सांसद चुने गए हैं. देव ने कई बार सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने के संकेत दिए थे. ऐसे में पार्टी संकट के बीच उनका नाम भी चर्चाओं में बना हुआ है. माना जा रहा है कि टीएमसी के भीतर जारी भ्रष्टाचार के आरोपों और जनता के गुस्से के बीच अपनी बेदाग छवि को बचाए रखने के लिए उन्होंने ममता का साथ छोड़ दिया.
7. रचना बनर्जी (हुगली)
लोकप्रिय टीवी शो 'दीदी नंबर-1' की होस्ट रचना बनर्जी को खुद ममता बनर्जी राजनीति में लेकर आई थीं. उन्होंने 2024 में हुगली सीट से भाजपा की लॉकेट चटर्जी को हराया था. महिला मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता ने उन्हें जीत दिलाई, लेकिन राजनीति में नई होने के कारण उनका नाम भी संभावित असंतुष्ट नेताओं में गिना जा रहा है.
8. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण)
ममता बनर्जी के सबसे अहम राजनीतिक क्षेत्रों में से एक कोलकाता दक्षिण से सांसद और कोलकाता नगर निगम की चेयरपर्सन माला रॉय लंबे समय से पार्टी से जुड़ी रही हैं. कोलकाता के शहरी इलाकों में आर.जी. कर मामले के बाद टीएमसी के खिलाफ जो भयंकर जनाक्रोश पैदा हुआ था, माला रॉय उससे सीधे प्रभावित थीं. पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा इस आक्रोश को न संभाल पाने के कारण उन्होंने विद्रोह का रास्ता चुना,
9. पार्थ भौमिक (बैरकपुर)
बैरकपुर से सांसद पार्थ भौमिक उन नेताओं में हैं, जिन्होंने संगठन से ऊपर उठकर राजनीति में पहचान बनाई. वे ममता सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और उत्तर 24 परगना जिले में टीएमसी के मजबूत संगठनकर्ता रहे हैं. 2024 में उन्होंने अर्जुन सिंह को मात दी थी. बैरकपुर औद्योगिक और संवेदनशील क्षेत्र है. विधानसभा चुनाव में हार के बाद अर्जुन सिंह और भाजपा के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए पार्थ भौमिक ने अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए पाला बदला.
10. जगदीश चंद्र बसुनिया (कूचबिहार)
जगदीश चंद्र बसुनिया उत्तर बंगाल की कूचबिहार सीट से सांसद हैं. इन्होंने 2024 में भाजपा के तत्कालीन केंद्रीय मंत्री निसिथ प्रामाणिक को हराकर सबको चौंका दिया था. उत्तर बंगाल हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है. विधानसभा चुनाव में टीएमसी के सफाए के बाद बसुनिया को समझ आ गया था कि टीएमसी के साथ रहकर वे उत्तर बंगाल में दोबारा नहीं जीत पाएंगे.
11. खलीलुर रहमान (जंगीपुर)
खलीलुर रहमान जंगीपुर से लगातार दूसरी बार के सांसद और बंगाल के एक बड़े बीड़ी व्यवसायी (उद्यमी) हैं. एक उद्योगपति होने के नाते वे केंद्रीय एजेंसियों के रडार और राज्य की राजनीतिक अस्थिरता से दूर रहना चाहते थे. टीएमसी के कमजोर होते ही उन्होंने केंद्र सरकार (NDA) के साथ जाना बेहतर समझा.
12. अबू ताहिर खान (मुर्शिदाबाद)
कांग्रेस से TMC में आए अबू ताहिर खान मुर्शिदाबाद की राजनीति में मजबूत पकड़ रखते हैं. वे पहले कांग्रेस में थे, बाद में टीएमसी में शामिल होकर सांसद बने. मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में चुनाव हारने के बाद टीएमसी का आधार खिसक गया था. जमीनी स्तर पर नेतृत्व की शून्यता और उपेक्षा के कारण उन्होंने बगावत की.
13. बापी हलदार (मथुरापुर)
बापी हलदार दक्षिण 24 परगना जिले के मथुरापुर (सुरक्षित) निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार सांसद बने हैं. यह क्षेत्र सुंदरवन के करीब है और अम्फान राहत घोटाले व स्थानीय भ्रष्टाचार के आरोपों से त्रस्त रहा है. जनता के भारी दबाव के चलते उन्होंने बागी खेमे का रुख किया.
14. मिताली बाग (आरामबाग)
युवा सांसद मिताली बाग ने आरामबाग लोकसभा सीट से बेहद मामूली अंतर से जीत हासिल की थी. आरामबाग में राजनीतिक समीकरण हमेशा बदलते रहते हैं. पहली बार की सांसद होने के नाते वे पार्टी के बड़े संकट में ममता बनर्जी के साथ खड़े रहने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थीं.
15. कालीपद सोरेन (झारग्राम)
साहित्य अकादमी और पद्मश्री सम्मानित कालीपद सोरेन आदिवासी समाज का बड़ा चेहरा माने जाते हैं. वे जंगलमहल क्षेत्र के झारग्राम से आदिवासी चेहरा और संथाली भाषा के प्रसिद्ध लेखक/साहित्यकार हैं. ममता बनर्जी ने उन्हें सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान के आधार पर राजनीति में आगे बढ़ाया था. जंगलमहल के आदिवासी इलाकों में टीएमसी के खिलाफ स्थानीय भ्रष्टाचार को लेकर तीव्र आक्रोश था. सोरेन अपनी सामाजिक और बेदाग छवि को बचाए रखना चाहते थे.
16. जून मालिया (मेदिनीपुर)
बंगाली फिल्मों और टीवी की जानी-मानी अभिनेत्री जून मालिया पहले विधायक रहीं, फिर 2024 में मेदिनीपुर से सांसद बनीं. मेदिनीपुर शुभेंदु अधिकारी का गढ़ माना जाता है. शुभेंदु अधिकारी के प्रभाव और टीएमसी के भीतर वरिष्ठ कलाकारों की उपेक्षा से परेशान होकर जून मालिया ने भी बागी गुट का हाथ थाम लिया.
17. अरूप चक्रवर्ती (बांकुड़ा)
टीएमसी के पुराने और वफादार नेता अरूप चक्रवर्ती पहले विधायक थे और बाद में 2024 में बांकुड़ा से सांसद बने. बांकुड़ा और पुरुलिया बेल्ट में टीएमसी की करारी संगठनात्मक हार हुई थी. चक्रवर्ती का मानना था कि शीर्ष नेतृत्व (विशेषकर अभिषेक बनर्जी) ने स्थानीय नेताओं को उनके हाल पर छोड़ दिया है.
18. डॉ. शर्मिला सरकार (वर्धमान पूर्व)
डॉ. शर्मिला सरकार पेशे से डॉक्टर (मनोचिकित्सक) और वर्धमान पूर्व सीट से पहली बार की सांसद हैं. डॉ. शर्मिला सरकार ने खुद मीडिया के सामने आकर खुलकर कहा कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी पूरी तरह सुस्ती (limbo) में चली गई थी और उसने सांसदों से संवाद करना बंद कर दिया था, जिससे वे अलग-थलग महसूस कर रही थीं.
19. असित कुमार माल (बोलपुर)
असित कुमार माल बोलपुर निर्वाचन क्षेत्र से लगातार दूसरी बार सांसद हैं. बोलपुर (शांतिनिकेतन) का इलाका भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों और केंद्रीय जांचों के केंद्र में रहा है. राजनीतिक उथल-पुथल के बीच असित माल ने भी अपनी सदस्यता और राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए दो-तिहाई बहुमत वाले बागी गुट में शामिल होना सही समझा.
अगर इन सांसदों की बगावत औपचारिक रूप लेती है, तो यह सिर्फ TMC के लिए नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की पूरी राजनीतिक रणनीति पर बड़ा सवाल होगा. वर्षों तक फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों और चर्चित चेहरों के सहारे चुनाव जीतने वाली पार्टी आज उसी 'स्टार ब्रिगेड' के कारण सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना करती दिख रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला इस बात की भी परीक्षा है कि क्या लोकप्रियता और स्टारडम, मजबूत संगठन और वैचारिक निष्ठा की जगह ले सकते हैं.
क्या ममता बनर्जी फिर कांग्रेस में होंगी शामिल?
ममता बनर्जी ने करीब 28 साल पहले 1 जनवरी 1998 को आधिकारिक रूप से कांग्रेस का साथ छोड़कर अपनी नई पार्टी 'अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस' (TMC) की स्थापना की थी. हालांकि, अब बंगाल चुनाव में मिली करारी हार और पार्टी में हुई ऐतिहासिक बगावत के बाद, ममता बनर्जी और कांग्रेस के फिर से साथ आने (या विलय होने) की मजबूत राजनीतिक संभावना बनती दिख रही है. पिछले 48 घंटों में ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात की है, जिससे राजनीतिक गलियारों में टीएमसी और कांग्रेस के विलय (Merger) की अटकलें बेहद तेज हो गई हैं.